कृषि क्या है यह कितने प्रकार की होती है एवं भारत में कृषि का महत्व व विकास

Agricultural Study
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पृथ्वी के स्रोतों का इष्टतम प्रयोग करने के लिए भोजन, कपड़ा, ईंधन आदि प्रारंभिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए मनुष्य द्वारा जो क्रिया की जाती है उन्हें ही कृषि (agriculture in hindi) कहा जाता है ।

भारत एक कृषि (agriculture in hindi) प्रधान देश है, जिसके पास विश्व की मात्र 2.4 प्रतिशत भूमि है । भारत में विश्व की लगभग 7 प्रतिशत प्रजातियां तथा पूरी मानव आबादी का लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा निवास करती है ।


एग्रीकल्चर शब्द का अर्थ | meaning of agriculture in hindi

एग्रीकल्चर की उत्पत्ति लैटिन भाषा से हुई है । 

Agriculture दो शब्दों "Agre" तथा "Culture" से मिलकर बना हुआ है । 

जिनका अर्थ है "Agre= मृदा एवं culture = खेती करना ।" 

अर्थात् एग्रीकल्चर शब्द का अर्थ होता है- "भूमि पर खेती तथा कर्षण क्रिया करना ।"


कृषि की परिभाषा | defination of agriculture in hindi

कृषि की परिभाषा (defination of agriculture in hindi) - "भूमि पर की जाने वाली समस्त क्रियाएँ जो फसलोत्पादन एवं पशुपालन व्यवसाय के लिए आवश्यक है, उन्हें करने की कला एवं विज्ञान को कृषि कहा जाता है ।" 

"Agriculture is the art and science of doing all the activities on land which are necessary for crop production and animal husbandry business."

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भारतीय कृषि एवं उसके प्रकार | types of indian agriculture in hindi

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भारतीय कृषि एवं कृषि के प्रकार (Agriculture In Hindi)

कृषि विज्ञान की प्रमुख शाखाएं | branches of agriculture in hindi


कृषि को मुख्यतः दो भागों में विभाजित किया जाता है -

1. प्राथमिक इकाई ( Primary unit ) -

पौध विज्ञान : शस्य विज्ञान, वन विज्ञान, आरोपित फसलें, मसाले की फसलें, जीवाणु, कवक तथा शैवाल, वृक्ष एवं झाड़ी उत्पादन, उद्यान विज्ञान ।

2. सामान्य कृषि ( Secondary unit ) -

पशु विज्ञान : गाय, भैंस तथा घोड़ा पालन, भेड़ एवं बकरी पालन, सुअर पालन, सुअर एवं बतख पालन, मधुमक्खी पालन, लाख उत्पादन तथा रेशम पालन ।


कृषि कितने प्रकार की होती है? | types of agriculture in hindi


कृषि के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित है -

  • मिश्रित कृषि (Mixed cropping)
  • मिश्रित खेती (Mixed farming)
  • शिफ्टिंग खेती (Shifting cultivation)
  • समोच्च कृषि ( Contour farming )
  • रोपण कृषि ( Plantation farming )
  • पट्टीदार खेती ( Strip cropping )
  • संरक्षित खेती ( Conservative Agriculture )
  • रिले क्रॉपिंग ( Relay Cropping )
  • कृषि वानिकी ( Agro Forestry )

जल-प्राप्ति एवं आर्द्रता के आधार पर कृषि के प्रमुख प्रकार -

  • तर कृषि ( Wet Farming ) 
  • आर्द्र कृषि ( Humid Farming ) 
  • सिंचित कृषि ( Irrigated Farming )
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कृषि के प्रमुख प्रकार का वर्णन | types of agriculture in hindi


मिश्रित कृषि ( Mixed cropping ) -

एक ही खेत में दो या दो से अधिक फसलों को एक साथ उगाना मिश्रित कृषि कहलाता है, जिसका प्रमुख उद्देश्य मृदा क्षरण रोकना तथा विपरीत परिस्थितियों में कम से कम एक फसल का सही ढंग से उत्पादन करना है ।


मिश्रित खेती ( Mixed farming ) -

फसल उत्पादन के साथ-साथ पशुपालन करना मिश्रित खेती कहलाता है ।


शिफ्टिंग खेती ( Shifting cultivation ) -

वनों को जलाकर उनके स्थान पर जगह बदल - बदल कर खेती करना शिफ्टिंग खेती कहलाता है ।


समोच्च कृषि ( Contour farming ) -

पहाड़ी क्षेत्रों पर जो कृषि की जाती है उसे समोच्च कृषि कहा जाता है ।


रोपण कृषि ( Plantation farming ) -

एक विशेष प्रकार की खेती करना, जैसे रबड़, चाय तथा कहवा की खेती करने को है रोपण कृषि कहा जाता है ।


पट्टीदार खेती ( Strip cropping ) -

ढ़ालदार भूमि पर मृदा उत्पादन को कम करने के लिए दलहनी फसलों तथा घास को पट्टियों के रूप में ढ़ाल के विपरीत दिशा में बोना ही पट्टीदार खेती कहलाता है ।


संरक्षित खेती ( Conservative Agriculture ) -

विषम परिस्थितियों में भी फसलों की वृद्धि के लिए आवश्यक अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराने के लिए ग्रीन हाउस, शेडनेट, प्लास्टिक टनल व मल्चिंग का उपयोग करके खेती करना ही संरक्षित खेती कहलाता है ।


रिले क्रॉपिंग ( Relay Cropping ) -

एक वर्ष में एक ही खेत में चार फसलें लेना (खड़ी फसल में बुवाई करना) रिले क्रॉपिंग या अविराम कृषि कहलाता है ।


कृषि वानिकी ( Agro Forestry ) -

कृषि के साथ - साथ फसल चक्र में पेड़ों, बागवानी व ढाड़ियों की खेती कर फसल व चारे का उत्पादन करना ही कृषि वानिकी कहलाता है ।


जल-प्राप्ति एवं आर्द्रता के आधार पर कृषि के प्रकार


तर कृषि ( Wet Farming ) -

इस प्रकार की कृषि काँप मिट्टी के उन क्षेत्रों में प्रचलित है, जहाँ पर वर्षा की मात्रा 200 सेमी . से अधिक पाई जाती है । भारत में इस प्रकार की कृषि का प्रसार मध्य व पूर्वी हिमालय क्षेत्र, असम, मेघालय, पश्चिम बंगाल, नागालैण्ड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा तथा पश्चिमी समुद्रतटीय मैदानों में है । 

इन क्षेत्रों में फसलोत्पादन के लिए सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती तथा वर्ष में एक से अधिक बार भूमि से कृषि उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है । चावल तथा जूट इस प्रकार की खेती के प्रमुख उदाहरण है ।


आर्द्र कृषि ( Humid Farming ) -

यह कृषि काँप तथा काली मिट्टी के उन क्षेत्रों में प्रचलित है जहाँ पर वार्षिक वर्षा 100 से 200 सेमी. के मध्य रहती है । भारत में ऐसे क्षेत्र मध्य एवं पूर्वी गंगा का मैदान, ब्रह्मपुत्र की घाटी, तथा उत्तर - पूर्वी पठारी भाग पर विस्तृत हैं । यहाँ पर वर्ष में दो फसलों के अलावा कभी - कभी जायद फसल भी प्राप्त की जा सकती है ।


सिंचित कृषि ( Irrigated Farming ) -

इस कृषि का प्रसार काँप, काली व लाल, पीली मिट्टी के उन क्षेत्रों में मिलता है जहाँ पर वर्षा की मात्रा 50-100 सेमी. के मध्य होती है, जोकि कृषि के लिए अपर्याप्त होती है । इन भागों में कृषि मुख्य रूप से सिंचाई पर ही निर्भर रहती है । इसका विस्तार पंजाब, हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु व पूर्वी तट पर नदियों के डेल्टा प्रदेशों तक सीमित है । यहाँ पर गेहूँ व गन्ना की खेती प्रमुख रूप से की जाती है ।

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कृषि की मुख्य विशेषतायें क्या है? | characteristics of agriculture in hindi


भारतीय कृषि अपनी कुछ विशिष्ट विशेषताओं के लिये प्रसिद्ध है जो निम्नलिखित है -

  • कृषि का प्रकृति पर अत्यधिक निर्भर होना
  • कृषि जीवन - यापन की पद्धति
  • समय बद्धता
  • कृषि एक जैविक उद्योग है 
  • श्रम विभाजन की सीमितता
  • उत्पादन में पूर्ण विशिष्टीकरण का अभाव


कृषि का प्रकृति पर अत्यधिक निर्भर होना -

भारतीय कृषि प्रकृति पर मुख्य रूप से निर्भर करती है । इसीलिये कृषि को 'मानसून का जुआ' कहा गया है कृषि की सभी क्रियायें जैसे बुवाई, सिंचाई, पकाई, कटाई आदि मानसून से प्रभावित होती है । अच्छी वर्षा होने से बोया गया क्षेत्रफल बढ़ जाता है, कम वर्षा से बोया गया क्षेत्रफल बहुत घट जाता है मानसून की अनिश्चितता के कारण कृषि उत्पादन भी अनिश्चित रहता है, कृषि कार्य जोखित भरा होता है ।

कृषि जीवन - यापन की पद्धति -

सामान्यत: कृषि एक अलाभकारी व्यवसाय माना जाता है । अतः किसान अपने जीवन निर्वाह हेतु ही कृषि करता है, न कि लाभ कमाने की दृष्टि से ।

समय बद्धता ( Time bound ) -

कृषि क्रियायें समयबद्ध हैं । एक निश्चित समयावधि में ही कुछ विशिष्ट क्रियायें करना जरूरी होती है । फसलें निश्चित समय पर बोई जाती हैं । समय से पूर्व फसलें नहीं पकती हैं । कोई फसल वर्ष भर बोई, व काटी नहीं जा सकती है ।

कृषि एक जैविक उद्योग है —

फसलोत्पादन व पशुओं - पक्षियों के विकास व परिपक्वता में एक निश्चित समय लगता है । गन्ने की फसल को दो या चार माह में रात - दिन सींचकर तैयार नहीं कर सकते हैं । पशुओं के प्रसवकाल में एक निश्चित समय लगता है ।

श्रम विभाजन की सीमितता -

कृषि में उद्योग की भाँति श्रम विभाजन नहीं किया जा सकता है । कुछ क्रियाओं में श्रम विभाजन असम्भव होता है ।

उत्पादन में पूर्ण विशिष्टीकरण का अभाव -

कृषि में पूर्ण विशिष्टीकरण नहीं किया जा सकता है । गेहूँ का उत्पादन करने में भूसा भी होता है । कुछ फसलें मिश्रित बोने में ही लाभकारी होती


इसके अतिरिक्त कृषि की प्रमुख विशेषताएं निम्न है -

  • कृषि कार्य साधारणतः छोटे पैमाने पर किया जाता है । बड़े पैमाने पर खेती बहुत कम की जाती है तथा भारतीय परिस्थितियों में उचित भी नहीं है ।
  • कृषि उत्पादन की इकाइयाँ साधारणत: छोटी और विशाल क्षेत्र में दूर - दूर तक फैली होती हैं । इसीलिये किसान और कृषि श्रमिकों में संगठन का अभाव होता है ।
  • कृषि के लिये भूमि की सबसे अधिक आवश्यकता होती है ।
  • कृषि पदार्थों की कीमतों में अत्यधिक उतार - चढ़ाव आता है । फसलें कटकर एक साथ बाजार में आने से उनकी कीमतें बहुत गिरती हैं ।
  • भारतीय कृषि में पारिवारिक श्रम का अधिक उपयोग होता है ।
  • कृषि उत्पादन में क्रमांगत उत्पत्ति ह्रास नियम शीघ्र लागू होता है ।
  • कृषि उत्पादों का वर्गीकरण व श्रेणीकरण कठिन होता है, क्योंकि कृषि उत्पादों में एकरूपता का अभाव होता है ।
  • कृषि उत्पादों को अधिक समय तक टिकाऊ रखना कठिन होता है ।
  • कृषि व्यवसाय अगतिशील होता है । खड़ी फसल को तुरन्त दूसरे स्थान पर नहीं ले जा सकते हैं ।
  • कृषि उद्योग श्रम प्रधान है, न कि पूँजी प्रधान ।


भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का क्या महत्व है? | Importance of agriculture in hindi


भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का निम्नलिखित महत्व है -

  • एक व्यवसाय के रूप में तथा जीविकोपार्जन के रूप में कृषि का महत्वपूर्ण स्थान है ।
  • किसी भी राष्ट्र की आर्थिक एवं सामाजिक उन्नति के लिए कृषि का विकास अत्यंत आवश्यक है ।
  • विभिन्न प्रकार के उद्योगों के लिए भी कृषि के द्वारा कच्चे माल की आपूर्ति सुनिश्चित होती है ।
  • कृषि का औद्योगिक विकास में भी कृषि (agriculture in hindi) का महत्वपूर्ण स्थान है ।
  • कृषि में देश के भू - क्षेत्र का सर्वाधिक भाग प्रयोग किया जाता है । उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार कुल भू - क्षेत्र के 49.8% भाग में खेती की जाती है । 
  • कृषि देश की 103 करोड़ जनसंख्या को भोजन तथा 36 करोड़ पशुओं को चारा प्रदान करती है । यहाँ यह उल्लेखनीय है कि भारतीयों के भोजन में कृषि उत्पाद ही प्रमुख होते हैं । 

कृषि विज्ञान का विकास | development of agriculture in hindi


कृषि के विकास का अध्ययन दो भागों में सफलतापूर्वक किया जा सकता है -

  1. प्रारंभिक कृषि विकास ( Primary Agricultural Development )
  2. आधुनिक कृषि विकास ( Modern Agricultural Development ) 


1. प्रारंभिक कृषि विकास ( Primary Agricultural Development )

प्रारंभिक कृषि विकास का अध्ययन सफलतापूर्वक करने के लिए इसको हम निम्नलिखित भागों में विभक्त करते हैं -

  • शिकार युग ( Huntin stage )
  • पशुपालन युग ( Postoral stage )
  • प्रारंभिक कृषि युग ( Primary plant culture stage )


शिकार युग ( Huntin stage ) -

प्रारंभ में मनुष्य को भूमि पर खेती करके अपना जीवन निर्वाह करने की आवश्यकता अनुभव नहीं हुई, क्योंकि उस समय मनुष्य को अपना पेट भरने के लिए प्राकृतिक खाद्य भंडार दो रूपों में उपलब्ध होता था । पहला प्राकृतिक भंडार जंगली जानवर थे जिन का शिकार करके मनुष्य अपना पेट भरता था । आजकल जैसे - मनुष्य कपड़े की आवश्यकता अनुभव करता है और उसे फसल उगा कर प्राप्त करता है, वैसे ही प्रारंभ में प्राकृतिक प्रकोप जैसे - ठंड, गर्मी व वर्षा आदि से बचने के लिए मनुष्य इन्हीं जंगली जानवरों की खाल ओढ़कर अपना जीवन निर्वाह कर लेता था । भोजन का दूसरा प्राकृतिक साधन फल वाले वृक्ष थे । समय अनुसार उपलब्धि पर मनुष्य इन प्राकृतिक साधनों से अपना पेट भर लेता था ।


पशुपालन युग ( Postoral stage ) -

जैसे-जैसे मनुष्य की जनसंख्या बढ़ती गई, प्राकृतिक खाद्य सामग्री के स्रोत कम होने लगे तथा मनुष्य ने दीर्घ समय तक जीवन निर्वाह करने के लिए पशुओं को पालने की आवश्यकता अनुभव की । प्रारंभ में शायद पशुओं को मांस के लिए ही पाला गया हो । बाद में दूध देने वाले पशुओं को पालना प्रारंभ किया । इन पशुओं में मुख्य तौर पर भेड़, बकरी, गाय और भैंस आदि सम्मिलित थे । मनुष्य इनको समूह में रखकर पालता था तथा पशुओं को एक झुंड के रूप में रखता था । पशुओं के खाने पीने के प्रबंध के लिए मनुष्य ऐसे स्थानों की तलाश रखता था, जहां पर जल का कोई साधन हो जैसे - तालाब, झील एवं नदी इत्यादि । इसके साथ-साथ वह इनके लिए चारे अथवा प्राकृतिक वनस्पति का भी ध्यान रखता था । अपने पशुओं के झुंड को वह तब तक ऐसे स्थानों पर रुके रखता था जब तक कि वहां पशुओं के लिए जल एवं खाद्य सामग्री उसे प्राप्त होती रहती थी ।


प्रारंभिक कृषि युग ( Primary plant culture stage ) -

प्रारंभ में, जहां तक अनुमान लगाया जाता है, चरागाहों के विकास का ध्यान रखा जाता था क्योंकि पशुओं के लिए चारे का प्रबंध करना उस समय में उन लोगों का मुख्य उद्देश्य था । परंतु जैसे-जैसे मनुष्य की जनसंख्या बढ़ती गई तो खाद्य समस्या कठिन होती चली गई और मनुष्य ने बीजों को भूमि में बोना प्रारंभ कर दिया उस समय की खेती के ढंग अधिक विकसित नहीं थे । मनुष्य खेत की जुताई पत्थर, लकड़ी या हड्डियों से बने औजार ओ से करता था ।  जिस प्रकार की वनस्पति उसके लिए उपयोगी थी उसका बीज भूमि में वह देता था परंतु धीरे-धीरे मनुष्य को ज्ञान होता गया तथा उसने खेत से खरपतवार तथा खड़ी फसल की निराई गुड़ाई करना भी आरंभ कर दिया । खड़ी फसल को पानी देने की लिए मनुष्य पहले किसी तालाब नदी या जल स्रोतों के नजदीक ही जमीन जोतता था । इन्हीं से फसलों की सिंचाई करता था प्रारंभ में मनुष्य को पौधों के पोषक तत्व का ज्ञान नहीं था जिससे बाहर से खाद डालकर उनकी पूर्ति कर सके तथा अच्छी उपज पौधों से प्राप्त कर सके इस समस्या को हल करने के लिए मनुष्य कुछ समय तक भूमि के एक टुकड़े पर खेती करता था । जैसे ही यहां फसल की उपज कम होना प्रारंभ होती थी मनुष्य किसी दूसरे भूमि के उपजाऊ टुकड़े की तलाश करके वहां पर खेती प्रारंभ करता था, इस प्रकार वह अपनी खाद्य समस्या का हल करता था । इस प्रकार से खेती करने को स्थानांतरण खेतिया झूमिंग खेती या बदलती खेती (shifting farming in hindi) कहा जाता था ।

यह विधि संसार के कुछ देशों में अभी भी प्रचलित है अपने देश के मध्यप्रदेश व असम के कुछ भागों में भी इस प्रकार की खेती, जंगलों को साफ करके, आदिवासी जातियों जैसे भील, कोल व संथान आदि के द्वारा की जाती है । इस प्रकार जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती गई, जंगलों को साफ करके, खेती के अंतर्गत भूमि को बढ़ाया गया तथा इस प्रकार मनुष्य अपनी खाद्य समस्या हल करता रहा ।

बाद में खेती के अंदर मृदा की उर्वरता का महत्व समझा जाने लगा । वह इस प्रकार की खेती बंद करके मर्दा के अंदर खाद डालकर उसकी उर्वरता को स्थाई रखने का प्रयत्न किया जाने लगा । धीरे-धीरे वैज्ञानिकों ने पौधों के पोषण के लिए आवश्यक खाद तत्वों की खोज समय अनुसार पानी की मात्रा आदि पर अनुसंधान करके कृषि को आधुनिक कृषि प्रणाली तक पहुंचा दिया ।


2. आधुनिक कृषि विकास ( Modern Agricultural Development ) 

जैसे-जैसे मनुष्य को खेती का ज्ञान होता गया, उसने खेती करने की विधियों में सुधार जारी रखा उसने खेती की विभिन्न सबसे क्रियाओं की जानकारी प्राप्त कर ली तथा आजकल विभिन्न सबसे क्रियाओं पर अनुसंधान के फल स्वरुप प्राप्त परिणामों को उसने अपना ना आरंभ कर दिया अपने उपलब्ध साधन, जलवायु वह भूमि किस्म के अनुसार ही वह आजकल विभिन्न फसलों को उगाता है । भूमि की उर्वरा शक्ति की महत्ता का भी उसे अब ज्ञान है और भली-भांति समझता है कि मृदा की उर्वरता शक्ति को कायम रखते हुए हमें भूमि से अच्छी उपज प्राप्त करना है ।

उसने फसलों को वैज्ञानिक आधार पर तैयार फसल चक्र में ही सस्य योजना के अनुसार उगाना प्रारम्भ कर दिया है । प्रत्येक फसल में आर्थिक लाभ को देखते हुए उसने अच्छी उन्नत किस्मों को उगाना प्रारम्भ कर दिया है । संसार के प्रायः सभी देशों में कृषि की उन्नति के लिए सरकार की ओर से अनुसंधान फार्म चालू हैं जो कि फसल उत्पादन के प्रत्येक पहलू को ध्यान में रखते हुए अनुसंधान कर रहे हैं । इन अनुसंधान कार्यों को कई एक विभागों द्वारा संचालित किया जाता है । इनके अन्तर्गत पादप प्रजनन विज्ञान विभाग, विभिन्न फसलों की विभिन्न विधियों द्वारा उन्नत किस्में (varieties) तैयार करता है ।


कीट विज्ञान विभाग व पादप रोग विभाग ( entomology & plant pathology division ) -

इन किस्मों की विभिन्न कीट - पतंगों व बीमारियों से सुरक्षा के लिये अनुसंधान योजनायें संचालित करता है । कृषि रसायन विभाग पौधों की पोषक तत्त्वों की आवश्यकता सम्बन्धी व भूमि में इनकी उपस्थिति व उपलब्धता सम्बन्धी जानकरी देता है तथा सस्य विज्ञान विभाग अन्य सस्य क्रियायें जैसे उचित समय पर बुआई, भूमि की तैयारी, बीज दर, सिंचाई, खाद, खरपतवार नियन्त्रण आदि समस्याओं पर अपने अनुसंधान जारी रखता है । इन सभी विभागों द्वारा प्राप्त लाभदायक परिणाम, सरकार अपने कृषि प्रसार विभागों (agriculture extension departments) के द्वारा किसानों तक पहुंचाती है ।

आजकल किसानों की रुचि आधुनिक ढंग से खेती की विधियों की ओर बढ़ती जा रही है । वह अच्छे किस्म के बीजों की बुआई समय पर करता है उचित मात्रा में तथा समयानुसार सिंचाई करता है । उचित मात्रा में पोधों के पोषक तत्त्वों को जुटाने के लिए विभिन्न खाद व उर्वरकों का प्रयोग करता है तथा भूमि को वैज्ञानिक विधियों से तैयार करता है । खरपतवार नियन्त्रण के लिए विभिन्न रसायनों का प्रयोग प्रारम्भ कर दिया है । समय पर निराई - गुड़ाई व कटाई करके अच्छी पैदावार प्राप्त करता है ।

आज कृषक फसलों की शीघ्र पकने वाली फिल्मों के विकास से एक ही वर्ष में तीन से लेकर चार फसलें तक भी एक ही खेत में पैदा कर सकता है और प्रति वर्ष प्रति हेक्टेयर सौ क्विंटल से भी अधिक खाधान्न पैदा करके अच्छा लाभ कमा सकता है । अनुसंधानों के आधार पर बरानी क्षेत्रों में खेती करके अच्छी पैदावार ली जा रही है । इसके अतिरिक्त कृषि के विभिन्न पहलुओं पर अनुसंधान जारी है, जो कि भविष्य में कृषि के लिए वरदान सिद्ध हो सकते हैं ।

कृषि विज्ञान (agriculture in hindi) में तकनीकी वृद्धि के साथ सस्य विज्ञान में भी आधुनिकीकरण हुआ है । बहुत सी प्राचीन मान्यताओं और परम्पराओं में आमूल परिवर्तन हुए हैं । अधिक वृद्धि वाली प्रजातियों के स्थान पर बौनी जातिया (dwarf varieties) विकसित करके फसल उत्पादन बढ़ाया गया है ।

अधिक जुताई के स्थान पर न्यूनतम भूपरिष्करण (minimum tillage in hindi) तथा शून्य कर्षण (zero tillage in hindi) को अपनाना, खरपतवारों का शाकनाशी रसायनों (weedicides) द्वारा नियन्त्रण, जुताई, निराई - गुड़ाई के लिये उन्नत कृषि यन्त्रों का प्रयोग करना, परती छोड़ने (fallowing) अथवा हरी खाद उगाने की जगह अधिक सस्य गहनता वाली फसलों को (multiple cropping in hindi) उर्वरकों का प्रयोग करके उगाना तथा दलहनी फसलों में खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग करना आदि महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हैं ।

अब पर्यावरण के दृष्टिकोण से सस्य विज्ञान में भी परिवर्तन परिलक्षित हैं क्योंकि जल व वायु प्रदूषण बढ़ रहा है, साथ ही उर्वरक भी महंगे होते जा रहे हैं तथा फार्म उत्पादन की गुणवत्ता श्रेष्ठ नहीं है । अतः उर्वरकों के स्थान पर कार्बनिक खादों तथा जैव उर्वरकों (bio fertilizers in hindi) एवं वर्मी कम्पोस्ट (organic farming in hindi) के प्रयोग पर बल दिया जा रहा है ।

कीटों व रोगों के नियन्त्रण के लिये रसायनों के प्रयोग करने के स्थान पर एकीकृत नाशी जीव प्रवन्धन विधियाँ अपनायी जा रही हैं । जिसमें कीटों व रोगों को नष्ट करने के लिये परजीवी, परभक्षी (जैविक नियन्त्रण) नीम प्लस, नीम सीडो (शुद्ध नीम सीड पाउडर), वानस्पतिक प्राकृतिक उत्पाद (नीम सीडो फफूंदनाशक, विषाणुनाशक, कोटाणुनाशक है ।) प्रयोग करने की संस्तुति की जा रही है तथा एकीकृत पौध पोषक तत्व प्रणाली (IPNS) अपनाने की संस्तुति की जा रही है ।

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