टमाटर में लगने वाले कीट एवं रोगों का नियंत्रण कैसे करते है? | Farming Study

भारत में टमाटर सब्जी के रूप में उपयोग की जाने वाली एक महत्वपूर्ण फसल है, परंतु टमाटर में लगने वाले कीट एवं रोग (tamaatar ke keet aur rog) की संख्या अधिक होती है, जिनका नियंत्रण करना अति आवश्यक होता है ।


टमाटर की फसल में बहुत से कीट एवं रोग आक्रमण करते हैं, जो टमाटर की खेती (tamatar ki kheti) को काफी नुकसान पहुंचाते हैं जिससे पैदावार में काफी गिरावट देखने को मिलती है ।


टमाटर में मुख्यतः कीट, रोग (कवक रोग, बैक्टीरिया रोग, विषाणु रोग) तथा इसके अलावा टमाटर के कुछ शारीरिक विकार भी है ।


टमाटर में लगने वाले रोग एवं कीटों का नियंत्रण कैसे करते है?


टमाटर की फसल में लगने वाले कीट तथा उनका नियन्त्रण


टमाटर की फसल को बहुत से कीट (Insect) नुकसान पहुंचाते हैं ।


ये भी पढ़ें :-


टमाटर में लगने वाले प्रमुख कीट -

  • टोबैकों कैटरपिलर (Tobacco Caterpillar)
  • टमाटर के फल कीट (Tomato Fruit Worm)
  • इपीलैकना बीटिल (Epilachna Beetle)
  • जैसिड्स (Jacids)
  • दीमक (Termite)


इनमें से प्रमुख कीटों की उनकी नियन्त्रण विधि के साथ नीचे वर्णन किया गया है -


1. टमाटर का टोबैकों कैटरपिलर कीट ( Tobacco Caterpillar ) -


ये काले - भूरे रंग के मजबूत कैटरपिलर होते हैं ।

ये पत्तियों, फलों एवं फूलों को खा जाते हैं ।


इसके नियन्त्रण के लिए -


( i ) इनके अण्डों के समूह तथा कैटरपिलर को एकत्र कर जला देना चाहिये ।

( ii ) एनड्रीन का दो सप्ताह के अन्तर से छिड़काव करना चाहिये ।


2. टमाटर का फल कीट ( Tomato Fruit Worm ) -


यह अत्यधिक हानिकारक कीट है ।

इसके कैटरपिलर पत्तियों तथा अन्य कोमल भागों को खा जाते हैं ।

फलों को काटकर उनमें छेद कर देते हैं ।


इसके नियन्त्रण के लिए -


( i ) प्रभावित भागों को एकत्र कर जला देना चाहिये ।

( ii ) D.D.T. के 0.1 % घोल का दिन के अन्तर से छिड़काव करना चाहिये ।


3. टमाटर का इपीलैकना बीटिल कीट ( Epilachna Beetle ) -


इनके लारवा तथा कीट (adults) पत्तियां खा जाते हैं ।


इसके नियन्त्रण के लिए -


( i ) लारवों तथा कीटों को पकड़ कर मार देना चाहिये ।

( ii ) D.D.T. के 0.1% घोल का छिड़काव करते रहना चाहिये ।


इसके अलावा जैसिड्स तथा दीमक भी टमाटर की फसल (tamatar ki fasal) को नुकसान पहुँचाती हैं ।


टमाटर की फसल में लगने वाले रोग एवं उनका नियंत्रण


टमाटर में कई प्रकार के रोग लगते हैं, टमाटर के पौधे एवं फल को काफी नुकसान पहुंचाते हैं ।


टमाटर की फसल में मुख्यतः तीन प्रकार के रोग लगते हैं -


1. टमाटर के कवक जनित रोग (Fungal Disease)

( i ) आर्द्रगलन रोग
( ii ) फूजेरिअम विल्ट रोग
( iii ) अगेती झुलसा रोग
( iv ) पछेता झुलसा रोग
( v ) पति फफूंदी रोग


2. टमाटर के बैक्टीरिया जनित रोग (Bacterial Disease)

( i ) बैक्टीरियल कैन्कर


3. टमाटर के विषाणु जनित रोग (Virus Disease)

( i ) लीफ कर्ल
( ii ) मौजेक
( iii ) फर्न लीफ


ये भी पढ़ें :-


टमाटर में लगने वाले कवक जनित रोग एवं उनका नियंत्रण


( 1 ) टमाटर का आर्द्रगलन रोग ( Damping off ) -


यह पीथियम डैबरियानम (Plhythium debryanum) कवक से उत्पन्न होता है ।

ये रोग नरसरी बीजांकुर अथवा कोमल पौधों में लगता है ।


रोग जड़ तथा तने के जोड़ के स्थान पर लगता है, वहां की पोषक पत्तियों की मृत्यु के कारण स्थान कोमल, निर्बल एवं आर्द्रयुक्त हो जाते हैं, पौधे गिर जाते हैं तथा अन्ततः मर जाते हैं ।


इसके नियन्त्रण के लिए -


( i ) नरसरी का, भाप (steam) फारमेलीन या कोपर फन्जीसाइड से जीवाणु नाशन (Sterlization) करना चाहिये । 

( ii ) बीजों को बोने से पहले सैरेसन या एप्रोसन से उपचारित कर लेना चाहिये ।


( 2 ) टमाटर का फूजेरिअम विल्ट रोग ( Fuasarium Will ) -


फूजेरियम जातियों (Fuasarium spp.) की कवकों से उत्पन्न होता है ।

इस रोग से पत्तियां पीली पड़ जाती है, उसके बाद पौधा मुरझा जाता है तथा अन्तत: मर जाता है ।


इसके नियन्त्रण के लिए -


( i ) स्वस्थ पौधों से बीज लेना चाहिये ।

( ii ) लग्बे फसल चक्र (long crop rotation) प्रयोग करने चाहिये ।

( iii ) रोग - अवरोधी ( disease resistant ) वैरायटी, जैसे मारग्लोब, रुटगर पीचार्ड, मैनेलुसी बोनी चाहिये ।


( 3 ) टमाटर का अगेता झुलसा रोग ( Early Blight ) -


आल्टरनेरिया सोलेनाई (Alternaria solani) कवक से उत्पन्न होता है ।

इससे पत्तियों तथा हरे फलों पर भूरे धब्बे पड़ जाते हैं ।

फल गिरने लगते हैं तथा पौधा मर जाता है ।


टमाटर के अगेता झुलसा रोग की दवा


( i ) स्वस्थ बीज बोने चाहिये ।

( ii ) कापर फन्जीसाइड से बीजों को उपचारित करके बोना चाहिये ।

( iii ) बोर्डो मिश्रण या बरगन्डी मिश्रण का खडी फसल पर छिडकाव करना चाहिये ।


( 4 ) टमाटर का पछेता झुलसा रोग ( Late Blight ) –


यह रोग फाइटोप्थोरा इन्फेसटान्स (Pirytopt/hora infestans) कवक से उत्पन्न होता है ।

इससे पत्तियाँ, तना तथा फल प्रभावित होते हैं ।

इन पर गहरे भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं तथा सड़न होने लगती है ।


टमाटर के पछेता झुलसा रोग की दवा


( i ) बोर्डो मिश्रण या बरगन्डी मिश्रण का छिड़काव करना चाहिये ।

( ii ) कापर लाइम (Copper lime) की बुरकन (dusting) भी प्रभावकारी होती है ।


( 5 ) टमाटर का पत्ती फफूंदी रोग ( Leaf mould ) -


यह रोग क्लेडोस्पोरियम फल्वम (Cladosporium fitvant) कवक से उत्पन्न होता है ।

इससे पत्तियों की ऊपरी सतह पर हरे - हरे भूरे धब्बे पड़ जाते हैं ।

नम स्थानों में यह अधिक होती है ।

वैटामोल्ड इसकी अवरोधी वैराइटी है ।


टमाटर का बैक्टीरिया से उत्पन रोग एवं उसका नियंत्रण


( 1 ) टमाटर का बैक्टीरियल कैन्कर रोग ( Bacterial Canker ) –


यह रोग Corynebacterum spp. उत्पन्न होता है ।

इसमें तने के अन्दर गहरे भूरे रंग की धारियाँ प्रतीत होती हैं तथा फलों के अन्दर पीले रंग की धारियाँ बन जाती हैं ।

ये रोग बीज तथा भूमि जनित है ।

इसलिये प्रभावित पोधों को उखाड़कर जला देना चाहिये तथा लम्बे फसल चक्र अपनाने चाहिये ।


टमाटर के विषाणु जनित रोग एवं उनका नियंत्रण


( 1 ) टमाटर का लीफ कर्ल रोग ( Leaf Curl ) -


इस रोग में पत्तियाँ ऐंठ कर घूम जाती हैं, छोटी रह जाती है तथा गिरने लगती हैं ।

पोधों की वृद्धि रुक जाती है ।

प्रभावित पौधों को उखाड़कर जला देना चाहिए ।


( 2 ) टमाटर का मौजेक रोग ( Mosaic ) -


यह TMV (Tobacco Mosaic Virus) से फैलता है ।

इस रोग में पत्तियों पर रंगहीन चक्कते (chlorotic blotchs) पड़ जाते हैं ।

ये पत्तियां पीली पड़ जाती है ।

बीच - बीच में हरे भाग रहते हैं ।

प्रभावित पौधों को उखाड़ कर जला देना चाहिये ।


( 3 ) टमाटर का फर्न लीफ रोग ( Fern leaf ) -


इस रोग में पत्तियों का आकार फर्न जैसा हो जाता है ।

अधिक रोग में केवल मध्य शिरा शेष रह जाती है, यह “Cucumber Mosaic Virus" से उत्पन्न होता है तथा अफीड्स द्वारा फैलता है ।

इसलिये अफीड्स पर नियन्त्रण के लिये कीट नाशकों (Insecticides) का उपयोग करना चाहिये तथा रोगी पोधों को उखाड कर जला देना चाहिये ।


टमाटर का मूल ग्रन्थि रोग क्या होता है? 


टमाटर का मूल ग्रन्थि (Root knot of Tomato) -


ये रोग निमटोड (Nematods) मैलेइडोगाइन जातियों (Meloidogyne spp.) से उत्पन्न होता है ।

पौधे की जड़ों में गांठे बन जाती हैं ।

गाँठ अलग - अलग अथवा जंजीर के रूप मे होती हैं ।

ये गोल अथवा लम्बे आकार की होती हैं ।

इनसे पौधे बौने रह जाते हैं, पत्तियां छोटी तथा पीली हो जाती है, अन्ततः पौधा सूख जाता है ।


इसके नियन्त्रण के लिए -


( i ) लम्बे फसल चक्र अपनाने चाहिये ।

( ii ) स्वच्छ कृषि प्रणाली अपनानी चाहिये ।

( iii ) रोग अवरोधी वैराइटी बोनी चाहिये ।

( iv ) भूमि धुमीकरण (soil fumigation) करना चाहिये ।

( v ) नेमेटोसाइड, जैसे निमेजन, DD, जाइनोफोस तथा मिथाइल ब्रोमाइड से भूमि का प्रचरण करना चाहिये ।


टमाटर की शारीरिक विकार


शरीर - क्रियात्मक अनियमितायें (Physiological Disorders) -


( 1 ) पफ ( Puff ) –

इसमें फल हल्के रह जाते हैं ।

ये अन्दर से खाली निकलते हैं ।


( 2 ) कैटफेंस ( Cat face ) -

फलों पर झुर्रियां एवं दांतें पड़ जाते हैं जिससे फल बिल्ली के मुँह के समान प्रतीत होता है ।


( 3 ) सूर्य जलन ( Sun scandling ) –

फलों पर सूर्य के तेज प्रकाश से जलन के धब्बे पड़ जाते हैं ।

स्टेक वाली फसल में फलों पर प्रत्यक्ष प्रकाश पड़ने से अधिक हानि होती है ।


People also ask (Questions and answers) 


टमाटर में कीड़ा लगने की दवा

टमाटर में मकड़ी की दवा

टमाटर में झुलसा रोग की दवा बताइए

टमाटर का फल बढ़ाने की दवा


टमाटर में फल आने की दवा

टमाटर में गलन रोग

टमाटर में फल फूल की दवा

टमाटर के रोग की दवा

टमाटर में इल्ली की दवा

टमाटर का पौधा मर रहा है

टमाटर की पत्तियों का सिकुड़ना

टमाटर की शारीरिक विकार

Please do not enter any spam link in the comment box.

Post a Comment

Please do not enter any spam link in the comment box.

Post a Comment (0)

Previous Post Next Post