कपास की खेती (kapas ki kheti) कैसे करें, पूरी जानकारी हिंदी में

  • कपास का वानस्पतिक नाम (Botanical Name) - गोसीपीयम प्रजाति (Gossypium species)
  • कपास का कुल (Family) - मालवेसी (Malvaceae)
  • कपास में गुणसूत्र संख्या - 2n = 26

कपास विश्व की सबसे महत्वपूर्ण रेशे वाली फसल है और भारतवर्ष में प्राचीनकाल से ही कपास की खेती (kapas ki kheti) एक व्यापारिक फसल के रूप में उगाई जाती है ।

कपास एक रेशे वाली फसल (Fiber Crops) है, कपास के रेशे से बने कपड़े आदिकाल से मनुष्य प्रयोग करता आया है तथा इससे बने वस्त्रों की माँग जनसंख्या वृद्धि के साथ - साथ अधिक बनी रहती है ।

यद्यपि आजकल बाजार में जीवों से प्राप्त रेशा (animal fibre) तथा अनेक प्रकार के कृत्रिम रेशे (artificial fibres) भी उपलब्ध है फिर भी कपास के रेशे के प्राकृतिक एवं वानस्पतिक होने के कारण इसकी अपनी एक विशेष पहचान है और अपनी गुणवत्ता एवं उपयोगिता के कारण इसकी माँग सदैव बनी रहती है ।


कपास का आर्थिक महत्व एवं उपयोग


कपास के पौधे के विभिन्न उपयोग निम्नलिखित है -

  • इसके पौधे पर पाये जाने वाले पुष्पों में बीजों पर एक रेशा (fibre) पाया जाता है जिसका उपयोग आदिकाल से विभिन्न प्रकार के वस्त्र बनाने में किया जाता है । 
  • इसकी विभिन्न जातियों के पौधों से प्राप्त रेशे की प्रकृति के आधार पर इससे मनुष्यों के लिये कपड़ों व अन्य अनेक प्रकार के कपड़ों के लिये धागे (Yarn) तैयार किये जाते हैं । इन्हीं धागों से बुनाई करके बाद में उनकी गुणवत्ता के आधार पर विभिन्न प्रकार का कपड़ा तैयार किया जाता है ।
  • कपास के पौधे से प्राप्त रूई का प्रयोग गद्दे, रजाई, तकियें आदि बनाने में किया जाता है ।
  • इसकी रूई का प्रयोग अस्पतालों में रोगियों की पट्टी और ऑपरेशन आदि में केया जाता है ।
  • इसकी रूई का प्रयोग विभिन्न उत्पादों की पैकिंग में भी किया जाता है ।
  • इसके बीजों से लगभग 20% तक तेल निकलता है जो खाने के काम आता है ।
  • इसके बीजों से निकली खली पशुओं के लिये एक उत्तम भोजन है ।
  • इसकी खली का उपयोग कार्बनिक खाद के रूप में भी किया जाता है । इसमें तीनों मुख्य पोषक तत्व नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश पाये जाते हैं ।
  • इसके रेशे से धागा व कपड़ा बनाने में एक बड़े वर्ग को स्वरोजगार मिलता है । लोग हैण्डलूम (handlooms) के प्रयोग से जीविकोपार्जन करते हैं ।
  • अनेक बडे टेक्सटाइल (Textile) उद्योगों में भी पावरलूमस (Powerlooms) की सहायता से कपड़ा बनाया जाता है फिर भी उसमें एक बड़ी मात्रा में लोगों को रोजगार की प्राप्ति होती है ।
  • भारत से कपास के विभिन्न तैयार उत्पादों तथा कच्ची रेशे की बेल्स (Bales) का निर्यात कर भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा प्रतिवर्ष अर्जित की जाती है जो हमारे देश के कुल निर्यात तथा अर्जित कुल विदेशी मुद्रा का एक बहुत बड़ा भाग है ।
  • कपास के सूखे पौधों का प्रयोग प्राचीनकाल से ही कृषक लोग अपने लिये ईंधन के रूप में करते हैं । अतः कपास एक बहुत ही उपयोगी रेशेदार फसल (useful fibre crop) है ।


कपास का उत्पत्ति स्थान एवं इतिहास

कपास के उत्पत्ति स्थल के बारे में विभिन्न इतिहासकारों के भिन्न - भिन्न मत हैं । भारत में मिले प्रमाणों के आधार पर अधिकतर वैज्ञानिकों का मत है कि कपास का उत्पत्ति स्थान भारत है । भारत में मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा की खुदाई से प्राप्त अवशेषों में भी कपास के प्रयोग सम्बन्धी प्रमाण प्राप्त हुये हैं ।

ऐसा अनुमान है, कि भारत से ही कपास मिश्र, इटली व स्पेन आदि अन्य देशों को पहुँचाई गई । विभिन्न इतिहासकारों के मतानुसार भारत लगभग 3500 वर्षों पूर्व से ही सनी तानों के निर्यात का विश्व में सबसे प्रमुख केन्द्र रहा है । वर्तमान समय में भी भारत से यह सूती वस्त्र निर्यात बड़े पैमाने पर निरन्तर किया जा रहा है ।

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कपास की खेती कहां होती है?

कपास वस्त्र उद्योग से सम्बन्धित होने के कारण विश्व के लगभग अधिकतर देशों में उगाई जाती है । सम्पूर्ण विश्व में इसके प्रमुख उत्पादक देशों में चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका, भारत, पाकिस्तान, ब्राजील व रूस आदि हैं । सम्पूर्ण विश्व में कपास की खेती (kapas ki kheti) के अन्तर्गत कुल क्षेत्रफल लगभग 35 मिलियन हैक्टेयर है तथा इसका कुल उत्पादन लगभग 21 मिलियन टन है ।

भारत में कपास की खेती (kapas ki kheti) के अन्तर्गत कुल क्षेत्रफल लगभग 9 मिलियन हैक्टेयर है तथा यहाँ इसका उत्पादन लगभग 2.5 मिलियन टन है । यह लगभग 17 मिलियन बेल्स (bales) के बराबर है । यहाँ 1 bale = 170 kg lint अर्थात् एक बेल = 170 किग्रा रूई इसकी खेती करने वाले प्रमुख राज्यों में गुजरात, महाराष्ट्र, आन्ध्रप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश व राजस्थान आदि है ।

कपास की उत्पादकता भारत में लगभग 270 किग्रा./हैक्टेयर है जो विश्व की औसत उत्पादकता के आधे से भी कम है । विश्व की औसत उत्पादकता लगभग 600 किग्रा./हैक्टेयर है ।


कपास का वानस्पतिक विवरण

कपास का पौधा जंगली अवस्था में बहुवर्षीय होता है ।

खेती की जाने वाली कपास की जातियों के पौधे एकवर्षीय और झाड़ीनुमा होते हैं । इसके पौधे की ऊँचाई 1.5 से 2 मीटर तक पाई जाती है । इसका तना सीधा बढ़ने वाला होता है । कपास के पौधों में मूसला जड़ें पाई जाती हैं । जड़ों के 1 मीटर गहराई तक जाने पर इसमें से द्वितीयक जड़ें (secondary roots) निकल आती हैं और इस प्रकार भूमि में जड़ों का एक जाल मन्त्र (net system) बन जाता है । इसकी पत्तियों का रंग हरा होता है, परन्तु कुछ जातियों में गुलाबी रंग की पत्तियाँ भी पाई जाती हैं ।

परागण की क्रिया के पश्चात् कपास के पौधों पर गूलर (ball) बनने लगते हैं । प्रत्येक गूलर में 5 से 8 तक बीज होते हैं । इसके बीज आकृति में नाशपाती के समान होते हैं । कपास के रेशे बीजों की वाह्य त्वचा से निकलते हैं । प्रत्येक कोशिका से एक रेशा निकलता है । रेशे की वृद्धि दो अवस्थाओं में पूर्ण होती है । पहली अवस्था में रेशे की लम्बाई में वृद्धि होती है तथा दूसरी अवस्था में इसकी मोटाई बढ़ती है और यह परिपक्व होता है ।


कपास की खेती के लिए उचित जलवायु

कपास एक गर्म मौसम की फसल है । इसके पौधे की वृद्धि के लिये अधिक तापमान की आवश्यकता होती है । इसके बीजों का अंकुरण लगभग 15°C ताप पर उचित प्रकार से होता है । तापमान इससे कम होने पर अंकुरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ।

अंकुरण के पश्चात् पौधों की उचित वृद्धि के लिये 20° C से 27 °C तक का तापमान अनुकूल रहता है । कपास का पौधा सूखे को सहन करने की पर्याप्त क्षमता रखता है । यही कारण है कि यह 45°C तक तापमान को सहन कर लेता है ।

कपास के पौधे के लिये लगभग 500 मिमी. तक वर्षा पर्याप्त रहती है, परन्तु वर्षा की यह मात्रा उचित प्रकार से पौधों की वृद्धि के समय वितरित होनी चाहिये । फूल व फल बनते समय कपास के लिये अधिक वर्षा बहुत ही हानिकारक है । अधिक वर्षा से पौधों पर बनने वाली कली व लगने वाले गूलर झड़ जाते हैं । गूलर पकते समय पर्याप्त धूप व पालारहित मौसम अत्यन्त आवश्यक है ।

फसल की चुनाई के समय चमकीली धूप वाला मौसम होना चहिये । पौधे की वृद्धि की अवस्था के समय भूमि में उचित नमी का होना आवश्यक है । नमी की अधिकता से पौधों की वृद्धि एवं उपज प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ।


कपास की खेती के लिए सबसे उचित मिट्टी कोन सी हैै?  

भूमि कपास की खेती (kapas ki kheti) रेतीली, लवणीय व क्षारीय तथा जलमग्न भूमियों को छोड़कर सभी प्रकार की भूमियों में की जा सकती है ।

भारत में कपास की खेती (kapas ki kheti) प्रमुख रूप से उत्तरी भारत की जलोढ़ भूमियों (alluvial soils) में व दक्षिणी भारत की कपास वाली काली मिट्टी में की जाती है । इनके अतिरिक्त अन्य विभिन्न प्रकार की भूमियों जैसे रेतीली दोमट (sandyloam), चिकनी दोमट (clayloam), दोमट (loamy) व लाल रंग वाली (red coloured) मिट्टियों में भी की जाती है । भूमि का pH मान 5-5 से 8.5 तक होने पर भी यह फसल सरलता से उग जाती है । भूमि में जल निकास (drainage) व वातन (aeration) का उचित प्रबन्ध होना अनिवार्य है ।

कपास की खेती कैसे करें पूरी जानकारी | kapas ki kheti kaise kare

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भारत में कपास की उन्नत खेती कैसे करें?

कपास भारतवर्ष की एक महत्वपूर्ण रेशे वाली औद्योगिक फसल है । हमारे देश के कुल निर्यात में कपास और सूती वस्त्र उद्योग का प्रमुख स्थान है । कपास की फसल भारतवर्ष में खरीफ के मौसम में उगाई जाती है । 

कपास की खेती (kapas ki kheti) से होने वाली आय एवं इसकी उपयोगिता के कारण इसे एक नकदी फसल कहा जाता है ।


कपास की गुणवत्तायुक्त अधिक उपज प्राप्त करने के लिये उन्नत सस्य तकनीकें निम्न प्रकार है -

  • भूमि की तैयारी - रबी की फसल की कटाई के पश्चात् खेत की मिट्टी पलटने वाले हल से एक गहरी जुताई करनी चाहिये । इसके पश्चात् दो या तीन बार हैरो चलाकर खेती की मिट्टी को बारीक व भुरभुरा बना लेना चाहिये । इस प्रकार खेत बुवाई के लिये तैयार हो जाता है ।
  • भूमि का उपचार - कपास की बुवाई से पूर्व पैराथियान की 20 किग्रा. मात्रा एक हैक्टेर खेत में डालकर भूमि को दीमक व भूमिगत कीटों से बचाना उत्तम रहता है ।


कपास की उन्नत किस्में

कपास की देशी, अमेरिकन व संकर किस्मों का बीज आजकल बाजार में उपलब्ध है । कृषक अपनी आवश्यकतानुसार इनमें से उपयुक्त जाति का चुनाव कर सकते हैं ।

  • कपास की देशी किस्में ( Local Varieties ) - कपास - 11, G - 1, विरनार व दिग्विजय आदि ।
  • कपास की अमेरिकन किस्में ( American Varieties ) - देवीराज, RS - 810, RA - 903, RG - 133, गंगानगर अगेती, RS - 875 व RG - 24 आदि ।
  • कपास की संकर किस्में ( Hybrid Varieties ) - H - 4, H - 8, वारालक्ष्मी, LH - 1640, LR - 5166, सोमनाथ व H - 6 आदि ।


कपास की बुवाई कब एवं कैसे करें?

कपास की बुवाई से सम्बन्धित निम्न बिन्दुओं पर ध्यान देना आवश्यक है -


1. कपास की बीज दर ( Seed rate ) –

कपास की देशी व अमरीकन जातियों की बुवाई हेतु 18-22 किग्रा. बीज प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिये । इसके ठीक विपरीत संकर किस्मों की जातियों का बीज लगभग 2-5 से 3 कि० प्रति हैक्टेयर पर्याप्त रहता है ।

2. बीजोपचार ( Seed Treatment ) -

कपास की फसल को बीजजनित रोगों से बचाने के लिये थायराम की 3 ग्राम मात्रा प्रति किग्रा. बीज की दर से उपचारित करना चाहिये । इसके अतिरिक्त बीज को 6 से 8 घण्टे पानी भिगोकर सुखाने के पश्चात् फफूंदीनाशक रसायन से 3 ग्राम/किग्रा. बीज में मिलाकर उपचारित करना चाहिये । कपास के बीजों से रेशों को हटाने के लिये सल्फ्यूरिक अम्ल ( H, SO. ) का प्रयोग किया जाता है । सल्फ्यूरिक अम्ल की 1 लीटर मात्रा 10 किग्रा. बीज के उपचार के लिये पर्याप्त होती है । मिट्टी या प्लास्टिक के बर्तन में बीज डालकर थोड़े से अम्ल का प्रयोग करना चाहिये । इसके पश्चात् एक - दो मिनट तक लकड़ी से हिलाते रहना चाहिये और बीज के काला होते ही बहते पानी से धो देना चाहिये । पानी पर तैरते हुये हल्के बीजों को अलग कर देना चाहिये । इस विधि से साफ किये गये बीजों की बुवाई करने से अंकुरण जल्दी व अच्छा होता है ।

3. कपास की बुवाई का समय ( Time of Sowing ) -

कपास की बुवाई का उपयुक्त समय अलग - अलग क्षेत्रों में भिन्न होता है । इस फसल की बुवाई अप्रैल और मई के महीने में अवश्य ही कर लेनी चाहिये ।

4. अन्तरण ( Spacing ) -

अमेरिकन जातियों में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 60 सेमी. व पौधे से पौधे की दूरी 45 सेमी० रखनी चाहिये । देसी जातियों में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45 सेमी. व पौधे से पौधे की दूरी 30 सेमी ० रखनी चाहिये । कपास की संकर जातियों की बुवाई हेतु पंक्ति से पंक्ति की दूरी 150 सेमी. व पौधे से पौधे की दूरी 60 सेमी . रखी जाती है ।

5. कपास की बुवाई की विधि ( Method of Sowing ) –

कपास की फसल की बुवाई छिटकवाँ या पंक्तियों में की जाती है । छिटकवां बुवाई के लिये पंक्तियों में बोने की अपेक्षा अधिक बीज की आवश्यकता पड़ती है । पंक्तियों में बीज बोना सदैव अच्छा रहता है । इससे खेत में कृषि कार्य करने में सुविधा रहती है । छिटकवाँ विधि से बुवाई करने के लिये बीज को खेत में छिटककर हल चला देते हैं और फिर पाटा चला देते हैं । पंक्तियों में बुवाई के लिये देसी हल के पीछे कूड बनाकर बुवाई की जाती है या सीडड्रिल से भी पंक्तियों में बुवाई की जाती है । पंक्तियों में बुवाई करने पर बीज का अंकुरण समान होता है और खरपतवार निकालने का कार्य आसानी से किया जा सकता है ।

6. पौधों की संख्या ( Plant Population ) -

एक हैक्टेयर खेत में कपास की बुवाई 18-20 किग्रा. बीज दर से करने पर 70-80 हजार पौधों की संख्या प्राप्त होती है ।


कपास में कोन सी खाद डालें?

बुवाई से 3-4 सप्ताह पूर्व 10-15 टन गोबर की सड़ी हुई खाद एक हैक्टेयर खेत में प्रयोग करनी चाहिये ।


इसके अतिरिक्त कपास में NPK की मात्रा निम्न प्रकार प्रयोग की जा सकती है -

  • अमेरिकन कपास की जातियों को 80 किग्रा० नाइट्रोजन व 40 किग्रा. फास्फोरस प्रति हैक्टेयर की आवश्यकता होती है ।
  • कपास की देसी जातियों के लिये 50 किग्रा० नाइट्रोजन व 30 किग्रा० फास्फोरस प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिये ।
  • कपास की संकर जातियों के लिये 100-120 किग्रा. नाइट्रोजन व 40-50 किग्रा. फास्फोरस एक हैक्टेयर खेत में प्रयोग करना चाहिये । पोटाश की मात्रा भूमि परीक्षण के आधार पर देनी चाहिये । 
  • फास्फोरस व पोटाश की सम्पूर्ण मात्रा और नाइट्रोजन की आधी मात्रा बुवाई से पूर्व प्रयोग करनी चाहिये । नाइट्रोजन की शेष मात्रा फूलों की कलियाँ बनते समय प्रयोग की जाती है ।


कपास की फसल में अपनाए जाने वाले फसल चक्र

कपास की फसल भिन्न - भिन्न फसल चक्रों में जलवायु, भूमि, सिंचाई की सुविधाओं और किसानों की अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुसार उगाई जाती है ।

कपास के कुछ प्रमुख फसल चक्र इस प्रकार है -

कपास - गेहूँ, कपास - मटर और कपास - ज्वार आदि । एक खेत में लगातार कई वर्षों तक कपास नहीं उगानी चाहिये । इससे कपास पर लगने वाले कीड़ों की संख्या में वृद्धि होती है और उपज भी कम होती है ।


मिलवां खेती ( Mixed Cropping )

देश के कुछ भागों में कपास की अन्य फसलों के साथ मिलवां खेती भी की जाती है । 

उदाहरण - कपास + अरहर, कपास + तिल, कपास + मक्का, कपास + ज्वार, कपास + मोठ आदि ।


कपास की खेती के लिए उपयुक्त सिंचाई की मात्रा

कपास की फसल में 3-4 सिंचाई देनी आवश्यक होती है । पहली सिंचाई देर से करनी चाहिये । गूलर व फूल आते समय खेत की सिंचाई अवश्य की जानी चाहिये ।


कपास की फसल में निराई गुड़ाई करने का सही समय

बुवाई के 8-9 सप्ताह बाद तक फसल को खरपतवारों से रहित रखना चाहिये । इसके लिये दो से तीन निराई - गुड़ाई करना पर्याप्त रहता है


कपास की फसल में लगने वाले खरपतवार एवं उनका नियन्त्रण

खरपतवारों की अधिक समस्या होने पर खरपतवारनाशी रसायन पैंडिमेथालीन की 1 किलो० मात्रा प्रति हैक्टेयर या ऐलाक्लोर 2-5 किग्रा. प्रति हैक्टेयर (सक्रिय तत्व) की दर से प्रयोग करनी चाहिये । यदि कपास के साथ मक्का या अन्य फसल उगाई गई है वहाँ खरपतवारनाशी को प्रयोग नहीं करना चाहिये ।


कपास की फसल में पादप सुरक्षा

कपास की फसल को भारी मात्रा कीट व रोगों द्वारा हानि होती है । इसकी फसल में रस चूसने वाले कीटों में हरा तेला, माहु व थ्रिप्स आदि हैं । पत्ती भक्षक कीटों में तम्बाकू की सूंडी, कपास की पत्ती मोडक आदि कीट हैं । गूलर की सूंडी में गुलाबी सूंडी व चित्तीदार सूंडी आती हैं ।


कपास की दवा

कपास के प्रमुख रोगों में जड़ सड़न व उखटा रोग तथा विषाणु रोग सम्मिलित होते हैं । इन सभी कीटों व बीमारियों पर नियन्त्रण करने के लिये खेत की गहरी जुताई करनी चाहिये । गन्धक के अम्ल द्वारा बीज का उपचार करना चाहिये ।

उपयुक्त सस्य क्रियायें जैसे भूमि की जुताई, स्वस्थ बीज, पानी तथा खाद पर विशेष ध्यान देना चाहिये । कपास की फसल को प्रतिवर्ष एक ही खेत में नहीं उगाना चाहिये । खरपतवारों पर नियन्त्रण के लिये खरपतवारनाशी का प्रयोग अवश्य किया जाये ।


कपास की फसल की कटाई कब एवं कैसे करें?

कपास की फसल की कटाई पौधों पर लगने वाले गूलरों के सम्पूर्ण रूप से फटने पर हाथ द्वारा की जाती है । कपास की चुनाई का कार्य 3-4 बार में पूरा होता है ।


कपास की फसल से प्राप्त उपज

कपास की औसत उपज 18-20 क्विटल/है. हो जाती है जिससे 30-35% रूई निकलती है । संकर कपास की जातियों की उपज इससे भी अधिक (लगभग 30-40 क्विटल/है०) तक होती है ।

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