खरपतवार क्या है इसका अर्थ, परिभाषा एवं खरपतवार नियंत्रण की प्रमुख विधियां

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किसान एवं खेत को हानि पहुंचाने वाले कृषि घटकों में खरपतवार (kharpatwar) प्रमुख है । एक ओर खरपतवार लाभकारी तो दूसरी ओर फसलीय पोषण के अनाधिकृत हिस्सेदार होते है ।

इसलिए इनसे छुटकारा पाने के लिए खरपतवार नियंत्रण करना प्रत्येक किसान के लिए जरूरी एवं महत्त्वपूर्ण सस्य क्रिया में से एक है । प्राचीन काल से ही खरपतवार नियंत्रण की विधियों का विकास होता रहा है ।


खरपतवार क्या है | kharpatwar kya hain

उन पौधों को जो उस स्थान पर बिना बोए उगते हैं जहाँ उन्हें नहीं उगना चाहिए खरपतवार (kharpatwar) कहलाते हैं ।

दूसरे शब्दों में खरपतवार एक अवांछित वनस्पति है ।

खरपतवार के उदाहरण - गेहूँ के खेत में जौ का पौधा खरपतवार है जबकि जौ के खेत में गेहूँ का पौधा ।


खरपतवार का अर्थ है | meaning of kharpatwar in hindi

वास्तव में, खरपतवार होना किसी पौधे के लक्षण एवं उगने के स्थान पर निर्भर करता है ।

कोई भी पौधा अपने आप में खरपतवार नहीं होता वरन् कुछ विशेष परिस्थितियों में प्रत्येक किस्म का पौधा खरपतवार हो सकता है ।


खरपतवार का अर्थ (meaning of kharpatwar in hindi) -

  • अवांछित स्थान पर उगने वाला पौधा है ।
  • वांछित भू - प्रयोग में हस्तक्षेप करने वाला पौधा है ।
  • खेतों में उगने वाला हानिकारक पौधा है ।
  • किसी भू - प्रबन्ध में गैर आमंत्रित पौधा है ।


खरपतवार की परिभाषा | defination of kharpatwar in hindi


विद्वानों ने खरपतवार को निम्न प्रकार से परिभाषित किया है -

  • डॉ० बील (Dr. Beel) के कथनानुसार - “खरपतवार वह पौधा है जो अनचाहे स्थान पर उगता है ।"
  • पीटर (Peter) के कथनानुसार - “खरपतवार एक पौधा है जिसमें अच्छाई की अपेक्षा हानि पहुँचाने की अधिक सामर्थ्य होती है ।”
  • राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (National Academy of Science) के अनुसार - “खरपतवार ऐसे पौधे है जो ऐसे स्थान पर उस समय उगते हैं जहाँ मनुष्य दूसरे किस्म के पौधे उगाना चाहता है अथवा कोई पौधा ही नहीं चाहता है ।"


खरपतवार किसे कहते है | kharpatwar kise kehte hain

सामान्यत: जब कोई पौधा किसी स्थान पर बिना बोए अपने आप ही उग जाता है तो वह खरपतवार (kharpatwar) कहा जाता है ।

परंतु कोई पौधा तब तक खरपतवार नहीं होता जब तक वह हमारे सामान्य उद्देश्य को प्रभावित न कर रहा हो अथवा हमें हानि न पहुँचा रहा हो ।

जैसे - दूब घास जब चने के खेत में उग आया हो तो यह खरपतवार है ।

किन्तु लान, चरागाह, जलस्रोत की मेढ़ों पर इसे खरपतवार (kharpatwar) नहीं माना जाता वरन् प्रयास करके उगाया जाता है ।

खरपतवारों के प्रमुख उदाहरण -

  • गेहूं के प्रमुख खरपतवार - बथुआ, कृष्णनील, चटरी मटरी, गोगल व मुनमुना आदि ।
  • धान के प्रमुख खरपतवार - सांवा, कौंदो, मौथा व जंगली धान आदि ।

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Kharpatwar क्या है अर्थ, परिभाषा एवं खरपतवार नियंत्रण की प्रमुख विधियां
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खरपतवारों का वर्गीकरण | classification of kharpatwar in hindi


रबी के मौसम के प्रमुख खरपतवार -

बथुआ, कृष्णनील, चटरी - मटरी, गोगला, मुनमुना, हिरनखुरी, मौथा, सेंजी, प्याजी मंडूसी, जंगली जई व कंटीली आदि ।

खरीफ के मौसम के प्रमुख खरपतवार - 

सावां कोंदों मैथा, जंगली धान बानरा, सफेद मुर्ग, भंगदा, कनकवा, गुम्मा, हजारदाना, हुलहुल, बरू नूनिया, चौलाई व मकोय आदि ।


खरपतवार उपचार की प्रमुख प्रणालियां 


खेत में उगे हुये खरपतवारों को दो उद्देश्यों को लेकर नष्ट किया जाता है -

  • खरपतवारों का उन्मूलन ( Eradication of weeds )
  • खरपतवार नियन्त्रण ( Control of weeds )


1. खरपतवारों का उन्मूलन ( Eradication of weeds ) -

खेत में उगे हुए अवांछनीय पौटे को पूर्णत: या समूल नष्ट कर देना खरपतवार उन्मूलन कहलाता है ।

"किसी क्षेत्र से सजीव खरपतवारों के पौधों, पौधों के विभिन्न अंगों और बीजों को सम्पूर्ण रूप से समाप्त कर देना खरपतवार उन्मूलन (weed eradication in hindi) कहलाता है ।"

इस सम्बन्ध में यह महत्वपूर्ण है कि किसी विशेष जाति के खरपतवारों को परिस्थितियों के अनुसार पूर्ण रूप से समाप्त किया जा सकता है जबकि परिवर्तित परिस्थितियों में इन खरपतवारों की रोकथाम करना ही एकमात्र उपाय होता है ।

खरपतवार उन्मूलन का कार्य छोटे क्षेत्रों तक ही सीमित है । यदि नियन्त्रण हेतु क्षेत्र विस्तृत है तो उन्मूलन आसानी से नहीं किया जा सकता ।

उन्मूलन के कार्य हेतु खेत की निरंतर देखरेख की आवश्यकता रहती है । अतः यह एक खर्चीली विधि है ।


2. खरपतवार नियन्त्रण ( Control of weeds ) -

किसी फसल में उगे हुये खरपतवारों को इस सीमा तक कम कर देना कि उनका प्रतिकूल प्रभाव फसल के पौधों पर न पड़े और फसल की वृद्धि तथा अधिकतम उपज प्राप्त करने का उद्देश्य सफल हो सके खरपतवार नियन्त्रण कहलाता है ।


खरपतवार नियन्त्रण की विधियों को निम्न प्रकार विभाजित किया जा सकता है -

  • भौतिक अथवा यांत्रिक विधियाँ ( Physical or mechanical methods )
  • सस्य वैज्ञानिक विधियाँ या कृषण क्रियाएँ ( Agronomical methods or cultural practices )
  • जैविक विधियाँ ( Biological methods )
  • रासायनिक विधियाँ ( Chemical methods )

खरपतवारनाशी क्या है | weedicide in hindi

खरपतवारों के पौधों की वृद्धि को शिथिल करने या नष्ट करने के लिये प्रयोग किया जाने वाला रसायन खरपतवारनाशी कहलाता है ।


वरणात्मक खरपतवारनाशी क्या हैं | selective herbicide in hindi

फसलों से कुछ निश्चित खरपतवारों की जातियों को नष्ट करने के लिये जो रसायन प्रयोग में लाए जाते हैं , उनको वरणात्मक खरपतवारनाशी कहते हैं ।


अवरणात्मक खरपतवारनाशी किसे कहते है | non selective herbicide in hindi

खरपतवारों के पौधों की विभिन्न जातियों को नष्ट करने के प्रयोग किये जाने वाले रसायन । अवरणात्मक खरपतवारनाशी कहे जाते हैं ।

इन्हें प्रायः बेकार व बंजर भूमियों पर प्रयोग किया जाता है ।


वरणात्मक तथा अवरणात्मक खरपतवारनाशी में अन्तर | defference between selective and non selective herbicide


1. वरणात्मक खरपतवारनाशी ( Selective herbicide ) -

  • ये खरपतवारनाशी कुछ विशेष प्रकार के खरपतवारों पर ही अपना प्रभाव दिखाते हैं ।
  • ये फसल के पौधों को कोई नुकसान नहीं पहुँचाते । इनका प्रयोग प्रमुखतः कृषित क्षेत्रों में किया जाता है ।
  • इनकी क्रियाशीलता विभिन्न कारकों पर निर्भर करती है ।
  • इन खरपतवारनाशियों में ऐसा नहीं होता है ।
  • इस वर्ग में पौटेशियम सायनेट, नाइट्रोफेन, अमोनियम सल्फामेट, पैराकुआट व डाईकुआट आदि सम्पर्क खरपतवारनाशी सम्मिलित है ।


अवरणात्मक खरपतवारनाशी ( Non - selective herbicide ) -

  • ये खरपतवारनाशी सभी प्रकार के खरपवतारों को नष्ट करने के काम में आते हैं ।
  • ये फसल के पौधे को भी नष्ट कर देते है ।
  • ये खरपतवारनाशी अकृषित क्षेत्रों में प्रयोग किये जाते हैं ।
  • इनकी क्रियाशीलता का समय कुछ घंटों से कई वर्षों तक होता है ।
  • इस वर्ग के खरपतवारनाशी भूमि में प्रयोग करने पर मृदा निर्जीमीकरक कहलाते हैं ।
  • इस वर्ग में PCP पैराकुआट, डाईकुआट, weed oil व DNBP आदि सम्पर्क खरपतवारनाशी सम्मिलित हैं ।


स्पर्श खरपतवारनाशी किसे कहते है | contact herbicide in hindi

ऐसे रसायन जो पौधों के अंगों के या सम्पूर्ण पौधे के सम्पर्क में आते ही उन अंगों या सम्पूर्ण पौधे को नष्ट कर देते हैं स्पर्श खरपतवारनाशी कहे जाते हैं ।


जैव रसायन खरपतवारनाशी क्या है | bio - herbicide in hindi

ऐसा खरपतवारनाशी जो प्राकृतिक जीवाणुओं की सहायता से कृत्रिम रूप से तैयार किया जाता है जैव रसायन खरपतवारनाशी कहलाता है ।

उदाहरण - फफूंद ।


खरपतवार सूचकांक किसे कहते हैं | Define weed index in hindi

किसी खेत में खरपतवारों को नियन्त्रित करने से बढ़ी हुई उपज को खरपतवार रहित खेत की उपज के प्रतिशत के रुप में रखने पर प्राप्त उपज को खरपतवार सूचकांक कहते हैं ।

खरपतवार सूचकांक = x-y/x×100

यहाँ पर x = खरपतवार रहित खेत की उपज
            y = खरपतवार सहित खेत की उपज 

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प्रमुख खरपतवारों के वैज्ञानिक नाम, वृद्धि एवं नियंत्रण की विधियां

दूबघास, बथुआ, मौथा, गाजरघास एवं कांस जैसे खरपतवार प्राय: आज के समय में लगभग सभी फसलों में अत्याधिक देखने में मिलते है ।

आज हम दूबघास, बथुआ, मौथा, गाजरघास एवं कांस जैसे खरपतवारों के सामान्य/प्रचलित नाम, वैज्ञानिक नाम, वृद्धि का स्वभाव, प्रसारण, आर्थिक महत्व एवं नियंत्रण की विधियों के बारे में जानेंगे ।

बथुआ, मौथा, गाजरघास एवं कांस जैसे खरपतवारों के सामान्य/प्रचलित नाम, वैज्ञानिक नाम, वृद्धि का स्वभाव, प्रसारण, आर्थिक महत्व एवं नियंत्रण की विधियां
दूबघास, बथुआ, मौथा इत्यादि खरपतवारों के वैज्ञानिक नाम, वृद्धि एवं नियंत्रण की विधियां

निम्न खरपतवारों का वर्णन कीजिए?

  • दूबघास ( Burmuda Grass )
  • बथुआ ( Dog's Tooth Grass )
  • मौथा ( Nut Grass )
  • गाजरघास ( Congress Grass )
  • कांस ( Tigergrass )


1. दूबघास ( Burmuda Grass )

  • सामान्य नाम ( Local Name ) - दूबघास, हरियाली, हरी दूब ।
  • वैज्ञानिक नाम ( Scientific Name ) - Cynodon dactylon
  • कुल ( Family ) - ग्रेमिनी ( Gramineae )


वृद्धि का स्वभाव ( Habit of growth ) -

यह एक बहुवर्षीय खरपतवार है तथा एक बहुशाखीय झाडीनुमा पौधा है । यह प्रमुखतः अकृषिकृत जैसे सड़कों के किनारे व चटटनों के आस - पास पाया जाता है । कृषिकृत क्षेत्रों में भी यह बहुतायत से पाया जाता है और फसलों को नुकसान पहुंचाता है । खरीफ ऋतु की फसलों में उगने वाला यह एक प्रमुख खरपतवार है । यह गर्म व नर्म मौसम में अधिक वृद्धि करता है ।

प्रसारण ( Propagation ) -

इसका प्रसारण बीजों व भूमिगत तनों द्वारा होता है । यह एक चिरस्थायी प्रसारणशील घास है जिस पर पतली पत्तियाँ तथा शाखाओं पर कोमल पुष्प भी आते हैं ।

आर्थिक महत्व ( Economic impotance ) -

हरी दूब का प्रयोग बहुत सी औषधियाँ बनाने में किया जाता है । इससे नेत्र चिकित्सा, अजीर्णता, मधुमेह तथा हिचकी आदि रोगों के लिये औषधि तैयार की जाती है । मृदा क्षरण नियन्त्रण में यह खरपतवार अत्यन्त लाभकारी है व पशुओं के लिये चारे के रुप में भी इसका प्रयोग होता है । लॉन की सुन्दरता बढ़ाने के लिये इसकी कुछ जातियों को उगाया जाता है ।

नियन्त्रण की विधियाँ ( Methods of Control ) -

ग्रीष्मकालीन जुताई इस खरपवतार के नियन्त्रण के लिये बहुत लाभकारी सिद्ध हुई है । इस खरपतवार को विभिन्न रसायनों जैसे Dalopon TCA को 2-5 किग्रा./है० की दर से छिड़कने पर नियन्त्रित किया जा सकता है ।


2. बथुआ ( Dog's Tooth Grass )

  • सामान्य नाम ( Local Name ) - बथुआ ।
  • वैज्ञानिक नाम ( Scientific Name )  - Chenopoduim album
  • कुल ( Family ) - Chenopodiaceae


वृद्धि का स्वभाव ( Habit of growth ) -

यह एकवर्षीय खरपतवार है । यह सीधा वृद्धि करता है और इसकी ऊँचाई 60-70 सेमी. तक बढ़ती है । इसकी पत्तियाँ चौड़ी होती हैं तथा यह प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उगने की क्षमता रखता है । यह मुख्यत: रबी की फसलों जैसे गेहूँ, चना, जौ, मटर तथा आलू आदि में बहुत अधिक संख्या में उग जाता है । इन फसलों के अलावा सिंचाई की नालियों व कृषि प्रक्षेत्र के आस पास भी यह उगता पाया जाता है ।

प्रसारण ( Propagation ) -

इसका प्रसारण बीजों द्वारा होता है । इसके पौधे में बीज उत्पन्न करने की अद्भुत क्षमता पाई जाती है । यह एकवर्षीय पौधा होते हुये भी अपने जीवनकाल में 70,000 से भी अधिक बीज पैदा करता है ।

आर्थिक महत्व ( Economic Importance ) -

बथवे के पौधे की पत्तियों व अन्य भाग सब्जी के रूप में प्रयोग किया जाते हैं । दीर्घायु के लिये इसके साग का सेवन उपयोगी माना जाता है । इसमें एकेरीडोल नामक मुख्य तत्व पाया जाता है इसका उपयोग पेचिश (dysentery) जैसे असाध्य रोगों में भी किया जाता है ।

नियन्त्रण की विधियाँ ( Methods of Control ) -

ग्रीष्मकालीन मौसम में खेत की कई बार गहरी जुताई करनी चाहिये । फूल व बीज बनने की अवस्था से पूर्व खुरपी की सहायता से उखाड़कर इसको नष्ट कर देना चाहिये । इस खरपतवार को नष्ट करने के लिये 2, 4-D, MCPA, प्रोपाक्लोर, लिनयूरोन आदि का प्रयोग लाभकारी होता है ।

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3. मौथा ( Nut Grass )

  • सामान्य नाम ( Local Name ) - मौथा, मूथा ।
  • वैज्ञानिक नाम ( Scientific Name ) - Cyperus rotundus.
  • कुल ( Family ) - Cyperaceae


वृद्धि का स्वभाव ( Habit of growth ) -

यह एक बहुवर्षीय खरपतवार है । यह कृषिकृत एवं अकृषिकृत दोनों क्षेत्रा में उगता हुआ पाया जाता है । इसका पौधा प्रतिकूल परिस्थितियों में उगने की विशेष क्षमता रखता है । यह खरपतवार धान, जूट, मक्का जैसी फसलों को विशेषतः हानि करता है । भौगोलिक दृष्टि से यह हमारे देश में आंध्र प्रदेश, हरियाणा जैसे अनेक राज्यों में उगता हुआ पाया जाता है । इसके पत्ते लम्बे व पतले होते हैं तथा भूमिगत जड़ें कन्द से निकलती हैं ।

प्रसारण ( Propagation ) -

मौथे की जड़ो में कन्द पाये जाते हैं । इन कन्दों का जड़ो में जाल सा बिछा रहता है और ये नये पौधों को जन्म देते रहते हैं ।

आर्थिक महत्व ( Economic Impotance ) -

मौथे के ताजे कन्द के रस को अदरक के रस में शहद के साथ लेने से आमतिसार में लाभ होता है । इसकी जड़ को घिसकर घी में मिलाकर व्रण पर लगाने से लाभ होता है । इसके मूल कन्द के सेवन से पसीना व मूत्र आता है तथा मुख से लार गिरना बन्द हो जाता है । इसकी जड़ो से अगरबत्ती भी बनती है ।

नियन्त्रण की विधियाँ ( Methods of control ) -

ग्रीष्मकालीन मौसम में खेत की बार - बार गहरी जुताई इस पर नियन्त्रण के लिये लाभकारी होती है । लॉन इत्यादि में उगते हुये उस खरपतवार को मोवर (mouer) को बार - बार घुमाकर नियन्त्रित किया जाता है । फसल प्रबन्ध के रूप में हरी खाद जैसे सनई को उगाकर इस खरपतवार को नष्ट किया जा सकता है रसायनों द्वारा इसको नष्ट करने के लिये 2, 4-D; MCPA, EPTC, सीमाजीन, एट्राजीन, एमीट्रोल, पैराकुआट व डालापॉन प्रभावशाली सिद्ध हो चुके हैं ।


4. गाजर घास ( Congress Grass )

  • सामान्य नाम ( Local Name ) - गाजर घास, कांग्रेस घास ।
  • वैज्ञानिक नाम ( Scientific Name ) - Parthenium hysterphorus
  • कुल ( Family ) - कम्पोजीटी ( Compositae )


वृद्धि का स्वभाव ( Habit of growth ) -

यह एकवर्षीय खरपतवार है । इस खरपतवार को सड़कों के किनारों पर उगता हुआ पाया जाता है । यह खरपतवार आंध्रप्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में फैला हुआ मिलता है । इसका पौधा नम भूमि में उग जाता है । यह खरपतवार खरीफ के मौसम में अनेक फसलों के साथ जैसे मक्का, ज्वार, बाजरा, धान आलू आदि के साथ उगता हुआ पाया जाता है ।

प्रसारण ( Propagation ) -

इसका प्रसारण बीजों द्वारा होता है ।

नियन्त्रण की विधियाँ ( Methods of control ) -

सस्य क्रियाओं द्वारा इसका निदान संभव नहीं है । विभिन्न रसायनों का प्रयोग जैसे सीमाजीन, एट्राजीन, डाइयूरोन आदि इस खरपतवार को नष्ट करने में प्रभावकारी पाये गये हैं । 2,4-2 व पैराकुआट दोनों रसायनों का मिश्रण भी इस खरपतवार को सफलतापूर्वक नष्ट कर देता है ।


5. कांस ( Tigergrass )

  • सामान्य नाम ( Local Name ) - कांस, सरकन्डा ।
  • वैज्ञानिक नाम ( Scientific Name ) -  Saccharum spontaneum
  • कुल ( Family ) - ग्रेमिनी ( Gramineae )


वृद्धि का स्वभाव ( Habit of growth ) –

कांस एक बहुवर्षीय खरपतवार है । इसका पौधा लम्बा व सीधा बढ़ने वाला होता है । इसकी पत्तियाँ नुकीली एवं कठोर होती हैं । कांस की जड़े भूमि में 5-10 मी० की गहराई तक पहुँच जाती है व अधिक जल को धारण करने वाली होती हैं ।

प्रसारण ( Propagation ) -

कांस के पौधे का प्रसारण दो प्रकार से होता है -

  1. बीजों का प्रसारण ( Propagation through seeds )
  2. प्रकन्दों द्वारा प्रसारण ( Propagation through rhizomes )

आर्थिक महत्व ( Economic Importance ) -

  • कांस का प्रयोग चटाई व रस्सियाँ बनाने में होता है ।
  • इसका प्रयोग छप्पर बनाने में भी किया जाता है ।

नियंत्रण की विधियां ( Methods of control ) -

  • ग्रीष्मकाल में खेत की गहरी जुताई
  • हाथ से प्रकन्दों को इकट्ठा करना
  • खेत में हरी खाद का उगाना

  • डाइयूरोन (diuron) 10 किग्रा./है. की दर से ग्रीष्म ऋतु में प्रयोग करना उत्तम है । 

विभिन्न फसलों में लगने वाले खरपतवार एवं उनका नियन्त्रण

गेहूं, धान, मक्का, गन्ना एवं आलू इत्यादि फसलों में कई प्रकार के खरपतवार लगते है और विभिन्न विधियों द्वारा उन खरपतवारों का नियन्त्रण किया जाता है ।

फसलों में विभिन्न विधियों द्वारा खरपतवार नियन्त्रण (crop weeds and their control in hindi) का ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है । खरपतवारनाशियों के प्रयोग की दर एवं अन्य कृषण क्रियाओं को जलवायु एवं भूमि सम्बन्धी कारक प्रभावित करते हैं ।

अतः रासायनिक विधि एवं अन्य विधियों द्वारा खरपतवार नियन्त्रण (weed control in hindi) करने के लिये विशेष अनुभव की आवश्यकता होती है ।

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निम्नलिखित फसलों में लगने वाले खरपतवार एवं उनका नियन्त्रण की विधियां -

  • गेहूं ( Wheat )
  • धान ( Paddy )
  • मक्का ( Maize )
  • गन्ना ( Sugarcane )
  • आलू ( Patato )

1. गेहूं की फसल में लगने वाले खरपतवार एवं उनके नियन्त्रण की विधियां


गेहूँ की फसल में पाए जाने वाले प्रमुख खरपतवार -

मंडूसी, जंगली जई, दूबघास, बथुआ, प्याजी, हिरखुरी, कृष्णनील, मटरी, पोहली, सैंजी, मुनमुना तथा सत्यानाशी ।


गेहूं की फसल में लगने वाले खरपतवारों का नियन्त्रण -

गेहूँ की फसल में खरपतवारों के नियन्त्रण हेतू हाथ से उखाड़ना एक सामान्य विधि है परन्तु इसमें अधिक श्रम व धन की आवश्यकता होती है ।

अतः इसके स्थान पर रसायनों का प्रयोग सस्ता एवं प्रभावशाली सिद्ध हो चुका है ।

गेहूं की फसल में 2, 4-D व M C PA रसायनों का प्रयोग सफलतापूर्वक हो चुका है । गेहूँ की फसल में बुवाई के 25-30 दिन बाद इन रसायनों का प्रयोग करना चाहिये । 2, 4-D लवण खरपतवारनाशी (क्रियाशील तत्व) 2, 4-D एमाइन उचित है ।

गेहूँ की मामा (phalaris minor) व जंगली जई (avena fatua) को नियंत्रित करने के लिये Isoproturon (०75 किग्रा./है.) की दर से प्रयोग करना चाहिये ।


2. धान की फसल में लगने वाले खरपतवार एवं उनके नियन्त्रण की विधियां


धान की फसल में पाए जाने वाले प्रमुख खरपतवार -

जंगली धान, सावां मकड़ा, कौंदों, वानरा, दूबघास, सफेद मुर्ग भंगड़ा, कनकवा, जंगली जूट, जलकुम्भी तथा सांवक ।


धान की फसल में लगने वाले खरपतवारों का नियन्त्रण -

2, 4-D व M.C.PA धान की फसल में खरपतवारों को नष्ट करने के लिये प्रभावशाली पाये गये हैं । विभिन्नरसायनों के प्रयोग की दर व समय विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार अलग - अलग हैं व विभिन्न खरपतवारों के लिए भी रसायनों की मात्रा भिन्न - भिन्न होती है ।

धान फसल में 2, 4-D, MCPA, 2,45 -T आदि रसायनों का रोपाई (transplanting) के 30 दिन पश्चात 1-1(1/2 किग्रा०/है.) 500 मीटर जल में घोल बनाकर प्रयोग करना चाहिये उपरोक्त के अतिरिक्त TOKE - 25 बेसालीन, stam F - 34 आदि रसायनों का प्रयोग भी प्रभावकारी सिद्ध हो चुका है ।


3. मक्का की फसल में लगने वाले खरपतवार एवं उनके नियन्त्रण की विधियां


मक्का की फसल में पाये जाने वाले खरपतवार -

दूब, मकड़ा, सांवक, कौंदों मौथा, जंगली जूट, जामियाँ, लहसुआ, हजारदाना, सफेद मुर्ग जंगली पालक, बड़ी दुद्धी पथरचटा तथा कनकवा आदि ।


धान की फसल में लगने वाले खरपतवारों का नियन्त्रण -

अंकुरण से पूर्व, 2,4-D को सोडियम लवण लगभग 750 ग्राम/हैक्टर की दर से प्रयोग किया जाता है । इसके अतिरिक्त सीमाजीन अंकुरण से पूर्व 2 किग्रा०/है की दर से प्रयोग करने पर मौथा व दूब को नष्ट कर देता है ।

खुरपी की सहायता से अंकुरण के पश्चात् निराई गुड़ाई (hand weeding) करने से भी बहुत से खरपतवार नष्ट हो जाते हैं ।


4. गन्ना की फसल में लगने वाले खरपतवार एवं उनके नियन्त्रण की विधियां


गन्ने की फसल में पाये जाने वाले प्रमुख खरपतवार -

दूब, बर, सावंक, मकडा, कौदों, हिरनबुरी जंगली चौलाई लहसुआ धतूरा, सफेद मुर्ग हजारदाना, पत्थरचटा, जंगली पालक तथा कनकवा आदि ।


गन्ना की फसल में लगने वाले खरपतवारों का नियन्त्रण -

गन्ने के खेत में विभिन्न खरपतवारों को नष्ट करने के लिये फावड़े, खुरपी तथा कस्सी की सहायता से खुदाई व अन्य कृषण क्रियाएँ की जाती है ।

उपरोक्त क्रियाओं के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के रसायनों का प्रयोग जैसे 2, 4-D सीमाजीन, एट्राजीन, डालापान, पैराक्वाट व इनके मिश्रण प्रभावशाली तरीकों से खरपतवारों को नियंत्रित कर चुके हैं ।

2, 4-D (एमाइन, एस्टर एवं लवण) लगभग 750 ग्राम/है. (a.i) प्रयोग करते हैं । इसी तरह सीमाजीन 1.5 किग्रा./है . (a.i) की दर से प्रयोग किया जाता है ।

उपरोक्त रसायनों को 500 लीटर जल में घोल बनाकर मिट्टी चढ़ाने के बाद गन्ने की फसल में प्रयोग करना, अन्य अवस्थाओं की तुलना में अधिक लाभकारी रहता है ।


5. आलू की फसल में लगने वाले खरपतवार एवं उनके नियन्त्रण की विधियां


आलू की फसल में पाए जाने वाले प्रमुख खरपतवार -

बथुआ, प्याजी हिरनखुरी, पोहली, कृष्णनील, मौथा आदि ।


आलू की फसल में लगने वाले खरपतवारों का नियन्त्रण -

Metribuzin या Fluchloralin का 1 किग्रा./ है । (सक्रिय अवयव) की दर से प्रयोग बुवाई के पश्चात करना चाहिये । इसके प्रयोग के तुरन्त बाद खुरपी की सहायता से निराई - गुराई अवश्य करें ।

यह कार्य बुवाई के 40 दिन बाद करना चाहिये ।  

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