धान कोन सी फसल है? | dhaan ki fasal | धान की अधिक पैदावार के उपाय?

धान की फसल (dhaan ki fasal) एक महत्वपूर्ण खाद्यान्न फसल है, जिसकी खेती विश्व भर में की जाती है ।

धान विश्व की कुल जनसंख्या के 60% से अधिक का मुख्य भोजन है ।

इसे अधिकांशत: एशिया महाद्वीप के विभिन्न देशों में उगाया तथा खाया जाता है जिनमें चीन, भारत, इण्डोनेशिया, बांग्लादेश, थाईलैण्ड व बर्मा आदि देश प्रमुख है ।


धान विश्व की एक महत्वपूर्ण खाद्यान्न फसल है?

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धान कोन सी फसल है? | dhan ki fasal


भारत में धान को विभिन्न प्रकार के व्यंजनों के रूप में पकाकर खाया जाता है । भारत वर्तमान समय में लगभग 120 मिलियन टन चावल का उत्पादन होता है जो सम्पूर्ण विश्व के उत्पादन का लगभग, 20% है । 

चीन लगभग 190 मिलियन टन चावल का उत्पादन करता है जो कुल का लगभग 30% है । सम्पूर्ण विश्व में चीन के बाद भारत का चावल उत्पादन में द्वितीय स्थान है । 

वर्तमान समय में विश्व में धान का उत्पादन लगभग 600 मिलियन टन है । सम्पूर्ण विश्व की कुल माँग की आपूर्ति करता है । ऐसा अनुमान है कि सन् 2025 तक लगभग 775 मिलियन टन चावल की आवश्यकता सम्पूर्ण विश्व को होगी । 

अतः इतनी अधिक माँग की पूर्ति के लिये यह आवश्यक हो गया है कि उत्पादन वृद्धि के विभिन्न उपायों को विकसित किया जाये जिससे पृथ्वी पर खाद्य सुरक्षा (food security) की स्थिति बनी रहे । 

यहाँ यह तथ्य अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि चावल में चीन का क्षेत्रफल भारत से कम होते हुये भी वहाँ का कुल उत्पादन भारत से अधिक है । चीन में चावल का क्षेत्रफल लगभग 31 मिलियन हैक्टेयर और उत्पादन 190 मिलियन टन है जबकि भारत में इसका क्षेत्रफल लगभग 43 मिलियन हैक्टेयर और उत्पादन 120 मिलियन टन है । 

अतः हमारे देश में धान की उत्पादकता को बढ़ाने के लिये विस्तृत एव प्रचुर सम्भावनायें है । इसके लिये हमें धान की बौनी जातियाँ, संकर बीज का प्रयोग, अधिक कल्लों व दानों वाली जातियों का प्रयोग जैसे अन्य नये सफल वैज्ञानिक उपायों को अपनाकर धान की उत्पादन वृद्धि पर विचार करना चाहिये जिससे विश्व में चावल निर्यात कर विदेशी मुद्रा भी अर्जित की जा सके ।


चावल के औषधीय गुणों एवं महत्व का वर्णन कीजिये? features and impotance of rice

प्राचीनतम् आयुर्वेदिक एवं यूनानी साहित्य के अध्ययन से विदित होता है कि चावल में विभिन्न औषधीय गुणों की क्षमता होती है ।


चावल के गुण एवं महत्व निम्नलिखित है -

  • चावल एक उत्तेजक खाद्य पदार्थ है । 
  • कामोद्दीपक है । 
  • मोटापा बढ़ाने वाला माना जाता है । 
  • बलवर्धक होता है । 
  • अतिसार में यह एक सुरक्षित आहार है । 
  • चावल के माँड का सेवन शरीर को शीतलता प्रदान करता है ।
  • त्वचा सम्बन्धी बीमारियों पर नियन्त्रण में लाभदायक है । 
  • जोड़ों के दर्द निवारण में प्रभावकारी हैं । 
  • लकवे प्रभावित रोगियों के लिये लाभदायक है । 
  • चावल की भूसी सिरदर्द व जीर्णकफ के निवारण में सहायक है ।


भारत का कौन - सा राज्य ‘राइस बाउल' के नाम से जाना जाता है?


चावल की विभिन्न जातियों में विद्यमान औषधीय गुणों के कारण इसका उपयोग प्राचीनकाल से ही आयुर्वेद तथा यूनानी दवाओं में होता जा रहा है ।

आयुर्वेद में चावल को एक उत्तेजक कामोद्दीपक और मोटापा बढ़ाने वाली एक बलवर्धक औषधि के रूप में माना जाता है ।

छत्तीसगढ़ राज्य में चावल की विभिन्न जातियों की खेती प्राचीनकाल से ही की जाती है तथा यहाँ के निवासी इसकी खेती व इसकी जातियों के औषधीय गुणों का परम्परागत ज्ञान रखते हैं ।

इसी कारण से इस राज्य को 'भारत का राइस बाउल' (Rice Bowl of India) के रूप में जाना जाता है ।


धान की अधिक पैदावार के उपाय

धान की फसल (dhaan ki fasal) की पैदावार उसमें की गई कृषि क्रियाएं एवं धान की किस्मों पर निर्भर करती है ।


धान की अधिक पैदावार के लिए प्रमुख उपाय -

  • धान की फसल में पोषक प्रबंधन
  • धान की फसल में जल प्रबंधन
  • धान की उन्नत प्रजातियां
  • धान की फसल में खरपतवार प्रबंधन
  • धान की फसल स्वास्थ्य प्रबंधन


धान की अधिक पैदावार प्राप्त करने के उपाय निम्नलिखित है -

धान की फसल (dhaan ki fasal) की पैदावार उसकी जातियों के चुनाव, भूमि, बुवाई का समय, बुवाई की विधि, खरपतवार नियंत्रण एवं फसल का स्वास्थ्य आदि पर निर्भर करती है ।


धान में समन्वित पोषक प्रबन्धन


धान की फसल (dhaan ki fasal) के लिये खाद एवं उर्वरकों की मात्रा मृदा परीक्षण के पश्चात् ही निर्धारित करनी चाहिये ।

सामान्यतः बुवाई के 50 दिन पूर्व खेत में सड़ी गोबर को खाद की 20-25 कुन्तल मात्रा एक हैक्टेयर खेत में प्रयोग करनी चाहिये ।

धान के एक हैक्टेयर खेत के लिये 100-120 किग्रा. नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है ।

नाइट्रोजन की इस मात्रा की पूर्ति हेतु अमोनियम सल्फेट, अमोनियम क्लोराइड व यूरिया का प्रयोग समान रूप से लाभप्रद रहता है ।

इस नाइट्रोजन का आधा भाग रोपाई के समय, एक चौथाई भाग कल्ले फूटते समय (Tillering stage) तथा शेष एक चौथाई भाग बाली बनने से पूर्व दिया जाना चाहिये ।

रोपाई के समय नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों को खेत में बिखेरकर अच्छी प्रकार मिला देना चाहिये ।

इस समय जल निकास का उत्तम प्रबन्ध होना आवश्यक है ।

एक हैक्टेयर धान की फसल के लिये 50-60 किग्रा. फास्फोरस पर्याप्त होता है ।

फास्फोरस की इस मात्रा की पूर्ति हेतु सिंगल सुपर फास्फेट का प्रयोग उत्तम रहता है ।

धान की सघन खेती हेतु 50-60 किग्रा. पोटाश एक हैक्टेयर खेत में प्रयोग करना चाहिये ।

धान की फसल (dhaan ki fasal) में कभी - कभी खैरा रोग के लक्षण दिखाई पड़ने लगते हैं ।

ऐसा जिंक पोषक तत्व की कमी के कारण होता है ।

इस रोग पर नियन्त्रण हेतु - 40-50 किग्रा० जिंक सल्फेट एक हैक्टेयर खेत में प्रयोग करने की संस्तुति की जाती है ।

धान की फसल (dhaan ki fasal) में उर्वरकों का प्रयोग, फसल की जाति, भूमि की किस्म, बीजांकुर की आयु, जल एवं खरपतवार प्रबन्ध आदि कारकों पर निर्भर करता है ।


धान में समन्वित जल प्रबन्धन


खरीफ मौसम की अन्य फसलों की तुलना में धान की जलमाँग अधिक है नीची भूमियों में धान की खेती करने के लिये 1000-1200 मिमी. जल की आवश्यकता होती है ।

भूमि की तैयारी के समय जल की आवश्यकता भूमि की किस्म के ऊपर निर्भर करती है ।

यह मात्रा 200-300 मिमी. तक हो सकती है ।

धान की नर्सरी तैयार करने के लिये लगभग 50 मिमी व फसल के सम्पूर्ण वृद्धिकाल में लगभग 1000 मिमी. जल की आवश्यकता होती है ।

धान के पौधे के जीवनकाल में जल की अधिक आवश्यकता की क्रान्तिक अवस्थायें होती है ।


धान उगाने के लिये जल प्रबन्धन किस प्रकार करना चाहिये -


( a ) रोपाई से पूर्व ( Before transplanting ) -

धान की पौध की रोपाई से 15 दिन पूर्व खेत को पानी से भर देना चाहिये ।

इस समय खेत की लम्बाई में व आर - पार खेत की जुताई की जाये ।

इसके एक सप्ताह बाद दूसरी बार जुताई करें ।

यदि हरी खाद का प्रयोग किया गया है तो हरी खाद की फसल के पौधों को सड़ने गलने के लिये खेत से 5 दिन के लिये पानी को निकाल देना चाहिये ।

तत्पश्चात् हैरो चलाकर खेत की तैयारी कीजिये ।

खेत में उर्वरकों का प्रयोग (Basal dose) कर लें और खेत में 2-3 सेमी० पानी लगाये ।

पौध की रोपाई के समय खेत में 2-3 सेमी० पानी अवश्य ही खड़ा रहना चाहिये ।


( b ) रोपाई के बाद ( After transplanting ) –

फसल की रोपाई के बाद 2-3 दिन तक खेत में 4-5 सेमी. पानी बनाये रखना चाहिये जिससे पौध को स्थिर होने में सहायता मिलती है ।

पौधों में फूल आने की अवस्था तक 5 सेमी. पानी खेत में बनाये रखना चाहिये ।

अधिकतम कल्ले फूटते समय (Maximum tillering stage) व रोपाई के 40 दिन बाद खेत से 3-4 दिन के लिए अधिकतम कल्ले फूटते समय (Maximum tillering stage) पानी को निकाल देना चाहिये ।

ऐसा करने से पौधों की वृद्धि तेजी से होती है ।

धान की खड़ी फसल में उर्वरकों का प्रयोग (top dressing) करने से पूर्व भी पानी खेत से निकाल देना चाहिये और एक दिन पश्चात् फिर पानी भर देना चाहिये ।

खरपतवारनाशी व कीटनाशी का प्रयोग भी खेत में हल्के पानी की अवस्था में ही करना चाहिये और एक सप्ताह तक यही स्थिति बनाये रखना आवश्यक है ।

पौधों पर फूल आने के 3 सप्ताह पश्चात् खेत से पानी निकाल देना चाहिये ।

धान की फसल (dhaan ki fasal) की दी गई उपरोक्त जलमाँग की पूर्ति सिंचाई के स्रोत से करनी चाहिये तथा वर्षा जल इससे अतिरिक्त होता है ।

अधिक वर्षा की स्थिति में या अनावृष्टि के समय इस जलमाँग को घटाया - बढ़ाया जा है ।


धान की फसल में खरपतवार प्रबन्धन


धान की फसल (dhaan ki fasal) में उगने वाले प्रमुख खरपतवार जगली धान, सावां, मकड़ा, सकता, कोदों, वानरा, दूबघास, सफेद मुर्ग, भंगड़ा, कनकवा, जंगली जूट, मौथा व दुध्दी आदि है ।

इन खरपतवारों पर नियन्त्रण हेतु एक या दो निराई खुरपी की सहायता से की जाती है ।

इसी के साथ - साथ 2, 4 - D व MCPA रसायनों का प्रयोग धान की फसल में खरपतवारों को नष्ट करने के लिये प्रभावकारी रहता है ।

इन रसायनों के प्रयोग की दर व समय विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार अलग - अलग है व विभिन्न खरपतवारों के लिये भी रसायनों की मात्रा भिन्न - भिन्न होती है इस फसल में 2, 4 - D, MCPA तथा 2,4,5T आदि रसायनों का रोपाई (transplanting) के 30 दिन पश्चात् 1 से लेकर 1.5 किग्रा. प्रति हैक्टेयर की मात्रा 500 लीटर जल में घोल बनाकर प्रयोग करना चाहिये ।

उपरोक्त रसायनों के अतिरिक्त चुका है ।

TOKE - 25, बेसालीन, stam F - 34 आदि का प्रयोग भी प्रभावशाली सिद्ध हो ।


धान की सुगन्धित प्रजातियों के नाम


चावल की कुछ जातियों में पकाये जाने पर एक विशेष सुगन्ध पैदा हो जाती है ।

बासमती चावल के नाम से प्रसिद्ध इन जातियों का चावल उत्तम गुणवत्ता और अनोखी सुगन्ध के कारण प्रसिद्ध है ।

पकाने पर इनके दाने पतले, लम्बे, एकसमान तथा खाने में स्वादिष्ट होते है ।


धान की प्रमुख सुगन्धित प्रजातियों के नाम -

  • देहरादूनी बासमती
  • पाकिस्तानी बासमती
  • बासमती -370 आदि है ।


अन्य जातियों की तुलना में सुगन्धित बासमती चावल की उपज कम होती है और इसका बाजार मूल्य अधिक होता है ।

जहाँ अन्य जातियों की उपज क्षमता लगभग 30-40 कुन्तल प्रति हैक्टेयर होती है इसका उत्पादन केवल 15-20 कुन्तल प्रति हैक्टेयर होता है ।


धान का रेट कितना है?

जहाँ साधारण चावल का मूल्य बाजार में 1000 रु० कुन्तल है वहीं बासमती चावल का कीमत 2500 रु०/कुन्तल के लगभग रहता है ।


भारत में चावल की प्रजातियां -

उत्तर पश्चिमी भाग में देहरादून, करनाल, सहारनपुर, अम्बाला तथा पंजाब, उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड के बहुत से क्षेत्रों में उगायी जाता है ।

यद्यपि हमारे देश में सुगन्धित और असुगन्धित दोनों प्रकार का चावल उगाथा जाता है लेकिन उपभोग, महत्व तथा मूल्य के आधार पर सुगन्धित बासमती सर्वोत्तम है ।

न केवल भारतीय अपितु विदेशी लोग भी इसे पसन्द करते हैं ।

इराक, ईरान, कुवैत, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका तथा विश्व के अन्य देशों को सुगन्धित चावल का निर्यात यहाँ से किया जाता है ।


स्वर्ण चावल (गोल्डन राइस)


यह जैव तकनीक का एक प्रायोगिक उदाहरण है ।

यह चावल की एक नवीनतम एवं आनुवंशिक रूप से परिवर्द्धित (Genetically modified) जाति है ।

धान की इस जाति का विकास स्विट्जरलैण्ड के वैज्ञानिक इंगो पाटरीकुश ने किया है ।

इस जाति के चावलों का रंग साधारण जातियों के सफेद रंग से अलग पीला होता है तथा यह बहुत ओजपूर्ण होता है ।

अत: इसे गोल्डन राइस कहते है ।

इसे स्वास्थ्य एवं पोषण की समस्या को हल करने के लिये विकसित किया गया है ।

इसमें विटामिन A की मात्रा तुलनात्मक रूप से अधिक पाई जाती है ।

चावल की यह जाति नेत्र रोगियों के लिये लाभदायक है ।



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