आम की फसल में लगने वाले प्रमुख कीट एवं रोगों के नियंत्रण के उपाय बताएं?

आम की फसल में कीट एवं रोग (aam ke keet aur rog) अधिक लगते हैं, जिनका नियंत्रण करना अति आवश्यक होता है अन्यथा पैदावार में गिरावट देखने को मिलती है ।


आम भारत के महत्वपूर्ण फलों में से एक है जिसका उपयोग सांस्कृतिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण माना जाता है ।


आम की खेती (aam ki kheti) भारत के लगभग सभी राज्यों में की जाती है और उचित  सस्य क्रियाएं अपनाकर अच्छी पैदावार प्राप्त की जाती ।


आम की फसल में लगने वाले प्रमुख कीट -

  • कुटकी या भुनगा ( Mango hoppers )
  • आम का चेपा ( Meely bug )
  • तना बेधक ( Stem borer )
  • प्ररोह छिद्रक ( Shoot borer )
  • पत्तियाँ काटने वाली वीविल ( Leaf cuting weevil )
  • फल की मक्खी ( Fruit Fly )
  • स्टोन वीविल ( Stone weevil )
  • दीमक ( Termites )


आम की फसल में लगने वाले प्रमुख रोग -

  • चूर्णिल आसिता ( Powdery mildew )
  • श्यामव्रण ( Anthracnose )
  • कज्जली फफूंद ( Shooty mould )
  • आम विशुष्क अग्र ( Mango wither tip )


आम में लगने वाले कायिकी रोग -

  • काला सिरा रोग ( Black tip )
  • पत्तियों का झुलसना ( Leaf scorch )
  • मालफोर्मेशन या बच्ची टॉप ( Malformation or Bunchy Top )


मालफोर्मेशन के कारण -

  • कवक ( Fungus )
  • विषाणु ( Virus )
  • एक्रोलोजिकल ( Acarological )
  • कायिकीय ( Physiological )


मालफोर्मेशन के प्रकार -

  • वानस्पतिक मालफोर्मेशन ( Vegetative malformation )
  • पुष्पीय मालफोर्मेशन ( Floral malformation )


आम की फसल में लगने वाले प्रमुख कीट एवं रोगों के नियंत्रण के उपाय बताएं?

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आम की फसल में लगने वाले प्रमुख कीट एवं रोगों के नियंत्रण के उपाय बताएं?


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आम की फसल में लगने वाले कीट एवं उनका नियंत्रण


( 1 ) कुटकी या भुनगा ( Mango hoppers ) -

यह आम पर फूल आने के समय लगने वाला बहुत हानिकारक कीट है । ये बहुत छोटे, शफान आकृति वाले (Wedge shaped), भूरे रंग के होते हैं, जो आम की नयी पत्तियों व फूल का रस चूसते हैं । प्रभावित अंग पर इनके द्वारा छोड़े गये स्त्राव से कज्जली फफूंदी (Shooty mould) का आक्रमण होता है । अधिक आर्द्रता व बादल छाये रहने से, इन कीटों का प्रकोप अधिक होता है ।


नियन्त्रण के उपाय -

इसके नियन्त्रण के लिए 0-15 % मेलाथियॉन या 0.2% डायजिनान या 0.04% एलड्रिन या 0-15% कार्बोरिल या 0-05% फास्फोमिडान या 0-04% नुवाक्रान का छिड़काव फूल आने व फल बनने के समय करना चाहिए ।


( 2 ) आम का चेपा ( Meely bug ) -

यह कीट उत्तर प्रदेश में आम को अधिक हानि पहुँचाता है । इस कीट की मादा सफेद, कोमल तथा मन्द गति से रेंगने वाली होती है । यह कोमल शाखाओं तथा फूलों के डंठलों पर फरवरी से मई तक चिपका हुआ पाया जाता है और कोमल भागों का रस चूसकर एक लसलसा पदार्थ छोड़ता है जो कि फफूंदी रोगों को प्रोत्साहन देता है । इससे ग्रसित फूल बिना फल बनाये ही गिर जाते हैं ।


नियन्त्रण के उपाय -

इसकी मादा मिट्टी में गर्मियों में अंडे देती है । अत: मई - जून में पौधे के तने के पास 2 मीटर अर्द्धव्यास में मिट्टी खोदने से कुछ अन्डे नष्ट हो जाते हैं । नवम्बर - दिसम्बर में तने पर भूमि से 60 से० मी० ऊँचाई पर 20 से० मी० चौड़ाई में छाल की दरारों को चिकनी मिट्टी से भरकर, पौलीथीन की पट्टी बाँधने से कीट ऊपर नहीं चढ़ पाते हैं । अन्डी का तेल व बिरोजा 4:5 के अनुपात में मिलाकर पट्टियों पर लेप करके भी ये तनों पर बाँधी जाती है । इसके निम्फ यदि ऊपर पौधे पर पहुँच गये हों तो नुवाक्रान 0.04%, डायजिनान 0-05% का छिड़काव करना चाहिये । दिसम्बर में फौलीडॉल (2% धूल), 500 ग्राम प्रति पौधा या पैराथियॉन (2% धूल), 250 ग्राम प्रति पौधा, थामले में मिलाना लाभकारी है ।


( 3 ) तना बेधक ( Stem borer ) -

यह कीट अधिकतर उपेक्षित एवं पुराने फलोद्यानों में अधिक लगता है । यह तने में छेद करके टेढी - मेढ़ी सुरंगें बना लेता है, जिससे ग्रसित भाग को पर्याप्त क्षति हो जाती है ।


नियन्त्रण के उपाय -

रूई को मिट्टी के तेल या पेट्रोल या फॉर्मेलीन में भिगोकर छेदों में भर कर ऊपर से चिकनी मिट्टी से बन्द कर देना चाहिए । छेदों में तार डालकर घुमाने से भी कीट मारे जा सकते हैं ।


( 4 ) प्ररोह छिद्रक ( Shoot borer ) —

यह सूड़ी आम की नयी प्ररोहों में ऊपर से नीचे को छिद्र बना लेती हैं । जिससे क्षतिग्रस्त भाग मर जाते हैं ।


नियन्त्रण के उपाय -

प्रभावित भाग को काटकर जला देना और नयी वृद्धि के समय नुवाक्रॉन 0.04% का छिड़काव करना चाहिए ।


( 5 ) पत्तियाँ काटने वाली वीविल ( Leaf cuting weevil ) —

वर्षा ऋतु के पश्चात् नयी पत्तियों पर इस कीट का आक्रमण अधिक पाया जाता है । यह आधार की ओर से पत्तियों को काटता है ।


नियन्त्रण के उपाय -

0.1% मेलाथियॉन का छिड़काव करके इसे नियंत्रित किया जा सकता है ।


( 6 ) फल की मक्खी ( Fruit Fly ) —

यह मक्खी फल के गूदे के अन्दर फलों के पकते समय अन्डे देती है । कुछ दिनों में अन्डों से सफेद मैगट्स निकलकर गूदा खाना प्रारम्भ कर देते हैं और प्रभावित फल गिर जाते हैं ।


नियन्त्रण के उपाय -

फलों को पकने से पूर्व ही वृक्ष से तोड़ लेना और प्रभावित फलों को एकत्र कर नष्ट कर देना चाहिए । प्रौढ़ मक्खियों को मारने के लिए वृक्षों पर जहरीली गोलियाँ लटका देना और 0.02% फास्फॉमिडॉन का छिड़काव करना चाहिए ।


( 7 ) स्टोन वीविल ( Stone weevil ) —

यह आम बनने की प्रारम्भिक अवस्था में आक्रमण करता है । जब फल मटर के आकार के होते हैं तो वीविल फल की सतह पर अन्डे देती है और अन्डों से ग्रब निकलकर गुठली में छेद करके प्रवेश कर जाते हैं । ये अपना पूरा जीवन चक्र यहीं पूरा करते हैं और अपने मल पदार्थ से फल के गूदे को खराब कर देते हैं । इनकी क्षति फल काटने पर ही पता चलती है ।


नियन्त्रण के उपाय -

फलोद्यान में सफाई और अगस्त माह में प्रौढ़ कीटों को नष्ट कर देना चाहिए ।


( 8 ) दीमक ( Termites ) -

यह युवा पौधों को ग्रीष्म ऋतु के शुष्क मौसम में अधिक हानि पहुँचाती है पौधे की प्रारम्भिक अवस्था में इसकी जड़ों पर आक्रमण पौधे की मृत्यु का कारण बनता है ।


नियन्त्रण के उपाय -

वर्षा प्रारम्भ होने पर 0-2% डी० डी० टी० पौधे के चारों ओर मिट्टी में मिला देनी चाहिए । बी० एच० सी० (5%) या एलड्रिन या हैफ्टाक्लोर को भी पौधों के थामलों में मिलाया जा सकता है ।


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आम की फसल में लगने वाली रोग एवं उनका नियंत्रण


( 1 ) चूर्णिल आसिता ( Powdery mildew ) —

यह रोग ऑडियम जाति (Oidium sp.) के कवक द्वारा उत्पन्न होती है और आम का प्रमुख रोग है । इसके प्रकोप से फूलों व छोटे पत्तों पर सफेद चूर्ण सा दिखाई पड़ता है । प्रभावित अंग बाद में गहरे भूरे रंग के हो जाते हैं । फूल व फल झड़ जाते हैं और फसल को बहुत हानि पहुँचती है ।


नियन्त्रण के उपाय -

घुलनशील गंधक का 0-2% घोल छिड़कने से नियंत्रित किया जा सकता है । यह छिड़काव 15 दिन के अन्तर से तीन बार, पहली बार फूल आने से पहले, दूसरी बार फूल आते समय और तीसरी बार फूल आने के बाद करना चाहिए । कैराथीन का छिड़काव भी लाभकारी रहता है ।


( 2 ) श्यामव्रण ( Anthracnose ) —

यह रोग कोलेटोट्राइकम जाति (Collectorricum sp.) के कवक द्वारा होता है । यह कवक पौधे की शाखाओं, पत्तियों, फूलों तथा फलों के कोमल भागों पर आक्रमण करता है । अधिक आर्द्रता में यह रोग अधिक फैलता है । पत्तियों पर गहरे भूरे रंग के चकत्ते पड़ जाते हैं । यह रोग मंजरी अंग मारी तथा फल सड़न के रूप में भी प्रकट होता है ।


नियन्त्रण के उपाय -

रोगी पौधों पर 0-2% ब्लाइटाक्स या फाइटालॉन या बोडों मिश्रण (3:3:50) का छिड़काव फरवरी से मई के मध्य तक दो - तीन बार करना चाहिए ।


( 3 ) कज्जली फफूंद ( Shooty mould ) -

यह आई स्थानों पर अधिक पाया जाता है । यह भुनगा कीट (hopper) के द्वारा पौधों पर चिपचिपा पदार्थ छोड़ने के बाद आक्रमण करता है । प्रभावित अंगों पर काली फफूंदी विकसित हो जाती है ।


नियन्त्रण के उपाय -

इसके नियंत्रण के लिए भुनगे के नियंत्रण के पश्चात् चूने व गन्धक (1:40) का छिड़काव प्रभावशाली रहता है ।


( 4 ) आम विशुष्क अग्र ( Mango wither tip ) —

यह रोग कोलेटोट्राइकम जाति के कवक द्वारा होता है । इसके आक्रमण से शाखायें अन भाग की ओर से सूखना प्रारम्भ कर देती हैं ।


नियन्त्रण के उपाय -

प्रभावित शाखाओं को काटकर जला देना और कटे भाग पर बोडों पेस्ट लगा देना चाहिए । रोगग्रस्त पौधों पर जिनेब 0-2% या बोडों मिशण (4:4:50) का छिड़काव करना चाहिए ।


आम में लगने वाले कायिकी रोग


( 1 ) काला सिरा रोग ( Black tip ) -

यह रोग ईंट के भट्टों के समीप अधिक होता है । भट्टे से सल्फर डाइआक्साइड, एसीटिलीन और कार्बन मोनोक्साइड गैसे निकलती हैं, जिससे फल के निचले सिरे पर पहले भृरा व बाद में काला दाग पड़ जाता है है । ऐसे फल पकने से पूर्व ही गिर जाते हैं ।


नियंत्रण के उपाय -

इस रोग से बचने के लिए यह आवश्यक कि भट्टे की चिमनी 15-18 मीटर ऊँची हों । बोरेक्स 0.6% या कास्टिक सोडा 0.8% का छिड़काव, अप्रैल - मई में 2-3 बार करना चाहिए ।


( 2 ) पत्तियों का झुलसना ( Leaf scorch ) —

यह रोग पत्तियों में क्लोराइड आयन की अधिकता से होता है । आरम्भ में पत्तियों का अग्र भाग एवं बाद में पूरी पत्ती ईंट के रंग जैसी लाल हो जाती है और ऐसी दिखलायी पड़ती है जैसे झुलस गयी हो । इसके कारण पत्तियों में पोटाश का स्तर नीचा हो जाता है ।


नियंत्रण के उपाय -

गिरी हुई पत्तियों को पौधे के पास से उठाकर जला देना और पोटेशियम क्लोराइड उर्वरक का प्रयोग नहीं करना चाहिए । सिंचाई के पानी में क्लोराइड की मात्रा नहीं होनी चाहिए । पोटेशियम क्लोराइड उर्वरक के स्थान पर पोटेशियम सल्फेट का प्रयोग करना चाहिए । इस सम्बन्ध में शोध कार्य जारी है ।


( 3 ) मालफोर्मेशन या बच्ची टॉप ( Malformation or Bunchy Top ) -

उत्तरी भाग में यह आम की एक गम्भीर समस्या है । यद्यपि समस्त भारतवर्ष में, आम की अधिकांश जातियाँ कम अथवा अधिक मात्रा में इस व्याधि से ग्रसित होती हैं, परन्तु उत्तरी - पश्चिमी भारत (उत्तर प्रदेश, दिल्ली एवं पंजाब) में इसका प्रकोप अधिक है ।

भारत में यह रोग बहुत पहिले से पाया जाता है परन्तु सर्वप्रथम सन् 1891 में यह दरभंगा (बिहार) में पहचाना गया ।


उत्तरी भारत की व्यवसायिक जातियाँ - 

बम्बई हरी व आम्रपाली मालफोर्मेशन से अधिक ग्रसित होती हैं, दशहरी उनसे कम एवं चौसा तथा लंगड़ा बहुत कम ग्रसित होता हैं । पुरानों की अपेक्षा युवा पौधे इस रोग से अधिक प्रभावित होते हैं ।


मालफोर्मेशन के कारण ( Causes of malformation )


इस समस्या के कारणों की अभी तक सही जानकारी नहीं हो पाई, यद्यपि शोधकार्य जारी है ।


कारणों के संबंध में वैज्ञानिकों द्वारा अनेक परिकल्पनायें की गई हैं एवं उनके विभिन्न मत हैं ।


जिनका उल्लेख निम्नलिखित है -


( 1 ) कवक ( Fungus ) -

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के पादप रोग वैज्ञानिकों के अनुसार यह रोग फ्यूजेरियम मोनीलीफोर्म (Fusarium moniliform) नामक कवक के द्वारा होता है, परन्तु पन्तनगर कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक इसका कारण फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम (F. oxysporum) कवक को मानते हैं । ये वैज्ञानिक खुले क्षेत्र में उक्त कवकों द्वारा पौधों में इस रोग को उत्पन्न करने में असमर्थ रहे ।


( 2 ) विषाणु ( Virus ) —

यह व्याधि उन क्षेत्रों में अधिक पाई गई, जहाँ आम के भुनगों (Mango hoppers) का प्रकोप अधिक था । अत : कुछ वैज्ञानिकों ने यह माना कि यह रोग विषाणु के द्वारा होता है, जिससे हॉपर्स एक पौधे से दूसरे पौधे में फैलाते हैं । परन्तु इसके पुष्टीकरण हेतु स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले ।


( 3 ) एक्रोलोजिकल ( Acarological ) -

समय - समय पर विभिन्न माइट्स (Mites) जैसे- ऐकेरिया मेन्जीफेरा, चिलेटोगिनास आरनेटस व टाइफेलोड्रोमस डेनेनस आदि के द्वारा इस रोग को फैलने के सम्बन्ध में अनुसंधान किये गये । सहारनपुर में किये गये शोधकार्य के अनुसार माइट्स की संख्या व मालफोर्मेशन के प्रकोप के बीच कोई आपसी सम्बन्ध नहीं पाया गया ।


( 4 ) कायिकीय ( Physiological ) -

सर्वप्रथम अधिक मृदा नमी को इस व्याधि का कारण माना गया । अध्ययनों के परिणामस्वरूप, पादप पोषण व मालफोर्मेशन के प्रकोप के मध्य भी कोई आपसी सम्बन्ध नहीं पाया गया ।


भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान पर किये गये शोधकार्य के अनुसार सम्भवतयः मालफोर्मेशन पौधे के अन्दर उपस्थित वृद्धि नियन्त्रक पदार्थों के स्तर के द्वारा नियंत्रित होती है ।


एक अन्य अध्यया के अनुसार इस रोग से प्रभावित पुष्पक्रम की अपेक्षा स्वस्थ पुष्पक्रम में आर० एन० ए० व डी० एन० ए० का स्तर अधिक पाया गया ।


इसी संस्थान पर विगत वर्षों में किये गये कार्यों के परिणाम स्वरूप पाया गया कि एन० ए० ए० का छिड़काव व व्याधि से प्रभावित भाग को काटने से, पौधों से लाभदायक उपज प्राप्त की जा सकती है ।


नियन्त्रण के उपाय ( Control measures ) -


यद्यपि समय - समय पर इस व्याधि के नियन्त्रण हेतु अनेक उपाय सुझाये गये हैं, परन्तु अभी तक इस व्याधि को नियन्त्रित करने से पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं हुई है ।


यदि निम्नलिखित उपाय किये जायें तो इस समस्या के निराकरण में काफी सफलता प्राप्त की जा सकती है -

  1. अक्टूबर माह के प्रथम सप्ताह में एन० ए० ए० (200 पी० पी० एम०) का छिड़काव करें ।
  2. समस्त प्रभावित भागों को लगभग 15 से० मी० नीचे से काटकर नष्ट कर देना चाहिये तथा केप्टान 0.2% एवं मेलाथिऑन 0.1% का छिड़काव करना चाहिए । दस दिन पश्चात् यही छिड़काव दुबारा करना चाहिए ।
  3. जुताई - गुड़ाई, सिंचाई, पादप सुरक्षा व कृन्तन आदि क्रियायें सही समय पर एवं उचित मात्रा में करने चाहिये ।
  4. खाद एवं उर्वरकों को उचित समय पर एवं निर्धारित मात्रा में देना चाहिये ।
  5. पादप प्रवर्धन हेतु स्वस्थ मूलवृन्त व सांकुर डाली का प्रयोग करना चाहिये ।
  6. जनवरी माह में, फल कलिका बनने से पूर्व एन० ए० ए० (200 पी० पी० एम०) का छिड़काव करने से पुष्पीय मालफोर्मेशन का प्रकोप कम होता है तथा अधिक उपज प्राप्त होती है ।


मालफोर्मेशन के प्रकार ( Type of malformation )


पौधों के प्रभावित अंगों के अनुसार मालफोर्मेशन दो प्रकार की होती है -


( 1 ) वानस्पतिक मालफोर्मेशन ( Vegetative malformation ) —

यह छोटे पौधों में अधिक पायी जाती है । इसमें प्ररोह के अग्रभाग में इन्टरमोड़ की लम्बाई कम हो जाती है तथा छोटे - छोटे अनेक प्ररोहों की वृद्धि हो जाती है । पत्तियाँ छोटी होकर गुच्छे का रूप धारण कर लेती हैं । 


( 2 ) पुष्पीय मालफोर्मेशन ( Floral malformation ) -

पुष्पीय मालफोर्मेशन में पुष्प सभी अंग मोटे हो जाते हैं । पुष्पक्रम की बढ़वार कम हो जाती है तथा उसमें नर फूलों की संख्या बढ़ जाती है । पुष्प क्रम के फूल बड़े आकार के हो जाते हैं तथा पुष्पक्रम गुच्छे का रूप धारणा कर लेते हैं । उन पर फल नहीं बनते व कुछ समय उपरान्त पुष्पक्रम झड़ जाते हैं ।


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