सहकारी खेती/सहकारी कृषि क्या है इसके प्रकार एवं लाभ व दोष

खेती की वह प्रणाली जिसमें किसान इकट्ठे होकर लाभ प्राप्ति के लिए सामूहिक खेती करते हैं उसे सहकारी कृषि/सहकारी खेती (sahkari kheti/sahkari krishi) कहते है ।


सहकारी खेती या सहकारी कृषि क्या है | Sahkari kheti kya hai 

सहकारी खेती की परिभाषा - "सहकारी खेती का अर्थ उस संगठन से है, जिसमें किसान परस्पर लाभ के उद्देश्य से स्वेच्छापूर्वक अपनी भूमि, श्रम और पूँजी को एकत्र करके सामूहिक रूप से खेती करते हैं ।" 

"Co-operative farming refers to the organization in which farmers voluntarily collect their land, labor and capital and cultivate collectively for the purpose of mutual benefit."

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सहकारी खेती या सहकारी कृषि क्या है इसके प्रकार एवं लाभ व दोष लिखिए?

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सहकारी खेती (sahkari kheti) कार्यप्रणाली व स्वामित्व के आधार पर चार प्रकार की होती है -

  • सहकारी उन्नत कृषि ( Co - operative Better Farming )
  • सहकारी काश्तकारी खेती ( Co - operative Tenant Farming )
  • सहकारी सामूहिक खेती ( Co - operative Collective Farming )
  • सहकारी संयुक्त खेती ( Co - operative Joint Farming )


सहकारी खेती के प्रमुख प्रकारों का वर्णन -


1. सहकारी उन्नत कृषि ( Co - operative Better Farming ) -

जब केवल कुछ विशिष्ट उद्देश्यों अथवा कार्यों को चलाने के लिए किसान आपस में मिलकर एक समिति बनाते हैं तो इसे सहकारी उन्नत कृषि कहते हैं । समिति की ओर से खेती के लिए एक योजना तैयार की जाती है, जिसकासभी सदस्य अनुसरण करते हैं । समिति की ओर से बीज, खाद, उर्वरक, सिंचाई, जुताई, बुआई, फसल की देख - रेख, मशीनों का प्रबन्ध तथा उत्पादन की बिक्री आदि का प्रबन्ध किया जाता है । प्रत्येक सदस्य को प्राप्त सुविधाओं का खर्च देना पड़ता है और वर्ष के अन्त में सदस्य को कुल लाभ का एक भाग लाभाँश के रूप में दिया जाता है । सदस्यों की भूमि अलग - अलग रहती है तथा प्रत्येक सदस्य अपनी भूमि पर व्यक्तिगत रूप से खेती करता है ।


2. सहकारी काश्तकारी खेती ( Co - operative Tenant Farming ) -

इस प्रकार की खेती में सहकारी समिति भूमि को पट्टे या लगान पर लेकर सदस्यों को छोटी - छोटी जोत के रूप में खेती करने के लिए लगान पर उठा देती है । कृषि का पूरा कार्यक्रम समिति ही बनाती है तथा अन्य सुविधाएँ जैसे ऋण, बीज, खाद, उर्वरक, मशीन आदि तथा सदस्यों की पैदावार की बिक्री का प्रबन्ध भी समिति ही करती है ।


3. सहकारी सामूहिक खेती ( Co - operative Collective Farming ) -

इस प्रकार की खेती में भी सहकारी समिति भूमि की स्वामी होती है तथा खेती सामूहिक रूप से की जाती है । सामूहिक सहकारी कृषि एक श्रम धनीभूत संस्था है । इसमें सदस्यों का भू - स्वामी होना आवश्यक नही है और न ही उनकी भूमि एकत्र करना । ये समितियाँ भूमि अधिपति अथवा भूमिहीन कृषकों की संस्था है, जो पट्टे पर भूमि प्राप्त करती हैं अथवा इसे खरीदती हैं । तथापि समिति के लिए सदस्य की ही भूमि पट्टे पर लेने अथवा खरीदने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है । इस प्रकार व्यवस्थित भूमि पर सदस्य कार्य करते हैं एवं मजदूरी प्राप्त करते हैं । समिति की शुद्ध आय, आरक्षित कोष एवं निधियों का प्रावधान कर लेने के अनन्तर सदस्यों में विभक्त कर दी जाती है । समिति हिस्से की पूँजी, निक्षेप, ऋण एवं अनुदान से निधियाँ एकत्र करती हैं । ऐसी समिति संयुक्त कृषि समिति से कुछ अर्थों में भिन्न होती है । इन समितियों में कोई स्वामित्व लाभाँश नहीं होता, दूसरे संयुक्त कृषि सहकारी समिति में सदस्यों के लिए खेतों में काम करना आवश्यक नहीं है जबकि सामूहिक कृषि सहकारी समिति में आवश्यक है ।


4. सहकारी संयुक्त खेती ( Co - operative Joint Farming ) -

सहकारी संयुक्त खेती का अभिप्राय उस संगठन से है जिसमें किसान परस्पर लाभ के उद्देश्य से स्वेच्छापूर्वक अपनी भूमि, श्रम व पूँजी को एकत्र करके सामूहिक रूप से खेती करते हैं । सहकारी संयुक्त कृषि, कृषि के क्षेत्र में सहकारिता का अधिक संगठित रूप है, क्योंकि वे अपनी क्रियाओं में अधिक व्यापक और सर्वांगीण हैं । भूमि के बिखरे टुकड़ों वाले छोटे कृषक जो आर्थिक रूप में अपने जोत नहीं सकते, ऐसी समिति का गठन करते हैं । वे अपनी भूमि को एक कर लेते हैं और अपने कृषि उत्पादन, रोजगार एवं आय बढ़ाने की दृष्टि से संयुक्त रूप से कृषि करने के लिए सहमत होते है ।


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सहकारी खेती के प्रमुख लाभ हैं -

  • इससे जोत की इकाई में वृद्धि होती है ।
  • भूमि का उचित उपयोग किया जा सकता है ।
  • अच्छे यन्त्र और मशीनों का प्रयोग किया जा सकता है ।
  • पैदावार एवं आय में वृद्धि होती है ।
  • जोत की प्रति इकाई खर्च में कमी होती है ।
  • प्रबन्धन में सरलता आती है तथा श्रम का उचित उपयोग होता है ।
  • ऋण लेने में आसानी होती है ।
  • कृषि उपज का विधायन सम्भव होता है ।
  • सहायक कृषि धन्धों का विकास होता है ।
  • कृषकों का शोषण से बचाव होता है ।


सहकारी खेती/सहकारी कृषि के दोष


भारत में सहकारी खेती के प्रमुख दोष हैं -

  • बेरोजगारी में वृद्धि ।
  • व्यक्तिगत उत्साह में कमी ।
  • शिथिल व्यवस्था ।
  • अनुकूल मनोवैज्ञानिक प्रभाव आदि । 

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