ग्रीष्मकालीन मौसम में मूंग की खेती अधिक लाभदायक क्यों होती है स्पष्ट कीजिए?

भारत की दलहनी फसलों में मूंग का महत्वपूर्ण स्थान है अर्थात् मूंग की खेती (mung ki kheti) भारत के लगभग सभी राज्यों में की जाती है ।

वैसे तो, मूंग की फसल (mung ki fasal) लगभग तीनों मौसम जैसे - बसंत कालीन, वर्षा कालीन एवं ग्रीष्म कालीन आदि में उगाई जाती है ।

परंतु ग्रीष्मकालीन मौसम में मूंग की खेती (garmiyon mein mung ki kheti) करने से अधिक लाभ प्राप्त होता है ।


ग्रीष्मकालीन या गर्मी के मौसम में मूंग की खेती | garmiyon mein mung ki kheti


मूंग की खेती उत्तर भारत में प्राय: खरीफ के मौसम में की जाती है ।

वर्षा ऋतु होने के कारण पीला मोजेक रोग (yellow mosaic disease) इस फसल को अधिक मात्रा में क्षतिग्रस्त करता है ।

अत: मूंग की खेती ग्रीष्मकालीन (जायद) के मौसम (garmiyon mein mung ki kheti) में करने से भी अच्छी उपज मिलती है ।

मूंग की फसल कम अवधि में पकने के कारण रबी की फसलों जैसे गेहूं आदि के बाद कम से कम कृषि क्रियाओं कर रिले क्रॉपिंग (relay cropping) के फसल चक्र में सम्मिलित की जा सकती है और इससे अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है ।

साथ ही साथ भूमि की उर्वरा शक्ति भी बढ़ाई जा सकती है ।


ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती अपेक्षाकृत क्यों लाभदायक है स्पष्ट कीजिये?

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ग्रीष्मकालीन मौसम में मूंग की खेती अधिक लाभदायक क्यों होती है (garmiyon mein mung ki kheti)

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ग्रीष्मकालीन मौसम में अधिक लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से मूंग की खेती की जाती है -


वर्तमान समय में सिंचाई की सुविधायें उनकी उपलब्धता के बढ़ जाने से कृषक रिले क्रापिंग फसल चक्र में मूंग को सम्मिलित कर अतिरिक्त आय अर्जित कर सकता है ।

उन्नत कृषि तकनीक व कम समय में पकने वाली जातियों की उपलब्धता से यह कार्य सरलतापूर्वक किया जा सकता है ।

मूंग की फसल (mung ki fasal) उगाने से भूमि में 20-30 किग्रा. नाइट्रोजन प्रति हैक्टेयर की वृद्धि होती है ।

हरी खाद के रूप में इस फसल द्वारा भूमि के भौतिक, रासायनिक व जैविक गुणों में सुधार होता है ।

साथ ही साथ कीटों व रोगो का प्रभाव कम होने लगता है ।

मूंग की फसल की उपज 15-20 क्विटल/हैक्टेयर तक प्राप्त की जा सकती है ।

मूंग का बाजार भाव इसके चिकित्सा सम्बन्धी उपयोग के कारण अधिक होने से कृषक इससे अधिक आय अर्जित कर सकते हैं ।


ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती के लिए प्रमुख किस्मों के नाम, पकने की अवधि एवं उनकी उपज


किस्म का नाम > पकने की अवधि > उपज (Q/ha)

  • नरेंद्र मूंग-1 > 65-70 दिन > 12-15 उपज (Q/ha)
  • PDN-54 > 70-75 दिन > 10-12 उपज (Q/ha)
  • पन्त मूंग-4 > 65-70 दिन > 12-15 उपज (Q/ha)
  • PS-16 > 60-65 दिन > 10-12 उपज (Q/ha)
  • पन्त मूंग-2 > 60-65 दिन > 10-12 उपज (Q/ha)
  • मोहिनी (S8) > 70-75 दिन > 10-12 उपज (Q/ha)
  • K-851 > 60-65 दिन > 10-12 उपज (Q/ha)
  • RMG-62 > 60-65 दिन > 10-12 उपज (Q/ha)
  • पूसा बैसाखी > 60-65 दिन > 10 उपज (Q/ha)
  • वर्षा > 55-60 दिन > 10 उपज (Q/ha)
  • सुनैना > 60 दिन > 12-15 उपज (Q/ha)
  • G-15 > 65 दिन > 12-15 उपज (Q/ha)


ग्रीष्मकालीन मूंग की बुवाई से कटाई तक की अवस्थाएं कौन-कौन सी होती है?


मूंग की बुवाई से कटाई तक की विभिन्न अवस्थायें निम्न प्रकार हैं -

  • बीजांकुर अवस्था ( Seedling emergence stage ) -1 से 10 DAS
  • तीव्र वृद्धि अवस्था ( Fast growth stage ) -15 से 25 DAS
  • पत्तियाँ बनने की अवस्था ( Leaf formation stage ) -25 से 30 DAS
  • फूल आने की अवस्था ( Flowering stage ) -40 से 45 DAS
  • फलियाँ बनने की अवस्था ( Podd formation stage ) -45 से 70 DAS
  • पकने की अवस्था ( Maturing stage ) -80 से 90 DAS


ग्रीष्मकालीन मूंग में लगने वाली प्रमुख बीमारियां एवं उनका नियंत्रण कैसे करते है?


ग्रीष्मकालीन मूंग की विभिन्न अवस्थाओं में लगने वाली बीमारियों का विवरण निम्न प्रकार है -


( 1 ) बीज विगलन ( Seed rot ) -

यह एक बीजजनित बीमारी है । इसमें बीज तथा बीजांकुर गलकर सड़ जाता है ।

इसके नियन्त्रण हेतु - बीज का थायराम से उपचार करना चाहिये ।


( 2 ) पीला मोजेक व पत्ती का मुड़ना ( Yellow mosaic and leaf curl ) -

यह एक विषाणु रोग है जो सफेद मक्खियों द्वारा फैलता है ।

इसके नियन्त्रण के लिये - मोनो - क्रोटोफोस की एक मिली, मात्रा एक ली. जल की दर से प्रयोग करनी चाहिये ।


( 3 ) सर्कोस्पोरा पत्ती धब्बे ( Sercospora leaf spot ) -

इस रोग में पत्तियों के ऊपर धब्बे पड़ जाते हैं ।

इस पर नियन्त्रण के लिये - इन्डोफिल M - 45 की दो कि. मात्रा 1000 ली. पानी में मिलाकर एक है० खेत में प्रयोग करनी चाहिये ।


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