मसूर की खेती (masur ki kheti) कैसे करें? | masur ki daal ki kheti

मसूर का वानस्पतिक नाम (Botanical Name) - लेन्स एस्कुलेन्टा (Lens esculenta)

मसूर का कुल (Family) - लेग्यूमिनेसी (Laguminoceae)


विश्व में उगाई जाने वाली दलहनी फसलों में मसूर की खेती (masur ki kheti) का विशेष महत्व है ।

वर्षा आधारित एवं असिंचित क्षेत्रों में मसूर की खेती (masur ki daal ki kheti) एक उपयुक्त फसल है ।

भूमि सतह पर फैलकर चलने के कारण मसूर की फसल (masur ki fasal) मृदा संरक्षण का कार्य भी करती है ।


मसूर का उपयोग


मसूर का उपयोग मुख्य रूप से दाल के रूप में किया जाता है ।

मसूर की दाल (masur ki daal) के दानों में प्रोटीन 24%, वसा 1%, कार्बोहाइड्रेट्स 58%, खनिज लवण 2%, रेशे 1% व शेष जल पाया जाता है ।

मसूर एक प्रोटीनयुक्त एवं पोषक फसल के रूप में जानी जाती है ।

शाकाहारी मनुष्य के लिए भोजन में मसूर की दाल (masur ki daal) प्रोटीन का एक मुख्य स्रोत मानी जाती है ।


मसूर का उत्पत्ति स्थान एवं इतिहास


भारतवर्ष तथा इसके आस - पास के देशों में मसूर की खेती (masur ki kheti) प्राचीनकाल से होती चली आ रही है ।

यहीं से इसका प्रचार व प्रसार विश्व के अन्य देशों को हुआ ।

अतःएशिया को ही मसूर की फसल का मूल स्थान माना जाता है ।


मसूर का भगोलिक विवरण


सम्पूर्ण विश्व में मसूर की खेती (masur ki kheti) लगभग 36 लाख हैक्टेयर क्षेत्रफल पर की जाती है तथा इसका विश्व में कुल उत्पादन लगभग 30 लाख टन है ।

मसूर की खेती प्रमुख रूप से एशियाई देशों में की जाती है । इनमें भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश व म्यांमार आदि हैं ।

वर्तमान समय में विश्व में मसूर की औसत उत्पादकता लगभग 800 किग्रा./हैक्टेयर है ।


भारत में मसूर की खेती का उत्पादन


भारत में मसूर की खेती लगभग 14 लाख हैक्टेयर पर की जाती है और इसका कुल उत्पादन लगभग 9 लाख टन है ।

यहाँ पर इसकी औसत उत्पादकता लगभग 620 किग्रा. / हैक्टेयर है तथा मसूर की खेती (masur ki kheti) करने वाले प्रमुख राज्यों में मध्य - प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिमी बंगाल आदि है ।

भारत के प्रत्येक राज्य में मसूर की खेती छोटे क्षेत्रफलों में अवश्य की जाती है ।


मसूर का वानस्पतिक विवरण


मसूर का वानस्पतिक नाम Lens esculenta है । मसूर का परिवार Leguminoceae है ।

इसका पौधा झाड़ीनुमा व शाकीय तथा लगभग 60 सेमी. ऊँचाई वाला होता है ।

इसकी मुख्य जड़ मूसला होती है तथा जड़ों पर नाइट्रोजन एकत्रित करने वाली गाँठे पाई जाती हैं ।

इसका पौधा हरा व फूल गुलाबी व सफेद तथा दानें गुलाबी रंग के होते हैं ।


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मसूर की फसल (masur ki fasal) से अधिक उपज प्राप्त करने के लिये निम्न सस्य - क्रियाओं को अपनाना चाहिये -


मसूर की खेती के लिए उचित जलवायु


भारतवर्ष में रबी के मौसम में मसूर की खेती (masur ki kheti) की जाती है ।

मसूर मूल रूप से एक शरद् जलवायु की फसल है ।

चने की तुलना में मसूर वातावरण की प्रतिकूल परिस्थितियों के प्रति अधिक सहनशील होती है ।

सामान्यत: ठण्डे मौसम और 15-25°C तापमान रहने पर इसके पौधों की वृद्धि अच्छी होती है तथा अधिक सर्दी व अधिक गर्मी और वर्षा आदि का इसकी फसल पर अंकुरण से कटाई तक कम प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ।


मसूर की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी


मसूर की खेती (masur ki kheti) विभिन्न प्रकार की भूमियों में की जा सकती है । 

भारतवर्ष में बलुई दोमट से लेकर चिकनी दोमट तक सभी प्रकार की भूमियों में मसूर की खेती की जाती है ।

भूमि में जल निकास की उचित व्यवस्था होनी आवश्यक है ।

सामान्य pH वाली भूमियाँ मसूर की खेती (masur ki kheti) के लिये अधिक उपयुक्त रहती है ।


मसूर की खेती के लिए भूमि की तैयारी कैसे करें?


खरीफ की फसल की कटाई के पश्चात् एक गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से व दो - तीन जुताइयाँ देशी हल से या 2-3 बार हैरो चलाकर खेत बुवाई के लिये तैयार किया जाता है ।

ऐसा करने से खेत की मिट्टी भुरभुरी हो जाती है ।


मसूर की खेती के लिए उपयुक्त जाति का चुनाव


मसूर की खेती (masur ki kheti) के लिये सर्वप्रथम क्षेत्र की जलवायु एवं भूमि सम्बन्धी आवश्यकताओं तथा बीज की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुये निम्न जातियों में से उसकी एक उपयुक्त जाति का चुनाव किया जाता है ।


मसूर की प्रमुख किस्में -


( i ) बड़े दाने वाली मसूर की किस्में -

  • प्रिया (DPL - 15)
  • मसूर -4076
  • शेरी (DPL - 62)
  • नूरी (IPL - 81)
  • मल्लिका (K - 75)
  • पूसा वैभव
  • नरेन्द्र मसूर -1 व पन्त मसूर -5 आदि ।


( ii ) छोटे दाने वाली मसूर की किस्में -

  • पन्त मसूर - 4
  • पन्त मसूर - 406
  • पन्त मसूर - 639 आदि ।


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मसूर की खेती का समय - देरी से मसूर की बुवाई नवम्बर के अन्तिम सप्ताह से दिसम्बर के प्रथम सप्ताह तक कर देनी चाहिये, परन्तु इससे उपज में कुछ कमी आने की सम्भावना रहती है ।

मसूर की बुवाई का समय - मसूर की बुवाई 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर तक की जाती है ।

खरीफ में धान की देरी से कटाई होने पर मसूर की समय से बुवाई करने के लिये धान की खड़ी फसल में मसूर के बीज को छिटकवाँ विधि से बो दिया जाता है । इसे मसूर की उत्तर खेती (Outer cultivation) कहा जाता है ।


मसूर की बीज दर कितनी होती है?


मसूर की समय से बुवाई के लिये 45-55 किग्रा. बीज प्रति हैक्टेयर पर्याप्त रहता है ।

मसूर की खेती (masur ki kheti) और देरी से बुवाई करने पर 60-70 किग्रा० बीज हैक्टेयर तक प्रयोग करना चाहिये ।

मोटी दाने वाली किस्मों में बीज दर बढ़ा देनी चाहिये ।


मसूर के बीज का उपचार


मसूर के बीजों को फफूंदी आदि रोगों से बचाने के लिये किसी फफूंदीनाशक रसायन जैसे कैप्टॉफ 50W की 5 ग्राम मात्रा प्रति किग्रा० बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करनी चाहिये ।


मसूर की खेती में राइजोबियम कल्चर की प्रयोग विधि


मसूर के बीज को बुवाई से Y M M पूर्व राइजोबियम कल्चर से उपचारित कर बुवाई करनी चाहिये ।

इसके लिये 0-5 लीटर जल में 50 ग्राम गुड़ या चीनी का घोल बनाकर इसे 10 मिनट तक गर्म करके घोल को ठण्डा करना चाहिये ।

इसमें 250 ग्राम (एक पैकिट) राइजोबियम कल्चर को 25 किग्रा. बीज पर डालकर मिला लेते हैं और बीज को छाया में सुखाते हैं । 

तत्पश्चात् बुवाई की जाती है ।


मसूर की फसल की बुवाई की विधि


इसकी बुवाई छिटकवाँ या हल के पीछे कुण्डों में या सीडड्रिल द्वारा की जा सकती है ।

पंक्तियों में बुवाई करने पर फसल की उपज अधिक होती है ।


मसूर में अन्तरण एवं गहराई कितनी रखते है?


सामान्य अवस्था में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 20-25 सेमी० रखी जाती है ।

विलम्ब से बुवाई करने पर अन्तरण कम करके 15-20 सेमी. रखा जाता है ।

मसूर का बीज 5 सेमी. की गहराई पर बोया जाता है ।


मसूर की खेती के लिए आवश्यक खाद एवं उर्वरक की मात्रा


मसूर एक दलहनी फसल है ।

इसकी जड़ों में पाये जाने वाले राइजोबियम जीवाणु वायुमण्डल की नाइट्रोजन को संचित कर लेते हैं ।

इन जीवाणुओं की क्रियाशीलता बढ़ने तक नाइट्रोजन की आवश्यकता की पूर्ति हेतु 20 किग्रा. नाइट्रोजन प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करनी चाहिये ।

मृदा परीक्षण के पश्चात् फास्फोरस व पोटाश की मात्रा का निर्धारण करना चाहिये ।

परीक्षण सुविधा न होने पर 40 किग्रा. फास्फोरस व 30 किग्रा. पोटाश प्रति हैक्टेयर की दर से देने की संस्तुति की जाती है ।

उर्वरकों की पूर्ण मात्रा का प्रयोग बुवाई के समय करना चाहिये । 

गन्धक की 25 किग्रा. मात्रा प्रति हैक्टेयर इसी समय पर देनी चाहिये ।


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मसूर की खेती के लिए आवश्यक सिंचाई


मसूर के पौधों में दो सिंचाइयाँ देनी आवश्यक होती हैं ।

प्रथम फूल आने व द्वितीय फलियाँ बनते समय ।

मसूर एक असिंचित एवं शुष्क क्षेत्रों की फसल है ।

सर्दी के मौसम में यदि वर्षा हो जाये तो सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है ।

इस फसल के अंकुरण से कटाई तक किसी भी अवस्था में वर्षा इसके लिये लाभदायक ही रहती है ।


मसूर की खेती में लगने वाले खरपतवार एवं उनका नियन्त्रण


रबी के मौसम में उगने वाले खापत्रबार प्राय: मसूर के खेतों में भी उग आते हैं ।

इन पर नियन्त्रण के लिये - खुरपी या हो की सहायता से एक निराई करनी चाहिये ।

खरपतवारों की सघनता को देखते हुये रासायनिक विधि से भी नियन्त्रण किया जा सकता है ।

इसके लिये - फ्लूक्लोरालिन (a.i.) की एक किग्रा० मात्रा को 1000 लीटर पानी में मिलाकर बुवाई से पूर्व खेत में छिड़काव करना चाहिये ।


मसूर की फसल की सुरक्षा


इस फसल में लगने वाले प्रमुख रोग, कीट एवं उनका नियन्त्रण निम्न प्रकार है -


( i ) मसूर की खेती में लगने वाले कीट एवं उनका नियन्त्रण

मसूर के पौधों में हानि पहुँचाने वाले कीटों में माहू व फलीछेदक प्रमुख हैं ।

इनके नियन्त्रण के लिये - मेटासिस्टॉक्स रसायन की 250 मिली. मात्रा का 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिये ।

फलीछेदक के नियन्त्रण हेतु - असाटॉफ -75 SP की 1.5 ग्राम दवा 1 लीटर जल में घोलकर छिड़काव करना चाहिये ।


( ii ) मसूर की फसल में लगने वाले रोग एवं उनका नियन्त्रण

मसूर की फसल में लगने वाली प्रमुख बीमारियों में उकठा (wilt) रोग, किट्ट (rust) रोग तथा झुलसा (blight) रोग आदि हैं ।

उकठा रोग की रोकथाम हेतु - रोगरोधी जातियाँ जैसे पन्त मसूर -406 व पन्त मसूर -639 की बुवाई करनी चाहिये तथा बीजोपचार भी करना चाहिये ।

किट्ट रोग पर नियन्त्रण के लिये - रोगरोधी जातियाँ जैसे - मसूर -9, मसूर -10, मसूर -12, पन्त मसूर -406 आदि की बुवाई करनी चाहिये ।

इसके अतिरिक्त - मेनकोजेब रसायन की 0.2% मात्रा का घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिये ।

झुलसे हुये पौधों को उखाड़कर निकाल देना चाहिये व जला देना चाहिये ।


मसूर की फसल कितने दिन में तैयार हो जाती है?


मसूर की अक्टूबर माह में बोई गई फसल 135-145 में पककर तैयार हो जाती है ।


मसूर की फसल की कटाई व मड़ाई


फलियों के पूर्ण सूख जाने पर इनको बिखरने से पूर्व ही काट लेना चाहिये ।

मसूर की फसल की कटाई के 5 दिन बाद फसल सूखकर मड़ाई के योग्य हो जाती है ।

मड़ाई के बाद दानों को 12 % से कम नमी तक धूप में सुखाकर भण्डारित कर लेते हैं ।


मसूर की फसल से प्राप्त उपज


एक हैक्टेयर खेत से मसूर की फसल की 18-22 क्विटल उपज प्राप्त हो जाती है ।


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