भारत में दलहनी फसलों का उत्पादन कम क्यों है इसे बढ़ाने के क्या उपाय है?

भारत में दलहनी फसलों की खेती का एक विशेष महत्व है, हमारे देश में दालों का कुल उत्पादन लगभग 16 मिलियन टन है ।

देश में दलहनी फसलों की खेती में उड़द, चना, मसूर, अरहर आदि प्रमुख फसलें हैं ।

भोजन में दालों का प्रयोग करने वाले उपभोक्ताओं की संख्या में भारी वृद्धि हुई है, परन्तु दलहनों का उत्पादन कम होने के कारण उपभोक्ताओं की माँग की पूर्ति नहीं करता है ।


भारत में उपभोक्ता मांग की तुलना में दालों का उत्पादन कम क्यों है?


दलहनी फसलों का अपेक्षा के अनुरूप उत्पादन न होने के बहुत से कारण हो सकते हैं ।


दलहनी फसलों के उत्पादन कम होने के प्रमुख कारण -

  • दोषपूर्ण सस्य प्रबन्ध क्रियाएं
  • आर्थिक कारण व समस्याएं
  • प्रबंधकीय कारण
  • सही किस्मों का चुनाव न करना
  • राइजोबियम कल्चर व उर्वरको का प्रयोग न करना
  • तकनीकी कारण
  • खरपतवार नियंत्रण पादप सुरक्षा एवं
  • अन्य वातावरणीय कारण आदि ।

इसके अतिरिक्त भारत में दलहनी फसलों के उत्पादन कम होने के अन्य कारण भी हो सकते हैं ।

इनमें सबसे प्रमुख कारण दोषपूर्ण सस्य प्रबन्ध है ।


भारत में दलहनी फसलों का उत्पादन कम क्यों है?

भारत में दलहनी फसलों का उत्पादन कम क्यों है इसे बढ़ाने के क्या उपाय है?, भारत में दलहन उत्पादन, dalhan production in india, दलहनी फसलों की खेती, kheti
भारत में दलहन उत्पादन (dalhan production in india)

दलहनी फसलों का उत्पादन कम होने के निम्नलिखित कारण है -


1. दोषपूर्ण सस्य प्रबन्ध क्रियाएं -

सस्य प्रबन्ध क्रियाओं में कम अवधि की व अधिक उपज देने वाली जातियों की कमी, उच्च गुणवत्ता युक्त बीज का न मिलना, बुवाई की उपयुक्त विधि न अपनाना, बीज का कम मात्रा में प्रयोग, असमय बुवाई, अपर्याप्त कृषण क्रियायें, सिंचाई जल की कमी, अपर्याप्त फास्फोरस का प्रयोग, कल्चर का प्रयोग न करना व पादप सुरक्षा में कमी आदि सम्मिलित हैं ।

अनुसन्धान कार्य उच्च स्तर का न होना, अपर्याप्त कृषि प्रसार व प्रशिक्षण कार्यक्रम, सामाजिक व आर्थिक कारणों के अतिरिक्त प्रतिकूल मौसम में इन फसलों को उगाये जाने के कारण इनकी उत्पादकता कम ही रहती है ।

उन्नत कृषि क्रियाओं को अपनाकर दलहनी फसलों का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है ।

कम अवधि में पकने व अधिक उपज देने वाली दलहनी फसलों की बुवाई अधिक से अधिक क्षेत्रफल में करनी चाहिये ।

ऐसा करने से इन दलहनी फसलों को बहुफसली कार्यक्रमों में सम्मिलित किया जा सकता है ।

पादप सुरक्षा के अन्तर्गत बीज से फसलों की वृद्धि तक विभिन्न रसायनों का प्रयोग अवश्य ही करना चाहिये ।

बुवाई से पूर्व कल्चर व फास्फोरस का भूमि में प्रयोग करने से उपज में वृद्धि होती है ।

इसके अतिरिक्त अन्य सस्य क्रियायें जैसे पंक्तिबद्ध बुवाई, खरपतवार नियन्त्रण हेतु रसायनों का प्रयोग तथा उपयुक्त समय पर फसल की कटाई कर लेना लाभकारी रहता है ।


ये भी पढ़ें :-


दलहनी फसलों का उत्पादन बढ़ाने के लिये कृषकों को क्या उपाय करने चाहिये?


दाले शाकाहारी मनुष्यों के लिये प्रोटीन का मुख्य स्रोत हैं ।

एशियाई देशों में शाकाहारी व्यक्तियों की संख्या अधिक है तथा यहाँ की जनसंख्या में गत दशकों में काफी तेजी से वृद्धि हुई है ।

दालों से मनुष्यों को प्रोटीन के अतिरिक्त अन्य पोषक तत्वों की भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता होती है ।

एक स्वस्थ व्यक्ति को औसतन 85 ग्राम दाल का प्रतिदिन सेवन करना चाहिये, परन्तु यहाँ पर जनसंख्या वृद्धि एवं दालों के कम उत्पादन के कारण यहाँ दालों की उपलब्धता घटकर मात्र 30 ग्राम / व्यक्ति रह गई है ।

अतः इस विशाल जनसंख्या को उचित पोषक भोजन उपलब्ध कराने के लिये दालों के उत्पादन को बढ़ाना नितान्त आवश्यक हो गया उन्नत सस्य क्रियाओं को अपनाकर दलहनी फसलों का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है ।


दलहनी फसलों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए उन्नत क्रियाओं की अपनाना चाहिए -


1. उन्नत किस्मों का चुनाव -

कम अवधि में पकने व अधिक उपज देने वाली दलहनी फसलों की बुवाई अधिक से अधिक क्षेत्रफल में करनी चाहिये ।

ऐसा करने से इन दलहनी फसलों की बहुफसली कार्यक्रमों (Multiple cropping pro ammes) में सम्मिलित किया जा सकता है ।


2. दलहनी फसलों की सुरक्षा -

पादप सुरक्षा के अन्तर्गत बीज से फसलों को वृद्धि तक विभिन्न रसायनों का प्रयोग अवश्य ही करना चाहिये ।


3. राइजोबियम कल्चर व उर्वरको का प्रयोग -

बुवाई से पूर्व राइजोबियम कल्चर व फास्फोरस का भूमि में प्रयोग करने से उपज में वृद्धि होती है ।


इसके अतिरिक्त अन्य सस्य क्रियायें जैसे -

  1. पंक्तिबद्ध बुवाई, खरपतवार नियन्त्रण हेतु रसायनों का प्रयोग तथा उपयुक्त समय पर फसल की कटाई कर लेना भी लाभकारी रहता है ।
  2. दलहनी फसलों से पोषक भोजन के अतिरिक्त कृषकों की भूमि की उर्वरा शक्ति में भी वृद्धि होती है ।
  3. इन फसलों की जड़ों में वायुमण्डल में पाई जाने वाली गैसीय अवस्था वाली नाइट्रोजन स्थिर हो जाती है और साथ - साथ मृदा में फास्फोरस की उपलब्धता भी बढ़ती है ।

अत: जिससे उस दलहनी फसल में कम उर्वरकों की आवश्यकता पड़ती है और अगली फसल के लिये भी भूमि में नाइट्रोजन व फास्फोरस की उपलब्धता बढ़ जाती है ।


People also ask (Questions and answers) 


विश्व के कितने प्रतिशत अनाज का उत्पादन भारत में किया जाता है

दलहनी फसल क्या है

दलहनी फसल के उदाहरण

दलहन फसल को लगाने से खेतों में किस तत्व की पूर्ति होती है

दलहनी फसलों की जड़ों में पाया जाता है

तिलहन फसल के नाम

दलहनी फसलों के वानस्पतिक नाम

भारत में दलहन का उत्पादन


भारत में हरित क्रांति के लिए सबसे मुख्य कारण क्या है

भारत में हरित क्रांति के लिए सबसे मुख्य कारक क्या है

खरपतवार कितने प्रकार के होते हैं

कृषि उत्पादन में कमी के कोई दो कारण बताइए

Post a Comment

Please do not enter any spam link in the comment box.

Previous Post Next Post