भारत की प्रमुख दलहनी फसलें एवं उनका उत्पादन व महत्व लिखिए

हमारे देश भारत में दलहन वर्ग की प्रमुख फसलें अरहर, मूंग तथा उड़द है, जो खरीफ के मौसम में उगाई जाती है । भारत में कुल दालों का उत्पादन लगभग 16 मिलियन टन है ।

भारत में मुख्यतः दलहनी फसलों की खेती रबी एवं खरीफ के मौसम में की जाती है । भारत में अनाज के बाद दलहनी फसलों का महत्व (dalhani fasalo ka mahatv) एक महत्वपूर्ण स्थान रखताा हैै । 


दलहनी फसलें क्या है | dalhani fasale kya hain

ऐसी फसलें जिनके उत्पादन से मुख्य रूप से दाल प्राप्त होती है, उन्हें दलहनी फसलें कहते है ।

उदाहरण - उड़द, अरहर‌ एवं मसूर आदि ।

दलहनी फसलें से मुख्यत: दाल की प्राप्ति एवं इसकी हरी पत्तियों को सब्जी के रूप में प्रयोग किया जाता है । दलहनी फसलों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण का गुण होने के कारण वे मृदा उर्वरता को भी बढ़ती है । 

ऐसा उनकी जड़ों में पाये जाने वाली गांठों पर राइजोबियम जीवाणु के कारण होता है । राइजोबियम जीवाणुुु को सक्रिय करने के लिए दलहनी फसलों में बुवाई से पहले राइजोबियम कल्चर का प्रयोग किया जाता है ।


भारत की मुख्य दलहनी फसलों के नाम

भारत में दलहनी फसलों की खेती मुख्य रूप से दो ॠतुओं की जाती है ।

  1. खरीफ के मौसम में उगाई जाने वाली प्रमुख दलहनी फसलें - अरहर, मोठबीन, उड़द,सोयाबीन, ग्वार, लोबिया इत्यादि ।
  2. रबी के मौसम में उगाई जाने वाली प्रमुख दलहनी फसलें - चना, मसूर, मटर, राजमा, खेसारी इत्यादि ।


भारत में उगाई जाने वाली प्रमुख दलहनी फसलों का उत्पादन

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भारत की प्रमुख दलहनी फसलें एवं उनका महत्व


खरीफ के मौसम में उगाये जाने वाली मुख्य दलहनी फसलों के वैज्ञानिक नाम 

खरीफ की फसलों की बुवाई जून से जुलाई तक की जाती है । यह फसलें सितम्बर - अक्टूबर माह में पककर कटाई के लिये तैयार हो जाती हैं ।

खरीफ के मौसम में उगाये जाने वाली प्रमुख दलहनी फसलों के सामान्य, अंग्रेजी व वैज्ञानिक नाम निम्न प्रकार हैं -

  • अरहर (Red gram) - Cajanus cajan L.
  • मूंग (Green gram) - Vigna radiata L.
  • उर्द (Black gram) - Vigna mungo L.
  • सोयाबीन (Soybean) - Glycine max L.
  • ग्वार (Clusterbean) - Cyamopsis tetragonoloba L.
  • लोबिया (Cow - pea) - Vigna sinensis L.
  • मोठबीन (Kidneybean) - Vigna aconifolia J.


रबी के मौसम में उगाई जाने वाली प्रमुख दलहनी फसलों के वैज्ञानिक नाम 

रबी की फसलों की बुवाई अक्टूबर के अन्तिम पखवाड़े से नवम्बर के प्रथम पखवाड़े तक की जाती है । यह फसलें मार्च - अप्रैल तक पककर कटाई के लिये तैयार हो जाती है । 

रबी के मौसम में उगाई जाने वाली दलहनी फसलों के सामान्य, अंग्रेजी व वैज्ञानिक नाम निम्नलिखित हैं -

  • चना (Chick - pea or Gram) - Cicer arietinum 
  • मसूर (Lentil) - Lens culineries 
  • मटर (Pea) - Pisum sativum 
  • राजमा (Rajmash) - Phaseolus vulgaris 
  • खेसारी (Lathyrus) - Lathyrus sativus

दलहनी फसलों का क्या महत्व है?

भारत में उन्नत कृषि क्रियाओं को अपनाकर 
दलहनी फसलों का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है । कम अवधि में पकने वह अधिक उपज देने वाली दलहन फसलों की बुवाई अधिक से अधिक क्षेत्रफल में करनी चाहिए ।

ऐसा करने से इन दलहनी फसलों को बहू फसली कार्यक्रमों में सम्मिलित किया जा सकता है ।


दलहनी फसलों का महत्व है -

  • प्रोटीन का मुख्य स्रोत
  • हरे चारे की पूर्ति
  • ईंधन व अन्य उपयोग
  • नाइट्रोजन स्थिरीकरण
  • कम उर्वर भूमि में उगना
  • मृदा और उर्वरकता में वृद्धि
  • कम अवधि की फसलें
  • मिश्रित खेती
  • कम जालमांग
  • भूमि संरक्षण का कार्य

इसके अतिरिक्त पादप सुरक्षा के अंतर्गत बीज से फसलों की वृद्धि तक विभिन्न रसायनों का प्रयोग अवश्य ही करना चाहिए । बुवाई से पहले राइजोबियम कल्चर में फास्फोरस का भूमि में प्रयोग करने से उपज में वृद्धि होती है । 

इसके अतिरिक्त अन्य सदस्य क्रियाएं जैसे पंक्तिबद्ध बुवाई, खरपतवार नियंत्रण हेतु रसायनों का प्रयोग तथा उपयुक्त समय पर फसलों की कटाई कर लेना लाभकारी रहता है । यहाँ मनुष्यों द्वारा दलहनी फसलों को विभिन्न प्रकार से उपयोग में लाया जाता है ।


भारत में दलहनी फसलों का महत्व निम्न प्रकार है -

1. प्रोटीन का मुख्य स्रोत - 

शाकाहारी व्यक्तियों के लिये भोजन में दालें प्रोटीन का एक स्रोत हैं । सभी दालों जैसे अरहर, मूंग, उड़द, मसूर, चना तथा सोयाबीन आदि में प्रोटीन की मात्रा लगभग 20 से 42% तक होती है जिसके कारण भोजन में धान्य फसलों जैसे गेहूँ, बाजरा, मक्का तथा चावल आदि के साथ - साथ प्रोटीन की पूर्ति के लिये दालों का समावेश स्वास्थ्य के लिये लाभकारी रहता है ।

 

2. हरे चारे की पूर्ति - 

दलहन वर्ग की फसलों से पशुओं के लिये हरे की पूर्ति होती है । साथ ही साथ इनका राशन भी दुधारू पशुओं के लिये एक उत्तम आहार होता है ।


3. ईंधन व अन्य उपयोग -

दलहनी फसलों जैसे अरहर के सूखे पौधे का उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों में ईधन के रूप में किया जाता है । इसके अतिरिक्त शरदकालीन मौसम में छप्पर व झोंपड़ी आदि बनाने में भी इसका उपयोग किया जाता है ।


4. नाइट्रोजन स्थिरीकरण - 

दलहन वर्ग की सभी फसलों की जड़ों में नाइट्रोजन स्थिर करने वाले जीवाणु पाये जाते है । राइजोबियम कल्चर के प्रयोग से ये जीवाणु सक्रिय हो जाते हैं जिससे फसल के पौधों की जड़ों में वायुमण्डल की नाइट्रोजन स्थिर हो जाती है और कृषक को अतिरिक्त नाइट्रोजन देने की आवश्यकता नहीं पड़ती है । एक हैक्टेयर खेत में दलहनी फसलें 30-50 किग्रा० तक नाइट्रोजन स्थिर कर देती है । इसके अतिरिक्त दलहनी फसलों के पौधे भूमि में दबा दिये जाने पर हरी खाद के रूप में कार्य करते हैं । इनके उगाने से 10 क्विटल/है । जीवांश पदार्थ की मात्रा की भूमि में वृद्धि होती है । अतः दलहनी फसलों को उगाने से भूमि की उर्वरा शक्ति में वृद्धि होती है ।


5. कम उर्वर भूमि में उगना - 

दलहनी फसलों में बेकार पड़ी भूमियों में भी उगने की क्षमता पाई जाती है ।


6. मृदा और उर्वरकता में वृद्धि - 

दलहनी फसलों के पकने की अवधि अन्य फसलों की तुलना में कम होने के कारण इन्हें बहुफसली कार्यक्रम में सम्मिलित किया जा सकता है ।

उदाहरण - मक्का आलू - गेहूँ - मूंग । इस फसलचक्र में मूंग एक दलहनी फसल है ।


7. कम अवधि की फसलें - 

चूंकि दलहन वर्ग की फसलें कम समय में पक जाती हैं अतः इनके वृद्धि एवं विकास के लिये कम जल की आवश्यकता होती है ।

उदाहरण - मूंग जैसी फसलों के लिये गेहूँ की खड़ी फसल की सिंचाई कर उसे मूंग की बुवाई में उपयोग कर पलेवा की आवश्यकता नहीं रह जाती है । इसी कारण से बसन्त एवं ग्रीष्मकालीन ऋतुओं में भी दलहनी फसलों की खेती लाभकारी रहती है ।


8. मिश्रित खेती - 

दलहनी फसलों को अन्य धान्य फसलों के साथ मिश्रित खेती के रूप में उगाया जा सकता है । कभी - कभी मुख्य फसल के असफल हो जाने पर दलहनी फसल से अच्छी उपज प्राप्त हो जाती है । अतः मिलवां खेती के रूप में आर्थिक लाभ हेतु दलहनी फसलें उगाई जानी चाहिये ।

उदाहरण - मक्का + उड़द , गेहूँ + चना आदि ।


9. कम जालमांग - 

दलहनी फसलें कम अवधि की होने के कारण इनके पौधे तेजी से वानस्पतिक वृद्धि करते हैं । अतः इन फसलों के प्रारम्भ में एक निराई करने से खरपतवारों को रोका जा सकता है । तत्पश्चात् फसल स्वतः ही उगने वाले खरपतवारों को दबा देती है ।


10. भूमि संरक्षण का कार्य - 

दलहनी फसलें अधिकतर भूमि पर फैलकर चलती हैं । अतः ये भूमि की सतह को ढकने का कार्य करती हैं । इससे वर्षा के समय भूमि संरक्षण का कार्य होता है । कुछ दलहनी फसलें खेत के चारों ओर बाये जाने पर वायु अवरोधक के रूप में भी उपयोग में लाई जाती हैं ।


भारत में दलहनी फसलों का उत्पादन कम क्यों है इसे बढ़ाने के क्या उपाय है

भारत में दलहनी फसलों की खेती का एक विशेष महत्व है, हमारे देश में दालों का कुल उत्पादन लगभग 16 मिलियन टन है । देश में दलहनी फसलों की खेती में उड़द, चना, मसूर, अरहर आदि प्रमुख फसलें हैं ।

भोजन में दालों का प्रयोग करने वाले उपभोक्ताओं की संख्या में भारी वृद्धि हुई है, परन्तु दलहनों का उत्पादन कम होने के कारण उपभोक्ताओं की माँग की पूर्ति नहीं करता है ।


दलहनी फसलों के उत्पादन कम होने के प्रमुख कारण -

  • दोषपूर्ण सस्य प्रबन्ध क्रियाएं
  • आर्थिक कारण व समस्याएं
  • प्रबंधकीय कारण
  • सही किस्मों का चुनाव न करना
  • राइजोबियम कल्चर व उर्वरको का प्रयोग न करना
  • तकनीकी कारण
  • खरपतवार नियंत्रण पादप सुरक्षा एवं
  • अन्य वातावरणीय कारण आदि ।

इसके अतिरिक्त भारत में दलहनी फसलों के उत्पादन कम होने के अन्य कारण भी हो सकते हैं । इनमें सबसे प्रमुख कारण दोषपूर्ण सस्य प्रबन्ध है ।


भारत में दलहनी फसलों का उत्पादन कम क्यों है?

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भारत में दलहन उत्पादन (dalhan production in india)

दलहनी फसलों का उत्पादन कम होने का प्रमुख कारण -

दोषपूर्ण सस्य प्रबन्ध क्रियाएं -

सस्य प्रबन्ध क्रियाओं में कम अवधि की व अधिक उपज देने वाली जातियों की कमी, उच्च गुणवत्ता युक्त बीज का न मिलना, बुवाई की उपयुक्त विधि न अपनाना, बीज का कम मात्रा में प्रयोग, असमय बुवाई, अपर्याप्त कृषण क्रियायें, सिंचाई जल की कमी, अपर्याप्त फास्फोरस का प्रयोग, कल्चर का प्रयोग न करना व पादप सुरक्षा में कमी आदि सम्मिलित हैं ।

अनुसन्धान कार्य उच्च स्तर का न होना, अपर्याप्त कृषि प्रसार व प्रशिक्षण कार्यक्रम, सामाजिक व आर्थिक कारणों के अतिरिक्त प्रतिकूल मौसम में इन फसलों को उगाये जाने के कारण इनकी उत्पादकता कम ही रहती है । उन्नत कृषि क्रियाओं को अपनाकर दलहनी फसलों का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है । कम अवधि में पकने व अधिक उपज देने वाली दलहनी फसलों की बुवाई अधिक से अधिक क्षेत्रफल में करनी चाहिये ।

ऐसा करने से इन दलहनी फसलों को बहुफसली कार्यक्रमों में सम्मिलित किया जा सकता है । पादप सुरक्षा के अन्तर्गत बीज से फसलों की वृद्धि तक विभिन्न रसायनों का प्रयोग अवश्य ही करना चाहिये । बुवाई से पूर्व कल्चर व फास्फोरस का भूमि में प्रयोग करने से उपज में वृद्धि होती है ।

इसके अतिरिक्त अन्य सस्य क्रियायें जैसे पंक्तिबद्ध बुवाई, खरपतवार नियन्त्रण हेतु रसायनों का प्रयोग तथा उपयुक्त समय पर फसल की कटाई कर लेना लाभकारी रहता है ।


भारत में दलहनी फसलों का उत्पादन बढ़ाने के क्या उपाय करने चाहिये?

दाले शाकाहारी मनुष्यों के लिये प्रोटीन का मुख्य स्रोत हैं । एशियाई देशों में शाकाहारी व्यक्तियों की संख्या अधिक है तथा यहाँ की जनसंख्या में गत दशकों में काफी तेजी से वृद्धि हुई है ।

दालों से मनुष्यों को प्रोटीन के अतिरिक्त अन्य पोषक तत्वों की भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता होती है । एक स्वस्थ व्यक्ति को औसतन 85 ग्राम दाल का प्रतिदिन सेवन करना चाहिये, परन्तु यहाँ पर जनसंख्या वृद्धि एवं दालों के कम उत्पादन के कारण यहाँ दालों की उपलब्धता घटकर मात्र 30 ग्राम / व्यक्ति रह गई है ।

अतः इस विशाल जनसंख्या को उचित पोषक भोजन उपलब्ध कराने के लिये दालों के उत्पादन को बढ़ाना नितान्त आवश्यक हो गया उन्नत सस्य क्रियाओं को अपनाकर दलहनी फसलों का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है ।


दलहनी फसलों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए उन्नत क्रियाओं की अपनाना चाहिए -

1. उन्नत किस्मों का चुनाव -

कम अवधि में पकने व अधिक उपज देने वाली दलहनी फसलों की बुवाई अधिक से अधिक क्षेत्रफल में करनी चाहिये । ऐसा करने से इन दलहनी फसलों की बहुफसली कार्यक्रमों (multiple cropping pro ammes) में सम्मिलित किया जा सकता है ।


2. दलहनी फसलों की सुरक्षा -

पादप सुरक्षा के अन्तर्गत बीज से फसलों को वृद्धि तक विभिन्न रसायनों का प्रयोग अवश्य ही करना चाहिये ।


3. राइजोबियम कल्चर व उर्वरको का प्रयोग -

बुवाई से पूर्व राइजोबियम कल्चर व फास्फोरस का भूमि में प्रयोग करने से उपज में वृद्धि होती है ।

इसके अतिरिक्त अन्य सस्य क्रियायें जैसे -

  1. पंक्तिबद्ध बुवाई, खरपतवार नियन्त्रण हेतु रसायनों का प्रयोग तथा उपयुक्त समय पर फसल की कटाई कर लेना भी लाभकारी रहता है ।
  2. दलहनी फसलों से पोषक भोजन के अतिरिक्त कृषकों की भूमि की उर्वरा शक्ति में भी वृद्धि होती है ।
  3. इन फसलों की जड़ों में वायुमण्डल में पाई जाने वाली गैसीय अवस्था वाली नाइट्रोजन स्थिर हो जाती है और साथ - साथ मृदा में फास्फोरस की उपलब्धता भी बढ़ती है ।

अत: जिससे उस दलहनी फसल में कम उर्वरकों की आवश्यकता पड़ती है और अगली फसल के लिये भी भूमि में नाइट्रोजन व फास्फोरस की उपलब्धता बढ़ जाती है ।

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