कृषि प्रणाली क्या है इसकी परिभाषा एवं कृषि प्रणाली कितने प्रकार की होती है?

जब किसी प्रक्षेत्र पर कृषि क्रियाएं जैसे- फलोत्पादन, मत्स्य पालन, पशुपालन इत्यादि के अनुकूल लाभ प्राप्ति हेतु किसान जो विधियां अपनाता है, उसे ही कृषि प्रणाली (krishi pranali) कहा जाता है ।


कृषि प्रणाली क्या है अर्थ एवं परिभाषा | krishi pranali kya hai arth or paribhasha


जब आर्थिक एवं समाजिक तरीकों के आधार पर कृषि या खेती को वर्गीकृत किया जाता है, उसे कृषि प्रणाली (krishi pranali) कहा जाता है ।


कृषि प्रणाली (krishi pranali) के उदाहरण - 

राजकीय खेती, पूंजीवादी खेती, निगमित खेती, किसानी खेती, सामूहिक खेती, सहकारी खेती, कृषि यंत्रीकरण इत्यादि ।


कृषि प्रणाली की परिभाषा लिखिए? | krishi pranali ki paribhasha likhiye?


कृषि की प्रणाली की परिभाषा - सामाजिक एवं आर्थिक क्रियाओं की गतिविधियों के अंतर्गत जिसमें कृषि कार्य संपन्न किया जाता है, उसे कृषि प्रणाली (krishi pranali) कहा जाता है ।

 

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कृषि प्रणाली एवं कृषि प्रणाली के प्रकार | krishi pranali


कृषि प्रणाली कितने प्रकार की होती है?


कृषि प्रणाली (krishi pranali) के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित है - 

1. राजकीय खेती ( State Farming )
2. पूंजीवादी खेती ( Capitalistic Farming )
3. निगमित खेती ( Corporate Farming )
4. किसानी खेती ( Peasant Farming )
5. सामूहिक खेती ( Collective Farming )
6. सहकारी खेती ( Co - operative Farming )
7. कृषि यंत्रीकरण ( Agricultural Mechanisation )


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1. राजकीय खेती ( State Farming )

राजकीय खेती प्रयोग करने वाले फार्म सरकार की सम्पत्ति के अंतर्गत आते हैं और इस प्रकार की खेती वाली भूमियों का प्रबंध सरकारी कर्मचारियों द्वारा किया जाता है । ऐसे फार्मों को चलाने के लिए राज्य द्वारा सभी प्रकार की सुविधाएँ एवं पूंजी उपलब्ध कराई जाती है । फार्म उत्पादन की योजना भी सरकार द्वारा ही बनाई जाती है । खेत में प्रतिदिन का कामकाज दिहाड़ी मजदूर द्वारा लिया जाता है । प्रायः इस प्रकार के फार्म अनुसंधान व विकास कार्य, प्रदर्शन व अच्छे बीज की मात्रा को बढ़ाने के लिए चलाए जाते हैं ।


2. पूँजीवादी खेती ( Capitalistic Farming )

इसके अंतर्गत पूँजीपतियों के पास बड़े - बड़े भू - खण्ड होते है, जो वे या तो स्वयं क्रय करते हैं या फिर भी सरकार द्वारा उनको अधिकृत किए जाते हैं । यह व्यवस्था अमेरिका तथा ब्रिटेन में प्रचलित है । इस प्रकार की खेती में पूँजीपति दिहाड़ी मजदूरों तथा आधुनिक तकनीक की सहायता से भूमि का अधिकतम उपयोग करते हैं । भारत में चाय तथा कॉफी के बागानों में इस प्रकार की प्रणाली पाई जाती है ।


3. निगमित खेती ( Corporate Farming )

इस प्रकार की खेती के अंतर्गत खेती का प्रबन्ध एक निगम द्वारा किया जाता है । निगम की सम्पूर्ण व्यवस्था संचालक द्वारा की जाती है तथा सदस्यों का दायित्व सीमित होता है । इस व्यवस्था के अंतर्गत बड़ी मात्रा में भूमि तथा पूँजी की आवश्यकता होती है । खेती की यह प्रणाली मुख्यतः अमेरिका में प्रचलित है । भारत में सूरतगढ़ जैसे कई फार्मों को सम्मिलित करके केन्द्रीय सरकार के अधीन 'भारत राज्य फार्म निगम लिमिटेड' के अंतर्गत व्यापारिक दृष्टि से खेती की जाती है ।


4. काश्तकारी खेती ( Peasant Farming )

काश्तकारी खेती के अंतर्गत किसान का सीधा सम्बन्ध राज्य से होता है । वह स्वयं भूमि का मालिक होता है तथा उसको स्थायी, पैतृक व हस्तांतरिक अधिकार प्राप्त होते हैं । वह पहले से निर्धारित मालगुजारी राज्य को देता है । खेती के सभी कार्य किसान अपनी इच्छा से कर सकता है । यह प्रणाली भारत में सबसे अधिक प्रचलित है ।


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5. सामूहिक खेती ( Collective Farming )

इस प्रणाली के अंतर्गत जोतों एवं समस्त कृषि इनपुटों को एकत्र कर लिया जाता है । भूमि का स्वामित्व सम्पूर्ण समाज में निहित होता है । भूमि का प्रबन्धन चुनी गई प्रबन्ध समिति द्वारा किया जाता है । समिति के सदस्यों को श्रमिक वर्ग में बाँट दिया जाता है तथा कार्यानुसार पारिश्रमिक दिया जाता है । अन्त में बचे लाभ का वितरण भूमि के आधार पर किया जाता है ।


6. सहकारी खेती ( Co - operative Farming )

सहकारी खेती से अभिप्राय उस संगठन से है , जिसमें किसान परस्पर लाभ के उद्देश्य से स्वेच्छापूर्वक अपनी भूमि, पूँजी एवं श्रम को एकत्र करके सामूहिक रूप से खेती करते हैं । सदस्यों को उनके श्रम तथा भूमि के स्वामित्व के अनुपात में लाभांश के रूप में आमदनी प्राप्त होती है ।


7. कृषि यंत्रीकरण ( Agricultural Mechanisation )

कृषि यंत्रीकरण से अभिप्राय भूमि पर मशीनों द्वारा उन कार्यों को करने से होता है जो साधारणतया मानव या पशुओं के द्वारा किये जाते हैं । अर्थात् श्रमिक क्षेत्र में श्रम को पूँजी से बदल देना ही कृषि यंत्रीकरण कहलाता है । भारत को इसे दो रूपों में अपनाया गया है, प्रथम- परम्परागत पशुचालित कृषि उपकरणों के स्थान पर ऊर्जा संसाधनों से चलने वाले उपकरणों का उपयोग करना तथा द्वितीय -देश में विभिन्न कृषि जलवायु तथा सामाजिक - आर्थिक स्थितियों के संदर्भ में भारवाही पशुओं के महत्व एवं उनकी अनिवार्यता को दृष्टि में रखते हुए पशुचालित उपकरणों का प्रतिस्थापना करना ।


कृषि प्रणाली को निर्धारित करने वाले कारक 

 

कृषि की प्रणालियों को निर्धारित करने वाले महत्वपूर्ण कारक निम्नांकित हैं -

  • जोत का आकार ( Size of Holding )
  • भूमि का स्वामित्व ( Ownership of Land )
  • खेती का उद्देश्य ( Objective of Farming )
  • साधनों की उपलब्धता ( Availability of Resources )
  • शासन तन्त्र का प्रभाव ( Effect of Administrative System )
  • सुविधाओं के उपयोग के लिए ( To Avail Facilities )


1. जोत का आकार ( Size of Holding ) -

यदि जोत का आकार बड़ा है तो व्यक्तिगत खेती या काश्तकारी खेती को प्रणाली अपनाई जाती है , परन्तु यदि जोत का आकार छोटा है तो सहकारी खेती को प्रणाली उपयुक्त मानी जाती है ।


2. भूमि का स्वामित्व ( Ownership of Land ) -

यदि भूमि पर कृषक का निजी स्वामित्व है तो व्यक्तिगत अथवा काश्तकारी खेती की प्रणाली प्रयोग की जायेगी, परन्तु यदि भूमि पर सरकार का स्वामित्व है तो राजकीय खेती को प्रणाली अपनाई जायेगी ।


3. खेती का उद्देश्य ( Objective of Farming ) -

अलग - अलग उद्देश्यों के अनुसार खेती को प्रणाली में अन्तर आ जाता है जैसे व्यापारिक खेती केवल बड़े - बड़े प्रक्षेत्रों पर अधिक लाभ कमाने के लिए की जाती है । इसी प्रकार अनुसंधान या प्रदर्शन हेतु खेती राजकीय खेती प्रणाली के अन्तर्गत की जाती है ।


4. साधनों की उपलब्धता ( Availability of Resources ) -

भूमि, श्रम, पूँजी आदि साधनों की उपलब्धता पर खेती की प्रणाली निर्भर करती है । जैसे अधिक भूमि पर अधिक पूँजी उपलब्ध होने पर श्रम के स्थान पर आधुनिक मशीनों, उपकरणों आदि का प्रयोग करके पूँजीवादी खेती की जाती है ।


5. शासन तन्त्र का प्रभाव ( Effect of Administrative System ) -

राज्य शासन अर्थात् सरकारी तन्त्र का प्रभाव भी खेती की प्रणाली को प्रभावित करता है जैसे साम्यवादी सरकार अवस्था में सामूहिक खेती तथा प्रजातन्त्रीय सरकार व्यवस्था में व्यक्तिगत खेती की प्रणाली अपनाई जाती है ।


6. सुविधाओं के उपयोग के लिए ( To Avail Facilities ) -

छोटी - छोटी जोतों पर भी, ऋण सुविधा, विपणन सुविधा, यातायात सुविधा आदि का लाभ उठाने के लिए सहकारी खेती की प्रणाली अपनाकर अधिक लाभ कमाया जा सकता है ।


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