टिकाऊ खेती/स्थाई कृषि में खरपतवार प्रबंधन की विधियां लिखिए

हरित क्रान्ति के बाद जैसे - जैसे कृत्रिम रसायनों का बोलबाला खेती में बढ़ा वैसे - वैसे टिकाऊ खेती/स्थाई कृषि में खरपतवार नियंत्रण के लिए भी अनेक खरपतवारनाशियों का विकास एवं प्रयोग बढ़ता गया ।

हरित क्रान्ति के मूल्यांकन में जब इसके पर्यावरणीय, पारिस्थितिकीय एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में गंभीर परिणाम पाये गये तो खरपतवार नियंत्रण की दूसरी विधियों को देखा/जाँचा गया ।

इसी कड़ी में टिकाऊ खेती/संपोषित कृषि प्रणाली ने खरपतवार नियंत्रण की अनेक सुरक्षित विधियों/तकनीकों का सफल उपयोग करना प्रारम्भ कर दिया है ।


टिकाऊ खेती/स्थाई कृषि में खरपतवार प्रबंधन की विधियां लिखिए? | weed control in sustainable farming in hindi

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टिकाऊ खेती/स्थाई कृषि में खरपतवार प्रबंधन की विधियां लिखिए 

खरपतवार प्रबन्धन की विधियाँ लिखिए? | methods of weed management in hindi


टिकाऊ खेती/स्थाई कृषि में खरपतवार प्रबंधन की प्रमुख विधियां -

  • परम्परागत विधियाँ ( Traditional Methods )
  • आधुनिक विधियाँ ( Modern Methods )
  • टिकाऊ खेती की विधियां ( Sustainable Agricultural Methods )

उत्तम उत्पादन के लिए आवश्यक है कि खरपतवारों से फसल को होने वाली हानि को रोक दिया जाये अथवा यथासंभव कम कर दिया जाये । इसके लिए की गई शस्य क्रियायें ही खरपतवार प्रबन्धन कहलाता है ।


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खरपतवार प्रबन्धन की विधियों को अनेक प्रकार से वर्गीकृत किया जाता है -

1. परम्परागत विधियाँ ( Traditional Methods ) -

मानव किसान के रूप में खरपतवारों की समस्या का सामना आदिकाल से ही करता रहा है इसलिए और इनके उन्मूलन/नियंत्रण के मानवीय प्रयास भी कृषि प्रारम्भ होने के साथ ही उदित हो गये थे । खेती की परम्परागत विधियों में निराई - गुड़ाई, जला देना, उखाड़ देना और चारे के रूप में खिला देना आदि सम्मिलित हैं ।


2. आधुनिक विधियाँ ( Modern Methods ) -

आधुनिक काल में विशेष रूप से हरित क्रांति के बाद जब रासायनिक उपायों को अपनाकर तेजी से उत्पादन बढ़ाने की होड़ लगी तो खरपतवार प्रबन्धन पर भी इसका प्रभाव दिखाई दिया और खरपतवारों पर शीघ्रता, सरलता और प्रभावी नियंत्रण के लिए अनेक रसायन व रोगाणु विकसित और प्रयुक्त किये जाने लगे ।


3. टिकाऊ खेती की विधियां ( Sustainable Agricultural Methods ) -

आज जब खेती के पूर्वगामी तौर-तरीकों की सफलता पर उंगली उठाई जाने लगी, परिणाम भी प्रतिकूल मिलने लगे और यहां तक कि इनके दुष्प्रभाव भी सामने आने लगे तो खेती के एक नए दर्शन एवं दृष्टि का विकास किया गया । जिसके अंतर्गत 'खेती प्राकृतिक के साथ' और 'खेती प्रकृति के सहयोग से' विकसित की जाने लगी ऐसे ही प्रणालीगत रूप में टिकाऊ खेती कहा जा रहा है ।

इसके अंतर्गत कृषि के लगभग सभी सस्य क्रियाओं में अमूल - चूल परिवर्तन किया गया है और इसी क्रम में खरपतवार नियंत्रण की भी नई नई विधियां सामने आ रही है । अथवा पुरानी वीडियो का नवीन रूपांतरण अपनाया जा रहा है विशेष रूप से इसके अंतर्गत फसल चक्र संशोधन, मिश्रित खेती, तलवार का उपयोग एवं जैविक गोल आदि का प्रयोग किया जा रहा है।


टिकाऊ खेती में खरपतवार प्रबन्धन | sustainable agricultural weed management in hindi


टिकाऊ खेती में खरपतवार प्रबन्धन की विधियां -

  • खरपतवार का प्रयोग खाद/पलवार के रूप में करना
  • बुआई के समय में परिवर्तन
  • खरपतवारों के बीच खेती

टिकाऊ खेती प्रकृति के साथ और प्रकृति के सहयोग से की जाने वाली खेती है । इसके अंतर्गत खेती का सिद्धान्त है - 'प्रकृति को अपना काम करने दो इसी से परिणाम सुखद होंगे ।'


टिकाऊ खेती में प्रमुख रूप से खरपतवार प्रबन्धन की निम्न विधियाँ महत्त्वपूर्ण हैं -

1. खरपतवार का प्रयोग खाद/पलवार के रूप में करना -

खरपतवार तभी नुकसान करती है जब वह फसल से ऊपर जाने लगे या उसमें फल या बीज बनने लगे । तभी उसे निकालने की जरूरत है । निकाल कर भी उस का खाद या भूमि ढकने (पलवार लगाने) में प्रयोग करना चाहिये । उसे खेत से बाहर फेंकने की जरूरत नहीं है । वैसे, इस तरह की खेती में खरपतवार की समस्या भी कम रहती है । एक तो इसलिये कि जुताई कम से कम की जाती हैं दूसरा कारण यह है कि रासायनिक खाद के प्रयोग से खरपतवार को सहज उपलब्ध पोषक तत्त्व एकदम से मिल जाते हैं जिससे वह तेजी से बढ़ती हैं । परन्तु कुदरती खेती में खरपतवार को इस तरह से यूरिया जैसा सहज उपलब्ध पोषक तत्त्व (जैसे मरीज को ग्लूकोस) नहीं मिलता इसलिये खरपतवार की समस्या कम रहती है ।


2. बुआई के समय में परिवर्तन -

पिछली फसल को काटने के पूर्व ही यदि नई फसल के बीज बो दिए जायेंगे तो इस फसल के बीज खरपतवार के पहले अंकुरित हो जायँगे । जाड़े की फसल के बीज चावल काटे जाने के बाद ही फूटेंगे, लेकिन तब तक जाड़े की फसल काफी उग आई होगी । गर्मी का खरपतवार जौ और राई की फए कटने के बाद अंकुरित हो जाता है, लेकिन उस समय तक चावल की फसल काफी बढ़ चुकी होती होगी । बीजों की बोनी इस ढंग से करें कि दोनों फसलों के बीच कोई अंतर न रहे । इससे अनाज के बीजों को खरपतवार से पहले ही अकुरित हो, बढ़ने का अवसर मिल जाता है । साथ ही, फसल कटनी के तुरन्त बाद खेतों में पुआल फैला देने में खरपतवार का अंकुरण बीच में ही रुक जाता है । अनाज के साथ ही भूमि आवरण के रूप में सफेद मेथी भी बो देने से खरपतवार को नियंत्रित रखने में मदद मिलती है ।


3. खरपतवारों के बीच खेती -

खरपतवार नियंत्रण की सर्वाधिक क्रांतिकारी विधि का प्रदर्शन करते हुए जापान के कृषि वैज्ञानिक मासानोबू फुकुओका अपनी पुस्तक 'एक तिनके से आई क्रांति' में लिखते हैं - “बीस साल पहले जब मैं अपने फल - बागों में स्थाई भूमि आवरण उगाने में लगा था, तब देश के किसी भी खेत या फल - बाग में घास का एक तिनका भी नजर नहीं आता था । मेरे जैसे बागानों को देखने के बाद ही लोगों की समझ में आया कि फलों के पेड़, घास और खरपतवार के बीच भी बढ़ सकते हैं । आज, नीचे घास उगे हुए फलबाग आपको जापान में हर कहीं नजर आ जाएँगे तथा बिना घास - आवरण के बागान अब दुर्लभ हो गए हैं । यही बात अनाज के खेतों पर भी लागू होती है । चावल, जौ तथा राई को, सारे साल भर, मेथी और खरपतवार से ढंके खेतों में भी मजे से उगाया जा सकता है ।"

( इस विधि के अंतर्गत मेथी, जौ अथवा राई आदि का प्रयोग खेत को हरा भरा बनाने और खरपतवार के विकास के रोकने के लिए किया जाता है । इनके साथ जब मुख्य फसल जैसे - धान, गेहूँ आदि की छिद्र विधि से बीजाई की जाती है तो गेहूँ धान आदि फसलीय पौधे खरपतवार से ऊपर निकलकर लहराने लगते हैं और नीचे भूमि की सतह पर मेथी, जौ अथवा राई के साथ खरपतवार बने रहते हैं । इससे फसल की उपज में कोई विशेष गिरावट नहीं होती । जबकि भूमि पर उगे खरपतवार खेत की नमी को सूरज की धूप से एक प्राकृतिक आवरण के रूप में बचाये रखते हैं । )

"खेती का यह तरीका जापान की प्राकृतिक स्थितियों के अनुसार विकसित हुआ है, लेकिन मैं सोचता हूँ कि प्राकृतिक खेती को अन्य क्षेत्रों में अन्य देसी फसलें उगाने के लिए भी अपनाया जा सकता है । मसलन जिन इलाकों में पानी इतनी आसानी से उपलब्ध नहीं होता, वहाँ पहाड़ी चावल, ज्वार, बाजरा या कुटकी को उगाया जा सकता है । वहाँ सफेद मेथी की जगह मेथी की अन्य किस्म अल्फा - अल्फा, मोठ या दलहन खेतों को ढंकने के लिए ज्यादा अच्छे उपयोगी साबित हो सकते हैं । प्राकृतिक कृषि उस इलाके की विशिष्ट परिस्थितियों के मुताबिक अपना अलग रूप धारण कर लेती हैं, जहाँ उसका उपयोग किया जा रहा हो । इस प्रकार की खेती की शुरुआत करने से पूर्व कुछ थोड़ी निंदाई, छंटाई या खाद बनाने की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन बाद में हर साल इसमें क्रमश: कमी लाई जा सकती है । आखिर में जाकर सबसे महत्त्वपूर्ण चीज कृषि तकनीक के बजाए किसान की मनस्थिति ही ठहरती है ।"


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टिकाऊ खेती पूर्व विधियों की असफलता लिखिए? | failure of pre sustainable agricultural methods in hindi

टिकाऊ खेती प्रणाली के विकास, प्रयोग एवं प्रचलन से पूर्व प्रयोग की जा रही परम्परागत एवं आधुनिक खरपतवार प्रबन्धन की विधियाँ अपनी किन्हीं कमियों/कमजोरियों के कारण असफल रही हैं ।


इनकी असफलताओं को निम्नानुसार देखा जा सकता है -

1. परम्परागत विधियों की असफलता ( Failure of Traditional Methods ) -

खरपतवार प्रबन्धन की परम्परागत विधियों में निराई - गुड़ाई सबसे अधिक लोकप्रिय रही है । इसमें मिट्टी की ऊपरी परत को बार - बार खुरचा - खोदा जाता है । इस विधि की हानि को मासानोबू फुकुओका अपनी पुस्तक 'एक तिनके से आई क्रांति  में समझाते हुए लिखते हैं -

“खरपतवार की समस्या से निपटने का प्रचलित तरीका मिट्टी को परिष्कृत करने का है, लेकिन जब हम ऐसा करते हैं तो मिट्टी के भीतरी गहरे बैठे हुए, वे बीज, जो वैसे अंकुरित नहीं होते, सजग होकर अंकुरित हो उठते हैं । साथ ही तेजी से बढ़ने वाली किस्मों को इन परिस्थितियों में बढ़ने का बेहतर मौका मिल जाता है । अत: आप कह सकते हैं कि जो किसान जमीन की जुताई - गुड़ाई करके खरपतवार को काबू में लाने का प्रयत्न करता है, वह वास्तव में अपने दुर्भाग्य से ही बीज बो रहा होता है ।"

साथ ही इससे मिट्टी की ऊपरी परत में मौजूद लाभकारी जीवाणुओं की हानि हो जाती है और मिट्टी को उपजाऊ बनाने की लाभकारी प्रक्रिया बाधित हो जाती हैं और साथ ही इससे भूमि की आवश्यक नमी को हानि पहुँचती है । खरपतवार को उखाड़कर जला देना भी हानिप्रद रहा है इससे वातावरण प्रदूषित होता है । खरपतवार को चारे के रूप में खिलाना भी कभी - कभी पशुओं के लिए जानलेवा हो जाता है ।


2. आधुनिक विधियों की असफलता ( Failure of Modern Methods ) –

खरपतवार प्रबन्धन की आधुनिक विधियाँ सर्वाधिक खतरनाक साबित हुई हैं । इसके अंतर्गत अनेक प्रकार के विषैले रसायनों का प्रयोग किया जाता है । जिन से जल, जीवन एवं जहान सभी कुछ दुष्प्रभावित होता है । वस्तुतः ये खतरनाक विषैले पदार्थ हैं जो लम्बे समय के लिए वातावरण को प्रदूषित कर देते हैं । इसे निम्न उदाहरण के द्वारा समझा जा सकता है ।

"अमेरिका से युद्ध के दौरान वियतनाम के सैनिक जंगलों में छुप गये थे । उनका पता लगाने के लिए अमेरिका ने अपनी वायुसेना की मदद से ‘एजेंट ओरेंज' नामक रसायन का छिड़काव किया । यह एक तीव्र एवं विषैला रसायन था । इसने जंगल की हरियाली को नष्ट कर दिया । इस दौरान लगभग एक करोड़ गैलन एजेंट ओरेंज का छिड़काव किया गया । इसका परिणाम यह के लाखों हेक्टेयर जंगल , उसकी हरियाली, जैव विविधता और जीव - जन्तु नष्ट हो गये । जो वियतनामी सैनिक और नागरिक इस रसायन के प्रभाव में आयें, उनकी हाल तक पैदा होने वाली पीढ़ी विकलांगता की शिकार हैं । आज उसी खतरनाक रसायन को ‘राउंड अप' नाम से प्रभावी खरपतवार नाशक के रूप में भारत के किसानों को बेचा जा रहा है ।" - आर० के० नीरद, 'जैविक खेती जमीन और जीवन दोनों की जरूरत', पंचायतनाम डॉट कॉम

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