सस्य विज्ञान (एग्रोनोमी) - अर्थ, परिभाषा एवं इसके सिद्धांत व क्षेत्र

सस्य विज्ञान (agronomy in hindi) कृषि की वह शाखा जिसमें फसल उत्पादन एवं मृदा प्रबन्ध इत्यादि क्रियाओं के सिद्धांतों का अध्ययन किया जाता है ।

अर्थात् भूमि पर उचित क्रियाएं करके उसे फसलों को उगाने योग्य बनाना ही एग्रोनोमी (agronomy in hindi) कहलाता है ।

सस्य विज्ञान के पिता कोन है? | farther of agronomy in hindi

पीटरो-डे क्रेसेन्जी (1230-1307) ने सर्वप्रथम पुस्तक "ओपस रूरेलियम कामो डारम" में सस्य विज्ञान सम्बन्धी लेखों का संग्रह किया गया था ।

इसीलिए 'पीटरो-डे क्रेसेन्जी' को ही सस्य विज्ञान का पिता कहा जाता है ।


सस्य विज्ञान का अर्थ एवं परिभाषा | meaning & definition of agronomy in hindi

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सस्य विज्ञान (एग्रोनोमी) - अर्थ, परिभाषा एवं इसके सिद्धांत व क्षेत्र

सस्य विज्ञान का क्या अर्थ है? meaning of agronomy in hindi


एग्रोनोमी शब्द का अर्थ (meaning of agronomy in hindi) -

एग्रोनोमी (Agronomy) शब्द ग्रीक भाषा से लिया गया है ।

एग्रोनोमी शब्द दो ग्रीक शब्दों से मिलकर बना है - एग्रोस (Agros) + नोमोस (Nomos) ।

जिसमें एग्रोस (Agros) शब्द का अर्थ है "खेत भूमि" । दूसरे शब्द नोमोस (Nomos) का अर्थ है "प्रबन्ध करना” ।

अर्थात् इस प्रकार एग्रोनोमी शब्द का अर्थ होता है - "फसलोत्पादन हेतु भूमि का प्रबन्ध करना ।"

सस्य विज्ञान की परिभाषा | defination of agronomy in hindi

सस्य विज्ञान की परिभाषा - "सस्य विज्ञान कृषि की वह शाखा है जिसमें भूमि प्रबन्ध और फसल उत्पादन के सिद्धान्तों एवं क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है ।"

"Agronomy is the branch of agriculture that treats of the principles and practices of crop production and field management."


सस्य विज्ञान की स्पष्ट और सारगर्भित परिभाषा निम्न प्रकार है -

सस्य विज्ञान के अर्थ के अनुसार - "वैज्ञानिक फसलोत्पादन तथा भूमि प्रबन्ध के अध्ययन को सस्य विज्ञान कहते हैं ।"

"Study of the management of land and scientific production of crops is called Agronomy."

सी० आर० बाल के अनुसार - “सस्य विज्ञान, फसल उगाने की कला और विज्ञान है ।"

"Agronomy is an art and science of field crop culture."


सस्य विज्ञान कला और विज्ञान दोनों है, स्पष्ट कीजिए?

वृहद रूप में सस्य विज्ञान (agronomy in hindi) को यदि हम देखें तो पायेंगे कि वह केवल विज्ञान ही नहीं अपितु कला भी है ।


इसे हम निम्न प्रकार से सिद्ध कर सकते हैं -


1. सस्य विज्ञान कला के रूप में ( Agronomy as an art ) -

कला शब्द का अर्थ भौतिक दृष्टिकोण से ही नहीं वरन् मानसिक दृष्टिकोण से दक्षता (skill) से है । इस दृष्टिकोण से कृषि अध्ययन के अन्तर्गत चिन्तन विधायन (processes of thoughts) व दक्षता सम्मिलित हैं जिनका प्रयोग किसान विभिन्न कृषि कार्यों के करने में करता है । यह साधारणतः विदित है कि कुछ कृषक अन्य कृषकों की अपेक्षा एक दिए हुए कार्य को शीघ्रता, सरलता व दक्षतापूर्वक करते हैं । तब हम कहते हैं कि ये किसान अधिक दक्ष हैं क्योंकि इनकी हर एक गति विधि व्यर्थ नहीं जाती है । इसलिए सस्य विज्ञान (agronomy in hindi) एक कला है ।


2. विज्ञान के रूप में ( Agronomy as a science ) -

सस्य विज्ञान (agronomy in hindi) की उपरोक्त परिभाषा के अन्तर्गत सस्य विज्ञान को, विज्ञान व कला बतलाया गया है । किसी भी विषय के क्रमबद्ध अध्ययन को विज्ञान कहते हैं, या विज्ञान प्रायः तथ्यों का वह अंग है जिसमें ये तथ्य इस प्रकार क्रमबद्ध होते हैं कि सामान्य नियम (general principles) या सिद्धान्त कार्यरूप में होते हैं । ज्ञान का यह अंग क्रमबद्ध अध्ययन व अनुसंधान द्वारा प्राप्त होता है । सफल फसल उत्पादन में सभी क्रियायें क्रमानुसार ही अध्ययन की जाती हैं, जैसे फसलानुसार भूमि की किस्म को छाँटना, समय पर खेत की तैयारी करना, समय पर बुआई करना, उचित बीज दर का प्रयोग, समय पर सिंचाई, निराई, गुड़ाई तथा खाद आदि फसलों में देना । यह क्रमबद्ध अध्ययन एवं कार्य, फसल की कटाई तक ही करते रहते हैं ।


सस्य विज्ञान के मूलभूत सिद्धांत | principals of agronomy in hindi


सस्य विज्ञान (agronomy in hindi) के मूल सिद्धांतों का अध्ययन निम्नलिखित के अंतर्गत किया जाता है -

  • भू-परिष्करण क्रियाएं
  • जल संरक्षण
  • शुष्क खेती
  • जल प्रबंध
  • भूमि प्रबन्ध
  • सिंचाई की विधियां
  • बीज गुणवत्ता
  • बीज की बुवाई का समय
  • फसल के प्रकार
  • कृषि प्रणाली


सस्य विज्ञान का क्षेत्र एवं महत्व | impotance & scope of agronomy in hindi


सस्य विज्ञान का क्षेत्र (scope of agronomy in hindi) -

  • अन्न की समस्या का समाधान
  • वस्त्र समस्या का समाधान
  • पशुओं के लिए चारे की उपलब्धि
  • बेरोजगारी की समस्या का समाधान
  • राष्ट्रीय आय में वृद्धि
  • अन्य उद्योगों के लिए कच्चे माल की पूर्ति
  • मृदा उर्वरकता में वृद्धि
  • सस्य उत्पादन से अन्य घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति
  • अंतरराष्ट्रीय ख्याति
  • रहन-सहन के स्तर में वृद्धि


सस्य विज्ञान का महत्व (impotance of agronomy in hindi) -

अन्न मनुष्य की आधारभूत आवश्यकताओं में से एक है जो कि हमारे देश में फसलों से ही पूरी हो पाती है, परन्तु बढ़ती हुई जनसंख्या को देखते हुए इस समस्या का समाधान दो ही विधियों से किया जा सकता है -

( i ) खेती के अंतर्गत भूमि बढ़ाई जाए जिससे उत्पादन बढ़ सके, परंतु भूमि सीमित है । अतः यह विधि अपनाकर अधिक समय तक अन्न समस्या हल नहीं कर सकते हैं ।

( ii ) प्रति इकाई क्षेत्र में सघन कृषि द्वारा अधिक से अधिक उपज प्राप्त की जाएं । अतः अन्न समस्या का हल दूसरी विधि से संभव है, क्योंकि पहली विधि में कहा जा चुका है कि भूमि, सीमित होने के कारण, बढ़ाई नहीं जा सकती है ।


इसके अतिरिक्त सस्य विज्ञान का क्षेत्र (scope of agronomy in hindi) निम्नलिखित प्रकार से है -


1. अन्न की समस्या का समाधान -

जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है, कि भोजन मनुष्य की आधारभूत आवश्यकताओं में प्रथम स्थान रखता है । इसकी उपलब्धि आजकल बढ़ती हुई जनसंख्या के युग में सघन कृषि द्वारा ही संभव है । पिछले कुछ वर्षों की कृषि उन्नति को अपने देश में देखते हुए हम यह कह सकते हैं कि देश अपनी अन्न की समस्या को हल करने में सफल हो गया है और विदेशों पर निर्भर नहीं रहा है । हरित क्रांति (green revolution in hindi) अधिक उत्पादन बढ़ाकर खाद्य समस्या का समाधान करने में सहायक सिद्ध हुई है ।


2. वस्त्र समस्या का समाधान -

मनुष्य की तीन आधारभूत आवश्यकताओं - भोजन, वस्त्र व मकान मैं वस्त्र पूर्ति का स्थान दूसरा है, जिसका समाधान रेशे वाली कई फसलें, जैसे - जुट, कपास इत्यादि को उगा कर कर सकते हैं ।


3. पशुओं के लिए चारे की उपलब्धि -

हमारे देश की कृषि आधुनिक युग में भी अधिकतर पशुओं पर आधारित है । मशीनीकरण का युग होते हुए भी हमारे देश मैं अभी तक इसका प्रचलन किन्हीं विशेष कारणों से पूर्णतया नहीं हो पा रहा है । अत: है पशुओं के पालन पोषण के लिए खाद्य पदार्थ चारे की व्यवस्था भी सघन कृषि द्वारा ही संभव है । इसके अतिरिक्त पशुपालन (animal husbandry in hindi) अपरोक्ष रूप में देश के चमड़ा उद्योग व दूध उद्योग को भी प्रभावित करता है ।


4. बेरोजगारी की समस्या का समाधान -

सबसे विज्ञान मनुष्य को अपरोक्ष या परोक्ष रूप में रोजगार प्रदान करता है । परोक्ष रूप में मनुष्य को जो सस्य उत्पादन में लगे हुए हैं, जैसे - किसान वह कृषि श्रमिक तथा अप्रत्यक्ष रूप में कृषि पर आधारित अन्य धंधे वाले लोगों, जैसे - बढ़ई, लोहार एवं कृषि उपज के व्यापारी, को रोजगार प्रदान करता है ।


5. अन्य उद्योगों के लिए कच्चे माल की पूर्ति -

देश में चीनी तेल कपास झूठ आदि प्रमुख उद्योगों को कच्चा माल सस्य उत्पादन से ही प्राप्त होता है । किसी भी देश में ऐसे धंधे अधिक शिक्षित नहीं होते, जहां पर कच्चे माल की पूर्ति विदेशों से करनी पड़ती है । अतः देश की उन्नति सस्य उत्पादन की उन्नति पर ही आधारित होती है ।


6. राष्ट्रीय आय में वृद्धि -

फसलों के उत्पादन से किसान की आय में वृद्धि होती है और कुछ स्तर पर वह राष्ट्र की आय में वृद्धि मानी जाती है । इसके अतिरिक्त कृषि उत्पादन पर विभिन्न करो के रूप में राज्य सरकार तथा केंद्रीय सरकार की आय भी आधारित है जैसे - मालगुजारी, कृषि आय कर, सिंचाई कर व उत्पादन कर इत्यादि । अतः सस्य उत्पादन राष्ट्रीय आय का एक अंग है ।

इसके अतिरिक्त - प्रमुख फसलों जैसे - तंबाकू, मसाले, चाय, रबर, कपास एवं जूट आदि का निर्यात भी अपने देश से ही किया जाता है । जिससे राष्ट्र को आए होती है । देश की निर्यात सामग्री में 70% निर्यात सस्य पदार्थों का होता है ।


7. मृदा उर्वरकता में वृद्धि -

वैज्ञानिक विधि से हम भूमि पर फसलों को उगाकर उसकी उर्वरा शक्ति का संरक्षण एवं वृद्धि भी करते हैं । जैसे - फसल चक्र अपनाकर, दो दाल वाली फसलों को उगा कर, हम बीच-बीच में भूमि की उर्वरता संरक्षित रखते हैं । इसके अतिरिक्त मृदा में जीवांश पदार्थ, मृदा क्षारीयता, मृदा संरचना तथा मृदा अपरदन से संरक्षित करके सफल सस्य उत्पादन करते है ।


8. सस्य उत्पादन से अन्य घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति -

खाद्य एवं वस्त्र पूर्ति के अतिरिक्त अन्य आवश्यकताओं, जैसे - ईंधन व खाद्य तेल आदि की पूर्ति भी सबसे उत्पादन से ही होती है ।


9. अंतरराष्ट्रीय ख्याति -

कुछ विशेष फसलों के उत्पादन मैं अपने देश को अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि प्राप्त है इनमें प्रमुख फसलें गन्ना, चाय, कॉफी, कपास तथा जूट है ।


10. रहन-सहन के स्तर में वृद्धि -

सस्य उत्पादन से मनुष्य की आय बढ़ती है जो कि उनके रहन-सहन के स्तर को ऊंचा करती है । इस प्रकार सामूहिक रूप से देश की जनता का रहन-सहन का स्तर ऊपर उठता है ।


एकीकृत या समन्वित रोग कीट नियन्त्रण

इसमें रोग व कीट नियन्त्रण विभिन्न विधियों को सम्मिलित करके ऐसा समन्वय किया जाता है जिससे कीटों व रोगों को एक निश्चित सीमा में बाँधकर रखा जा सके ।


अतः एकीकृत रोग, कीट नियन्त्रण के निम्न उपचार हैं -

  • प्रतिरोधक एवं रोग व कीट - सहनशील प्रजातियों को उगाना ।
  • कर्षण क्रियायें - ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई, खेतों की सफाई, खरपतवारों को नष्ट करना, रोगी पौधों को उखाड़कर नष्ट करना, फसलों की समय पर बुआई, जल निकास की उत्तम व्यवस्था, पानी का समुचित प्रबन्ध ।
  • बीज उपचार - बीजोपचार में प्रयुक्त रसायनों के स्थान पर जैव कीटनाशियों के प्रयोग की सलाह दी गई है जैसे- ट्राइकोडरमा का प्रयोग उकठा, फफूंद फ्यूजेरियम स्कलेरोशियम के लिए किया जा रहा है । NPV सूंडी के नियन्त्रण के लिए प्रयोग करते हैं । गन्ना छेदकों के लिए ट्राइकोग्रामा अण्डा परजीवी प्रयोग किये जा रहे हैं ।
  • फसल चक्र - सब्जियों में मूल ग्रन्थि रोग, चने का उकठा रोग नियन्त्रण हेतु फसल चक्र अपनायें ।
  • जैविक रोग नियन्त्रण - ट्राइकोडर्मा द्वारा मृदा व बीज जनित रोगों, जैसे - अरहर, चने का म्लानि रोग (उकठा) का नियन्त्रण कर सकते हैं । NPV [चने के फली छेदक सूंडी (इल्ली) में लगने वाला विषाणु रोग] द्वारा चने की इल्ली का नियन्त्रण कर रहे हैं ।
  • फेरोमोन ट्रैप द्वारा - फली छेदक के नर वयस्क एकत्रित करते हैं ।
  • अन्तरवर्ती फसलें उगाकर - कीटों व रोगों के प्रकोप को कम कर सकते हैं । चना व मसूर के साथ अलसी उगाने से रोग व कीट कम लगते हैं ।
  • सीमित रसायनों का उपयोग - उर्वरकों का कार्बनिक खादों के साथ सीमित एवं सन्तुलित प्रयोग करें । अन्य रसायनों का सीमित प्रयोग करें ।


भविष्य में सस्य विज्ञान | agronomy in future in hindi

विश्व में सस्य विज्ञान सदैव एक महत्त्वपूर्ण विषय रहा है । हमारे देश में अधिकांश जनसंख्या का भोजन सस्य उत्पादन पर ही निर्भर करता है, अतः सस्य विज्ञान का महत्त्व (impotance of agronomy in hindi) भारतवर्ष में और भी अधिक हो जाता है ।

जैसा कि पहले वर्णन किया जा चुका है, कि जनसंख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है और कृषि योग्य भूमि को और अधिक बढ़ाने की कोई सम्भावना नहीं है, अतः प्रति इकाई क्षेत्र उपज में वृद्धि ही एक मात्र साधन है जिसके आधार पर हम बढ़ती हुई आबादी के लिये खाद्यान्न पूर्ति कर सकते हैं ।

सस्य विज्ञान (agronomy in hindi) के इस महत्त्व को ध्यान में रखते हुए इस विषय में प्रगति की बहुत आवश्यकता है । सस्य विज्ञान की प्रगति में खाद्य समस्या के साथ - साथ कुछ औद्योगिक क्षेत्र की समस्यायें भी कृषि द्वारा कच्चे माल का उत्पादन करके हल करते हैं । इस क्षेत्र में अभी तक अनुसन्धान कार्य अधिकतर सस्यों (पौधों) को उगाने के लिये आवश्यक खाद, बीज की मात्रा, बोने की विधि व समय, बोने की गहराई, पानी देने का समय व पानी की मात्रा आदि आवश्यकताओं पर ही किया जा रहा है ।

इस प्रकार का अनुसन्धान, जैसे ही फसलों की नई उन्नत किस्में तैयार की जाती हैं, बदल जाता है । अतः भविष्य में सस्य वैज्ञानिकों को इससे सम्बन्धित विज्ञानों, जैसे - मृदा प्रबन्ध, पादप रोग, पादप कीट व पादप प्रजनन तथा अन्य क्षेत्रों में होने वाले अनुसन्धानों के परिणामों को ध्यान में रखते हुए कल की फसलों के उत्पादन के लिए उचित वातावरण की प्राप्ति की दिशा में अनुसंधान कार्य करना होगा ।

इसके लिए कृषि वैज्ञानिकों को पौधों के मृदा के बाहर व अन्दर वाले दोनों ही वातावरणों का गहन अध्ययन करना होगा । पौधे के लिये प्राकृतिक वातावरण की सीमित उपलब्धता, जैसे - प्रकाश, आर्द्रता व तापमान, आदि पैदावार के लिये एक बाधा बनी हुई है । इनको जटिल अनुसन्धानों के आधार पर हल करना होगा । यद्यपि हमारे देश में प्राकृतिक सुविधायें काफी मात्रा में उपलब्ध हैं परन्तु इनका समुचित उपयोग नहीं हो रहा है ।


उदाहरण के लिये - सूर्य के प्रकाश को लेकर यदि अध्ययन करें तो हम निम्न निष्कर्ष पर पहुँचते हैं । फसलों की उन्नत किस्मों में अभी तक प्रकाश द्वारा भोजन बनाने की क्रिया प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis in hindi) एक निश्चित सीमा तक ही होती है । इसी कारण हम सस्य उत्पादन की सभी उन्नत विधियों को अपनाकर भी एक निश्चित स्तर से अधिक उपज प्राप्त नहीं कर सकते सूर्य के प्रकाश से प्राप्त ऊर्जा बेकार नष्ट होती है और उसका थोड़ा भाग ही हरे पौधों के लिये भोजन के रूप में प्राप्त होता है । अधिकतर पौधों की पत्तियों अपने पैतृक गुणों के कारण, ऊपरी सतह की तुलना में निचली सतह द्वारा सूर्य के प्रकाश का बहुत ही कम उपयोग कर पाती हैं । कभी - कभी तो कुछ पौधों में निचली पत्तियाँ पूर्ण रूप से प्रकाश संश्लेषण नहीं कर पातीं ।

इस प्रकार वे उपज में वृद्धि न करके स्वयं ऊपरी पत्तियों द्वारा बनाये गए भोजन पर ही निर्भर रहकर, उपज को कम करने में योगदान देती हैं । इस समस्या को ध्यान में रखकर यह आवश्यक हो जाता है कि हम अपनी वर्तमान फसलों के पौधों की आकृति में सुधार करें जिससे कि उनकी सभी पत्तियों का अधिक से अधिक भाग प्रकाश ग्रहण कर सके ।

इसके लिए हमें झुकी हुई तथा क्षैतिज पत्तियों के स्थान पर सीधी व संकरी (erect and narrow) पत्तियों वाले पौधे तैयार करने होंगे । साथ ही साथ, हमें प्रति इकाई क्षेत्र में पत्तियों की संख्या में वृद्धि करनी होगी, पौधों का आकार कम करना होगा, जिससे कुल जैविक उत्पादन (biological yield) का अधिक भाग आर्थिक उत्पादन (economic yield) के रूप में प्राप्त हो सके ।

पौधों का आकार छोटा व उसके ऊपर सीधी व अधिक संख्या में पत्तियाँ होने से कम क्षेत्र में अधिक पौधे उगाकर प्रति इकाई क्षेत्र पैदावार में वृद्धि कर सकेंगे । पौधों को खेत में कतारों के अन्दर इस प्रकार से बोयें कि वे प्राकृतिक साधनों, जैसे- प्रकाश, आदि का अधिक से अधिक लाभ उठाकर, अधिक पैदावार देने में सहयोग दें ।


सस्य वैज्ञानिकों का उद्देश्य एवं कर्त्तव्य | role of the agronomists in hindi

कृषि विज्ञान में दूसरे विशेषज्ञों, जैसे - पादप प्रजनन वैज्ञानिक, पादप रोग विशेषज्ञ, मृदा विशेषज्ञ आदि वैज्ञानिकों द्वारा प्राप्त अनुसन्धानों का खेत के अन्दर उपयुक्त एवं पूर्णरूपेण - अन्तिम परिणाम सस्य वैज्ञानिक ही खोजता है ।

इस प्रकार सस्य वैज्ञानिक दूसरे कृषि विशेषज्ञों के अनुसन्धान का आपस में समन्वय स्थापित करता है ।

सस्य वैज्ञानिक की तुलना उस डॉक्टर से कर सकते हैं जो कि विभिन्न प्रकार के मरीजों को दवाइयाँ देता है व आवश्यकता पड़ने पर मरीजों की बीमारी के बारे में दूसरे विशेषज्ञों से सलाह लेता है व आवश्यकता पड़ने पर मरीज को बीमारी के विशेषज्ञ के पास भेज देता है ।

इसी प्रकार सस्य वैज्ञानिक, फसल की पैदावार पर विभिन्न कारकों, जैसे - मृदा, मौसम, फसल की किस्मों, पौधों की बीमारियाँ, पौधों पर कीट - पतंगों का आक्रमण के साथ - साथ फसल की बुआई के समय, बुआई की विधियों, बीज दर, पानी की मात्रा व समय, खाद की मात्रा, समय व खेत में देने की विधि खरपतवार नियन्त्रण, आदि का आपस में सम्बन्ध स्थापित करके फसल से अधिक से अधिक पैदावार लेने के लिए अनुसन्धान करता है । आवश्यकता पड़ने पर सस्य वैज्ञानिक फसल कीट वैज्ञानिक, पादप रोग वैज्ञानिक एवं मृदा वैज्ञानिक से सलाह लेकर, फसल का उत्पादन बढ़ाने में सहयोग देता है ।

इस प्रकार सस्य वैज्ञानिक का मुख्य उद्देश्य/कर्त्तव्य प्रति इकाई क्षेत्र अधिकतम व गुणवत्ता युक्त उत्पादन है ।

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