सूरजमुखी की फसल किस प्रकार लाभदायक है इसका महत्व एवं उपयोग लिखिए?

सूरजमुखी विश्व की एक वानस्पतिक तेल वाली महत्वपूर्ण फसल है ।

भारत में सोयाबीन, सरसों एवं मूंगफली के बाद तिलहनी फसलों में सूरजमुखी की फसल (surajmukhi ki fasal) का महत्वपूर्ण स्थान है ।

भारतवर्ष में सूरजमुखी की खेती सभी ऋतु में की जाती है, अतः इसे सभी ऋतुओं की फसल भी कहा जाता है ।

सूरजमुखी की खेती (surajmukhi ki kheti) मुख्य: तेल एवं बीज प्राप्ति के लिए की जाती है ।

सूरजमुखी के बीजों में लगभग 40 से 45% तक तेल तेल की मात्रा पाई जाती है, इसके तेल की गुणवत्ता असंतृप्त वसीय अम्लों की प्रतिशत मात्रा से निर्धारित की जाती है ।

तापमान अनुकूल स्तर से अधिक रहने पर सूरजमुखी के तेल में लिनोलिक की प्रतिशत मात्रा कम रहती है और तेल कम गुणवत्ता युक्त माना जाता है ।

सूरजमुखी एक प्रकाशअनुग्राही फसल है ।


सूरजमुखी की फसल किस प्रकार लाभदायक है?


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सूरजमुखी की फसल का महत्व एवं उपयोग


सूरजुमखी की फसल निम्न प्रकार लाभदायक है -


सूरजमुखी विश्व की एक महत्वपूर्ण तिलहनी फसल है ।

सोयाबीन व सरसों के बाद सम्पूर्ण विश्व में वानस्पतिक तेलों के उत्पादन में सूरजमुखी की फसल (surajmukhi ki fasal) का तीसरा स्थान है ।

इसके बीजों में 45 से 50% तक खाने योग्य तेल (edible oil) की प्राप्ति होती है तथा इसमें 20 % तक प्रोटीन पाई जाती है ।


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सूरजमुखी की फसल का क्या महत्व है?


सभी प्रकार के खाद्य तेलों में सूरजमुखी के तेल का एक विशेष महत्व है ।

सभी खाद्य तेलों में वसीय अम्ल (fatty acids) पाये जाते हैं । ये वसीय अम्ल सन्तृप्त (saturated) अथवा असन्तृप्त (unsaturated  हो सकते हैं ।

तेल में सन्तृप्त वसीय अम्ल की प्रतिशत मात्रा अधिक होने पर उसके उपयोग से मनुष्यों को हृदयवाहिकाओं के रोग (Cardiovascular disease) होने की सम्भावना रहती है ।

अत: खाद्य तेल में सन्तृप्त वसीय अम्लों (saturated fatty acids) की मात्रा कम तथा असन्तृप्त वसीय अम्लों (unsaturated fatty acids) की मात्रा अधिक होनी चाहिये ।

असन्तृप्त अम्लों में लिनोलेनिक अम्ल (Linolenic acid) व लिनोलिक अम्ल (Linolelic acid) पाये जाते हैं ।

सूरजमुखी के तेल में लिनोलेनिक व लिनोलिक अम्लों की कुल मात्रा लगभग 92% तक पाई जाती है जो अन्य खाद्य तेल सरसों व मूंगफली आदि की तुलना में अधिक है ।

अतः चिकित्सकों द्वारा हृदयरोगियों को सूरजमुखी के तेल के प्रयोग की संस्तुति की जाती है ।


सूरजमुखी की फसल के उपयोग


भारत में सूरजमुखी की फसल (surajmukhi ki fasal) तेल एवं बीजों के अतिरिक्त निम्नलिखित उपयोग में लाई जाती है ।

( 1 ) इसके तेल का उपयोग मनुष्य द्वारा भोजन, सब्जी तथा अन्य खाद्य पदार्थों को तैयार करने में किया जाता है ।

( 2 ) इसका तेल अन्य वानस्पतिक तेलों जैसे सरसों एवं तोरिया की तुलना में उच्चकोटि का होता है । यह हृदय रोगियों के लिये अन्य तेलों की अपेक्षा अधिक उपयुक्त होता है ।

( 3 ) यह एक अल्पअवधि में उगने वाली फसल है । अतः इसे बहुफसली फसल चक्रों में सम्मिलित करना सरल रहता है ।

( 4 ) इसकी जड़ें भूमि में गहराई तक जाती हैं अतः इसका पौधा सूखा सहन करने की क्षमता रखताा है ।

( 5 ) सूरजमुखी की फसल भारतवर्ष में वर्षभर के सभी मौसमों में उगाई जाती है । अतः इसे एक सभी ऋतुओं की फसल (All season crop) कहा जाता है ।


सूरजमुखी के पौधों की प्रकाशभिद् प्रवृत्ति को स्पष्ट कीजिये?


सूरजमुखी का पौधा प्रकाशअनुग्राही (phototropic) होता है ।

इसके पौधे का तना एवं पत्तियाँ दिन के समय सूर्य की दिशा की ओर दिष्ट रहते हैं ।

प्रातःकाल के समय पौधे के ये भाग पूर्व दिशा की ओर होते हैं और दोपहर बाद पौधे के ये भाग पश्चिम की ओर होते हैं ।

सूर्य की दिशा के अनुसार पौधे का तना और सम्पूर्ण भाग घूमता जाता है ।

फूल आने के बाद पौधे की यह प्रकाश अनुग्राही गति कम हो जाती है और अन्त में रूक जाती है ।

इस समय पर पुष्पों का मुख केवल पूर्व दिशा की ओर ठहरा रहता है । इसे सूरजमुखी के पौधों का प्रकाशअनुग्राही स्वभाव कहा जाता है ।


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