कैसे करें जौ की उन्नत खेती | jau ki kheti | barley in hindi | jau ki fasal

जौ का वानस्पतिक नाम (Botanical Name) - होर्डियम वलगेयर (Hordeum vulgare)


जौ का कुल (Family) - ग्रेमिनी (पोएसी)


जौ में गुणसूत्र संख्या - 2n = 14


गेहूं एवं धान के बाद भारत में जौ की खेती (jau ki kheti) एक मुख्य धान्य फसल के रूप में की जाती है ।


जौ (barley in hindi) एक कम खर्चीली एवं लाभदायक धान्य फसल है, जिसमे सबसे कम खर्च आता है ।


उत्तरी भारत में कम उर्वरता वाले खेतों में तथा असिंचित दशाओं में अथवा सीमित सिंचाई के साधनों की स्थिति में कृषक गेहूँ की तुलना में जौ की फसल (jau ki fasal) लेना अधिक लाभप्रद मानते हैं ।


कम उर्वर क्षेत्रों में उसरीली मृदाओं में एवं असिंचित दशाओं में जौ की खेती (jau ki kheti) सफलतापूर्वक की जा सकती है ।


जौ (barley in hindi) एक ठण्डे मौसम की फसल है ।


जौ की खेती का महत्व एवं उपयोग


जौ (barley in hindi) के दानों में प्रोटीन 12%, वसा 1.5%, कार्बोहाइड्रेट्स 70%, रेशा 1%, खनिज लवण 4% व शेष नमी पाई जाती है ।


मनुष्य जौ (barley in hindi) को विभिन्न प्रकार से उपयोग में लाता है जो निम्न प्रकार है -


  • जौ के दानों का प्रयोग दुधारू पशुओं व मुर्गियों के लिये उत्तम राशन के रूप में किया जाता है ।
  • जौ के सत्व (malted barley) का प्रयोग एल्कोहलिक पेय पदार्थ (alcoholic beverages) बनाने में किया जाता है ।
  • जौ स्वभाव से ठण्डी (cool) होती है अत: गर्मी के दिनों में इसका प्रयोग मनुष्य खाने के लिये भी करते हैं ।


जौ के माल्ट से आप क्या समझते हैं?


जौं के दानों को जल में भिगोकर अंकुरित कर लेते हैं और अंकुरित दानों का सत्व बना लिया जाता है । इसे जौ का माल्ट (Barley malt) कहा जाता है ।

अधिक आयु वाले पुराने सत्व (malt) अधिक गुणवान माने जाते हैं ।


इसका प्रयोग - बीयर एवं व्हिस्की (Beer and Whisky) बनाने में किया जाता है ।


माल्ट वाली जौ की विशेषतायें बताइये?


माल्ट बनाने के लिये प्रयोग किये जाने वाले जाँ के दाने सुनहरे पीले रंग के, एक समान आकार के, पूर्ण परिपक्व एवं रसदार, कोमल, कम प्रोटीन वाले तथा रोगरहित एवं ओजपूर्ण होने चाहिये ।


जौ का उत्पत्ति स्थान एवं इतिहास


प्राचीनकाल से जौ (barley in hindi) का पौधा जंगली अवस्था में विश्व के अनेक देशों में उगता हुआ पाया जाता रहा है लेकिन इसके उत्पत्ति स्थान के बारे में इतिहासकारों के भिन्न - भिन्न मत हैं ।


कुछ इतिहासकारों के मतानुसार जौ का जन्म स्थान चीन देश व उसके आस - पास का क्षेत्र है ।


जौ की खेती कहा प्रारंभ हुई थी?


कुछ अन्य इतिहासकारों के अनुसार भारत और दक्षिणी पूर्वी एशियाई देशों से जौ की उत्पत्ति हुई है तथा यहीं से जौ की खेती का प्रचार व प्रसार विश्व के अन्य देशों को हुआ है ।


जौ की खेती का भौगोलिक वितरण


जौ की फसल (jau ki fasal) विश्व में कुल लगभग 62 मिलियन हैक्टेयर पर उगाई जाने वाली एक धान्य फसल है ।


विश्व में जौ (barley in hindi) कुल उत्पादन लगभग 160 मिलियन टन प्रतिवर्ष है ।


विश्व के जौ उत्पादक प्रमुख देशों में रूस, कनाडा, चीन, भारत तथा स्पेन आदि हैं ।

विश्व में जौ की औसत उत्पादकता वर्तमान में लगभग 25 क्विटल/हैक्टेयर है ।


भारत में जौ का उत्पादन


भारत में जौं की खेती लगभग 0.7 मिलियन हैक्टेयर पर की जाती है और यहाँ जौं का कुल उत्पादन लगभग 1.5 मिलियन टन होता है ।


भारत में जो उत्पादक राज्यों में उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार और उत्तरांचल आदि प्रमुख हैं ।

भारत में जौं की औसत उत्पादकता लगभग 20 क्विटल/हैक्टेयर है ।


जौं का वानस्पतिक विवरण


जौं का वानस्पतिक नाम Hordeum vulgare है । यह Gramineae कुल से सम्बन्धित है । इसका पौधा एकवर्षीय होता है ।


इसके पौधे की ऊँचाई लगभग 80 सेमी. होती है तथा इसकी जड़ें भूमि में 1 मीटर की गहराई तक जाती है ।


कुछ जड़ें भूमि के ऊपरी सतह में भी फैली रहती हैं । इसके पौधे का तना लम्बा, बेलनाकार व गाँठों वाला होता है जिनसे पत्तियाँ निकलती हैं ।

इसकी पत्तियाँ गेहूँ की तुलना में कुछ बड़ी होती हैं । जौं के दानों पर तुड़ नहीं पाया जाता है ।


जौ का वर्गीकरण कीजिए?


जौ की बाली में दानों की पंक्तियों की जनन क्षमता के आधार पर जौं को दो पंक्तियों वाले, छ: पंक्तियों वाले तथा अनियमित पंक्तियों वाले तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है ।


जौं की खेती के लिए उचित जलवायु एवं भूमि


जौं मूलतः शीतोष्ण (cool and tropical) जलवायु की फसल है ।


फिर भी उपोष्ण एवं उष्ण (tropical and subtropical) क्षेत्रों में जौ की खेती (jau ki kheti) सफलतापूर्वक की जा सकती है ।


इसके पौधे की अच्छी वृद्धि एवं बढ़वार के लिये सर्द एवं आर्द्र मौसम उपयुक्त रहता है, जबकि इसके पकने के समय उष्ण मौसम एवं 28°C के लगभग तापमान अनुकूल रहता है ।

200 मिमी. तक वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में जौ की खेती (jau ki kheti) सफलतापूर्वक की जा सकती है ।


समुद्रतल से लेकर लगभग 4200 मीटर की ऊँचाई वाले क्षेत्रों में जौ की खेती की जा सकती है ।

उत्तरी भारत में जौ की फसल (jau ki fasal) रबी के मौसम में उगाई जाती है ।


जौं की खेती के लिये अधिक जलधारण क्षमता वाली मटियार दोमट, बलुई दोमट अथवा चिकनी दोमट मृदा सर्वाधिक उपयुक्त रहती है ।


इसके अतिरिक्त कम उर्वरता वाली भूमियों, ऊँची - नीची, हल्की लवणीय व उसरीली तथा कम सिंचाई की अवस्थाओं वाली भूमियों में भी यह सफलतापूर्वक उग जाती है लेकिन अम्लीय मृदायें इसकी खेती के लिये उपयुक्त नहीं होती हैं ।

खेत में जल निकास की उत्तम व्यवस्था तथा भूमि का pH मान 7 से 8 के लगभग होना चाहिये ।


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जौ की फसल (jau ki fasal) से अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने के लिये अपनाई जाने वाली सस्य - क्रियायें निम्न प्रकार है -

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जौं की खेती के लिए भूमि का चुनाव कैसे करें?


जौ की खेती (jau ki kheti) के लिये 7 से 8 pH वाली दोमट भूमि सर्वोत्तम मानी जाती है ।

इस भूमि की जलधारण क्षमता अन्य भृमियों की अपेक्षा अधिक होती है ।


जौ की फसल की खेती मटियार दोमट, बलुई दोमट या चिकनी दोमट भूमियों में भी की जा सकती है ।

जौ की खेती के लिये कम उर्वर, ऊँची - नीची, हल्की लवणीय व उसरीली तथा कम सिंचाई की सुविधाओं वाली भूमियों का चुनाव किया जा सकता है ।


अम्लीय भूमियों में जौ की खेती (jau ki kheti) लाभप्रद नहीं होती है ।

खेती के लिये चुनी गई भूमि में पर्याप्त जल निकास होना चाहिये ।


जौं की खेती के लिए भूमि की तैयारी कैसे की जाती है?


खरीफ की फसल की कटाई के पश्चात् खेत की एक गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिये ।


सामान्यत: बुवाई से पूर्व एक सिंचाई पलेवा के रूप में की जाती है ।


तत्पश्चात् 3 या 4 बार हैरे चलाकर खेत की मिट्टी बारीक एवं भुरभुरी बना ली जाती है ।

आवश्यकतानुसार पाटे का प्रयोग भी करना चाहिये ।


जौ की फसल में अपनाए जाने वाले फसल चक्र


जौं रबी के मौसम में उगाई जाने वाली फसल है ।


जौ की खेती (jau ki kheti) के साथ अपनाये जाने वाले फसल चक्र और गेहूँ की फसल के साथ अपनाये जाने वाले फसल चक्र एक समान ही हैं ।


खरीफ के मौसम में ज्वार, बाजरा व मक्का आदि फसलों के बाद रबी के मौसम में जौं की खेती की जा सकती है ।


जौ की फसल के साथ अपनाये जाने वाले प्रमुफसल चक्र निम्न प्रकार है -

  • मक्का - जौं ( एकवर्षीय )
  • ज्वार - जौं ( एकवर्षीय )
  • मूंगफली - जौं ( एकवर्षीय )


जौ की खेती के साथ मिलवां खेती


रबी के मौसम में उगाई जाने वाली फसलों जैसे चना, मटर व सरसों आदि के साथ जौ की मिलवां खेती की जा सकती है ।


जैसे - जौं + चना, जौं + मटर तथा जौं + मसूर आदि ।


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जौ की खेती के लिए उन्नत किस्मों का चुनाव


1. असिंचित क्षेत्रों के लिये छिलके वाली जौ की उन्नत किस्में -

  • K - 141
  • K - 603
  • K - 329 (मंजुला)
  • K - 560 (हरीतिमा)
  • K - 215 (आजाद)
  • K - 125
  • K - 572 / 10 (ज्योति)
  • K - 572 / 11 (विजया)
  • K - 409 (प्रीति)
  • K - 287 (जागृति) व K - 226 (लखन) आदि ।


असिंचित क्षेत्रों के लिये छिलकारहित जौ की उन्नत किस्में -

  • K - 1149 (गीतांजलि)
  • DL - 88 व K - 551 (ऋतम्भरा) आदि ।


2. सिंचित क्षेत्रों के लिये छिलके वाली जौ की उन्नत किस्में -

  • K - 572 / 10 (ज्योति)
  • K - 572 / 11 (विजया)
  • K - 409 (प्रीति)
  • K - 287 (जागृति) व नरेन्द्र जी -2 आदि ।


सिंचित क्षेत्रों के लिये छिलकारहित जौ की उन्नत किस्में -

  • K - 508
  • K - 1149 (गीतांजल )


माल्ट (Malt) के लिये जौ की उन्नत किस्में -

  • K - 508, (प्रगति)
  • K - 551 (ऋतम्भरा)
  • अल्फा -93
  • DL - 88 व BSU - 73 (रेखा) आदि ।


जौ की खेती का समय


असिंचित क्षेत्रों में जौं की बुवाई का उदाहरण उपयुक्त समय 20 अक्टूबर से 10 नवम्बर तक है ।


सिंचित क्षेत्रों में 10 नवम्बर से 20 नवम्बर तक का समय उपयुक्त रहता है ।


विलम्ब से जौं की बुवाई 10 दिसम्बर से 20 दिसबर तक की जा सकती है ।


जौ की बीज दर कितनी होती है?


विभिन्न अवस्थाओं में जौ (barley in hindi) की बुवाई हेतु बीज की मात्रा का प्रयोग निम्न संस्तुति के आधार पर किया जाता है ।


  • असिंचित क्षेत्रों के लिये -100 किग्रा. / हैक्टेयर
  • सिंचित क्षेत्रों के लिये -75 किग्रा. / हैक्टेयर
  • विलम्ब से बुवाई के लिये -100 किग्रा. / हैक्टेयर ।


जौ में बीजोपचार


बुवाई से पूर्व बीज को 1% पारायुक्त रसायन की 3 ग्राम मात्रा प्रति किग्रा. बीज की दर से या वैनलेट या वाबिस्टीन रसायन की 2 ग्राम मात्रा प्रति किग्रा. बीज की दर उपचारित कर बीज की बुवाई करनी चाहिये ।


जौ की बुवाई की विधि


हल के पीछे कूण्डों में 23 सेमी० की दूरी पर बीज की बुवाई की जाती है ।

बुवाई की गहराई 5-6 सेमी० से अधिक नहीं होनी चाहिये ।


असिंचित क्षेत्रों में बुवाई की गहराई 6-8 सेमी. तक रखनी चाहिये ।

ऐसा करने से अंकुरण प्रतिशत में वृद्धि होती है ।


जौ की खेती के लिए आवश्यक खाद एवं उर्वरक की मात्रा


असिंचित क्षेत्रों में जौ की खेती (jau ki kheti) के लिये 50 किग्रा. नाइट्रोजन, 30 किग्रा. फास्फोरस तथा 30 किग्रा. पोटाश का प्रयोग प्रति हैक्टेयर की दर बुवाई के समय करना चाहिये ।


बुवाई के कार्य में पोरा (Pora) का प्रयोग लाभकारी रहता है ।

सिंचित अवस्था में पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ा देनी चाहिये ।


एक हैक्टेयर खेत में 80 किग्रा. नाइट्रोजन, 50 किग्रा. फास्फोरस तथा 50 किग्रा० पोटाश प्रति हैक्टेयर की दर से उर्वरकों द्वारा दी जानी चाहिये ।


फसल की पहली सिंचाई पर 20 किग्रा० शेष नाइट्रोजन उर्वरकों के रूप में खड़ी फसल में टाप ड्रैसिंग (Top dressing) के रूप में बिखेरकर प्रयोग करनी चाहिये ।

विलम्ब से जौ की बुवाई करने पर उर्वरकों की मात्रा 1.25 गुना बढ़ा देनी चाहिये ।


अच्छी उपज प्राप्त करने के लिये 30 क्विटल सड़ी हुई गोबर की खाद व 25 किंग्रा० गन्धक का प्रयोग प्रति हैक्टेयर की दर से करना चाहिये ।


अधिक नाइट्रोजन देने पर जौ की माल्ट की गुणवत्ता पर क्या प्रभाव पड़ता है?


जो के पौधों में आवश्यकता से अधिक नाइट्रोजन देने पर इसके दानों में प्रोटीन की मात्रा बढ़ जाती है ।

जिसके कारण इससे बनने वाले माल्ट की मात्रा व गुणवत्ता घट जाती है और इससे बनने वाली बीयर एवं मदिरा की गुणवत्ता भी गिर जाती है ।


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जौ की खेती के लिए आवश्यक सिंचाई


जौ की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिये दो सिंचाइयाँ पर्याप्त रहती है -


( i ) प्रथम सिंचाई -

कल्ले निकलते समय - 30-35 DAS


( ii ) द्वितीय सिंचाई -

दानों में दूध बनते समय - 70-80 DAS यदि केवल एक ही सिंचाई उपलब्ध है तो कल्ले फूटते समय (tillering stage) पर की जानी चाहिये ।


जौ की खेती में उगने वाले खरपतवार एवं उनका नियन्त्रण


जौ की फसल (jau ki fasal) में बथुआ, हिरनखुरी, प्याजी व कृष्णनील आदि चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार तथा गेहूँसा व जंगली जई आदि संकरी पत्ती वाले (या घास कुल के) खरपतवार पाये जाते हैं ।


इनकी रोकथाम हेतु - खुरपी द्वारा निराई करके 2, 4 - D 80% सोडियम लवण की 600 माम मात्रा का 1000 लीटर जल में घोल बनाकर प्रति हैक्टेयर की दर से बुवाई के एक माह बाद छिड़काव करना चाहिये ।


जौ की फसल सुरक्षा


जौ की फसल (jau ki fasal) में लगने वाली प्रमुख बीमारियों में आवृत कण्डुआ रोग, अनावृत कण्डुवा रोग, पत्ती का धारीदार रोग, धब्बेदार रोग व जौं का रतुआ आदि प्रमुख हैं ।


जिनका विवरण निम्न प्रकार है -


( i ) आवृत कण्डुवा रोग -

इस रोग के लक्षण वाले पौधों में बालियों में दानों के स्थान पर फफूंदी लग जाती है तथा दाने काले पड़ जाते हैं ।


इसकी रोकथाम हेतु - बीज को बुवाई के समय 2.5 ग्राम थायराम / किग्रा. बीज की दर से उपचारित करने हेतु प्रयोग कर बीज की बुवाई करनी चाहिये ।


( ii ) अनावृत कण्डुवा रोग -

इस रोग के लक्षण वाले पौधों में बालियाँ सफेद रंग की झिल्ली से ढकी रहती है और इसमें फफूंद (fungus) लगी रहती है । पौधों में नई बालियाँ प्रारम्भ से ही फफूंद वाली होती हैं । यह एक बीजजनित ( seed borned ) रोग है ।


इसकी रोकथाम के लिये - कार्बाक्सिन की 2.5 ग्राम मात्रा प्रति किग्रा. बीज की दर से उपचारित कर बीज की बुवाई करनी चाहिये ।


( iii ) जौ का रतुआ रोग -

इस बीमारी के लक्षण गेहूँ की फसल में लगने वाले इस बीमारी के लक्षणों के समान होते हैं ।


इसकी रोकथाम के लिये - रसायन जिंक मैग्नीज कार्बोनेट 75% चूर्ण दो किग्रा. / हैक्टेयर की दर से खेत में छिड़काव करना चाहिये ।


जौ की फसल में अंकुरण से कटाई तक की अवस्थाएं


जौं के पौधे में अंकुरण से कटाई तक निम्नलिखि वृद्धि अवस्थायें पाई जाती हैं -

  • अंकुरण अवस्था ( Germination Stage ) - 18-22 DAS
  • कल्ले फूटने की अवस्था ( Tillering Stage ) -25-30 DAS
  • गाँठे बनने की अवस्था ( Jointing Stage ) -50-60 DAS
  • बाली निकलने की अवस्था ( Panicle Initiation Stage ) -70-80 DAS
  • दुग्धावस्था ( Milking Stage ) -80-85 DAS
  • परिपक्व अवस्था ( Maturing Stage ) -85-95 DAS


जौं की खेती से प्राप्त उप


जौ की फसल (jau ki fasal) से 30-35 क्विटल / हैक्टेयर तक उपज प्राप्त हो जाती है ।


जौ (barley in hindi) में भूसे व दाने की मात्रा लगभग बराबर होती है ।


भण्डारण के लिये जौं के दानों को 12% से कम नमी तक सुखा लेना चाहिये ।


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