अधिक लाभ पाने के लिए मटर की खेती (matar ki kheti) कैसे करें | Farming Study

मटर का वानस्पतिक नाम (Botanical Name) - पाइसम सेटाइवम (Pisum sativum)

मटर का कुल (Family) - लेग्यूमिनेसी (Laguminoceae)


संपूर्ण विश्व में मटर की खेती (matar ki kheti) सब्जी व दलहन वाली फसलों के रूप में की जाती है ।

सम्पूर्ण विश्व में मटर की फसल (matar ki fasal) का एक सब्जी वाली एवं दलहनी फसलों के रूप में प्रमुख स्थान है ।

भारत में मटर की खेती (matar ki kheti) सब्जी एवं दलहन दोनों की प्राप्ति के उद्देश्य से की जाती है ।


मटर की खेती से लाभ


मटर के दानों में प्रोटीन 22%, वसा 2%, कार्बोहाइड्रेट्स 62%, खनिज लवण 5% व शेष जल पाया जाता है ।

इसका प्रयोग प्रमुख रूप से शाकाहारी व्यंजनों को तैयार करने में किया जाता है ।


इसके अतिरिक्त मटर की खेती (matar ki kheti) से निम्नलिखित लाभ होते है -

  • पशुओं के लिए हरे चारे की प्राप्ति
  • इंधन की प्राप्ति
  • खेत में नाइट्रोजन का स्थितिकरण
  • मिट्टी की उर्वरता में वृद्धि
  • मृदा का संरक्षण


मटर कितने प्रकार की होती है?


मटर की मुख्यतः दो प्रकार की जातियाँ सम्पूर्ण विश्व में उगाई जाती है —

  • सब्जी वाली मटर ( Vegetable Pea ) 
  • दाल वाली मटर ( Pulse Pea )


1. सब्जी वाली मटर का उपयोग मुख्यतः सब्जी बनाने में किया जाता है, जबकि दाल वाली मटर का प्रयोग मुख्यतः दाल बनाने में किया जाता है ।

2. दाल वाली मटर का उपयोग पशुओं के लिये स्वादिष्ट हरे चारे के रूप में भी किया जाता है । 

इसके अतिरिक्त दाल वाली मटर हरी खाद के रूप में भी प्रयोग की जाती है ।

दाल वाली मटर की फसल भूमि को ढकने का कार्य भी करती है, जिससे मृदा का संरक्षण होता है ।


मटर का उत्पत्ति स्थान एवं इतिहास


मटर की खेती (matar ki kheti) विश्व के विभिन्न भागों में प्राचीनकाल से ही की जाती रही है ।

इसकी उत्पत्ति स्थल के बारे में वैज्ञानिकों का कोई एक निश्चित मत नहीं है ।

कुछ वैज्ञानिक भारत को ही मटर का उत्पत्ति स्थान मानते हैं, जबकि कुछ अन्य इतिहासकारों के अनुसार मटर की खेती (matar ki kheti) दक्षिणी यूरोप एवं पश्चिमी एशिया के भूमध्यसागरीय क्षेत्रों में प्राचीनकाल से की जाती है और यहीं से इसका प्रचार एवं प्रसार भारत व अन्य देशों को हुआ है ।


मटर का भागोलिक विवरण


वर्तमान समय में मटर की खेती (matar ki kheti) विश्व के 110 लाख हैक्टेयर क्षेत्रफल पर की जाती है और इसका कुल उत्पादन लगभग 140 लाख टन है ।

मटर की खेती करने वाले देशों में चीन व भारत आदि प्रमुख हैं और इसकी औसत उत्पादकता विश्व में लगभग 1300 किग्रा./हैक्टेयर है ।


भारत में मटर का उत्पादन


भारत में मटर की खेती लगभग 8 लाख हैक्टेयर पर की जाती है और इसका कुल उत्पादन लगभग 9 लाख टन है ।

भारत में मटर उत्पादक प्रमुख राज्यों में उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश आदि हैं ।

उत्तर प्रदेश में लगभग 4.25 लाख हैक्टेयर पर मटर की खेती (matar ki kheti) होती है ।

सम्पूर्ण भारत में मटर की औसत उत्पादकता लगभग 1050 किग्रा./हैक्टेयर है मटर का पौधा एकवर्षीय शाखायुक्त होता है । 

मटर का वानस्पतिक विवरण


इसकी जड़ें मूसला होती है । 

पौधों पर लगने वाली पत्तियों पर फूल अधिक संख्या में आते हैं ।

सब्जी वाली मटर के फूल सफेद, जबकि दाल वाली मटर के फूल नीले बैंगनी रंग के होते हैं । बीज गोल तथा फलियों में पाये जाते हैं ।

सब्जी वाली मटर के बीज हल्के हरे व पीले, जबकि दाल वाली मटर के बीज गहरे हरे तथा बैंगनी - नीले रंग के होते हैं ।

दाल वाली मटर के पौधे स्वभाव में सब्जी वाली मटर के पौधों की तुलना में अधिक कठोर होते हैं ।


मटर की खेती के लिए उचित जलवायु


मटर की खेती (matar ki kheti) भारतवर्ष में रबी के मौसम में की जाती है ।

मटर मूल रूप से एक ठण्डे मौसम की फसल है ।

इसके बीज के अंकुरण के लिये लगभग 20°C 
तापमान उचित रहता है तथा पौधे की उचित वृद्धि एवं विकास के लिये 15-20°C तापमान की आवश्यकता होती है ।

वातावरण की प्रतिकूल परिस्थितियाँ जैसे अधिक तापमान व पाला इसके लिये हानिकारक होता है ।

महावट की वर्षा इसके लिये लाभप्रद होती है, परन्तु फूल आने पर वर्षा हो जाने से फूल गिर जाने की सम्भावना रहती है ।

अधिक तापमान से फलियाँ बनने की प्रक्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ।


मटर की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी


मटर की खेती के लिये दोमट व मटियार दोमट उदासीन मृदायें सर्वोत्तम रहती है ।

अधिक अम्लीय व क्षारीय मृदायें मटर की खेती (matar ki kheti) के लिये अनुकूल नहीं हैं ।

हल्की दोमट मृदाओं में भी इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है ।

भूमि में जल निकास की उचित व्यवस्था होना आवश्यक है ।


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मटर की फसल से अच्छी उपज प्राप्त करने के लिये निम्न कृषि तकनीकों को अपनाकर कृषक अच्छी आय प्राप्त कर सकते है -

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मटर की खेती के लिए खेत की तैयारी कैसे करें?


खरीफ की फसलों जैसे मक्का, ज्वार, बाजरा, धान या कपास आदि की कटाई के पश्चात् एक गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से व 2-3 जुताइयाँ देशी हल से या 2-3 बार हैरो चलाकर खेत बुवाई के लिये तैयार किया जाता है ।

ऐसा करने से खेत की मिट्टी भुरभुरी हो जाती है ।

बुवाई के समय भूमि में पर्याप्त नमी का होना आवश्यक है ।

यदि नमी की मात्रा कम हो तो बुवाई से पूर्व पलेवा कर लेना चाहिये ।


मटर की खेती के लिए उपयुक्त जाति का चुनाव


मटर की खेती (matar ki kheti) के लिये क्षेत्र की जलवायु एवं भूमि सम्बन्धी आवश्यकताओं, बीज उपलब्धता व बुवाई का समय ध्यान में रखते हुये निम्न में से एक उपयुक्त जाति का चुनाव किया जा सकता है ।


( a ) सब्जी वाली जातियाँ ( Vegetable pea varieties ) -


( i ) मटर की अगेती किस्में ( Early Varieties ) -

मटर की ये जातियाँ 65-70 दिनों में फलियाँ तोड़ने के लिये पककर तैयार हो जाती है ।

उदाहरण - पन्त -2, पन्त -3, आजाद -3, पंजाब अगेती, अर्किल, BL - 7, अर्ली दिसम्बर, अर्ली बेजर व अगेती -7 आदि ।


( ii ) समय से बोई जाने वाली मटर की किस्में ( Timely sown Varieties ) -

मटर की इन जातियों की फलियाँ लगभग 70-80 दिनों में तोड़ने के योग्य हो जाती हैं ।

उदाहरण - आजाद -1, आजाद -2, Type - 19, पन्त उपहार व अजीत आदि ।


( iii ) मटर की पछेती किस्में ( Late Varieties ) –

मटर की इन जातियों की फलियाँ लगभग 90-100 दिनों में तोड़ने के योग्य हो जाती हैं ।

उदाहरण - बोनीविले, Type - 19, NP - 21, व जवाहर -1 आदि ।


( b ) दाल वाली जातियाँ ( Pulse pea Varieties ) -

उदहारण - रचना, पन्त -5, सपना, अपर्णा, मालवीय -15, UP - 2, HFG - 4, DM - 11 व Type - 163 आदि ।


मटर की सबसे अच्छी किस्म (मटर की उन्नत किस्में) कौन सी है?


सब्जी वाली किस्में -

  • अर्किल
  • पंत मटर - 2
  • आज़ाद मटर - 1
  • बोनिविले


दाने वाली किस्में -

  • रचना
  • सपना
  • शिखाा


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मटर की खेती का सही समय


मटर की बुवाई 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर तक की जाती है ।

मटर की फसल एक अल्पकालीन फसल है ।

इसकी बुवाई का उपयुक्त समय खरीफ की फसलों जैसे धान, मक्का व ज्वार आदि की कटाई के समय पर निर्भर करता है ।


मटर कब लगाएं 


सब्जी वाली मटर की बुवाई सितम्बर के अन्तिम सप्ताह से अक्टूबर के दूसरे सप्ताह तक अवश्य कर देनी चाहिये ।

इससे पूर्व बोई गई सब्जी वाली फसल में तनामक्खी व तनाछेदक का प्रकोप होने की सम्भावना रहती है ।


मटर की बीज दर कितनी होती है?


सब्जी वाली मटर की बुवाई के लिये 80-100 किग्रा./ हैक्टेयर तथा दाल वाली मटर की बुवाई के लिये 60-80 किग्रा./ हैक्टेयर की दर बीज की बुवाई करनी चाहिये ।


मटर में बीजोपचार


मटर बीजों की बुवाई से पूर्व 2 ग्राम थायराम तथा 1 ग्राम कार्बेन्डाइजिम रसायनों की कुल 3 ग्राम मात्रा प्रति किग्रा. बीज की दर से उपचारित करना चाहिये ।


मटर की खेती में राइजोबियम कल्चर का प्रयोग


मटर के बीजों को रसायनों से उपचारित करने के पश्चात् अन्य दलहनी फसलों की भाँति राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना चाहिये ।

मटर के राइजोबियम उपचार हेतु मटर के राइजोबियम कल्चर का ही प्रयोग करना चाहिये ।


मटर की बुवाई की विधि


मटर की बुवाई पंक्तियों में करनी चाहिये ।

बुवाई हल के पीछे कूण्डों में या सीडड्रिल द्वारा की जा सकी है । 

मटर की खेती में अन्तरण एवं गहराई


मटर की फसल (matar ki fasal) में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 सेमी. व पौधे से पौधे की दूरी लगभग 5 सेमी० रखी जाती है ।

बीज की बुवाई की गहराई 5 सेमी० के लगभग रखनी चाहिये ।


मटर की खेती के लिए आवश्यक खाद एवं उर्वरक की मात्रा


मटर एक दलहन वर्ग (leguminous crop) की फसल होने के कारण इसके लिये कम मात्रा में पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है ।

मटर की खेती (matar ki kheti) में 20-30 किग्रा. नाइट्रोजन/हैक्टेयर की दर से बुवाई के समय दी जानी चाहिये ।

मृदा परीक्षण के आधार पर फास्फोरस व पोटाश की मात्रा का निर्धारण किया जाना चाहिये ।

मृदा परीक्षण न होने पर 60-70 किग्रा. फास्फोरस व 30-60 किग्रा. पोटाश प्रति हैक्टेयर की दर से बुवाई के समय प्रयोग करनी चाहिये ।

मटर एक दलहनी फसल होने के कारण वायुमण्डल की नाइट्रोजन को पौधों की जड़ों में संचित करने का कार्य करती है ।

यदि भूमि में जिंक की कमी हो तो पूर्ति हेतु जिंक सल्फेट का प्रयोग लाभकारी रहता है ।


मटर में कौन सी खाद डालें?


मटर की फसल से अच्छी उपज प्राप्त करने के लिये बुवाई से एक माह पूर्व 20 टन सड़ी हुई गोबर की खाद खेत में मिला देनी चाहिए ।


मटर की उन्नत खेती के लिए आवश्यक सिंचाई


मटर की फसल में कुल दो सिंचाइयों की आवश्यकता पड़ती है ।

मटर की क्रांतिक अवस्थाएं - प्रथम सिंचाई फूल आने से पहले तथा दूसरी सिंचाई फलियों में दाना बनने के समय की जानी चाहिये ।

यदि महावट की वर्षा की जाये तो दूसरी सिंचाई की आवश्यकता नहीं रहती ।

यदि केवल एक सिंचाई उपलब्ध हो तो फूल आने से पूर्व करनी चाहिये ।

फूल आते समय सिंचाई करने पर लाभ की अपेक्षा हानि होती है ।


मटर की फसल में लगने वाले खरपतवार एवं उनका नियन्त्रण कैसे करें?


मटर की बुवाई के लगभग एक माह बाद एक निराई खुरपी द्वारा करनी चाहिये ।

फसल में वायु - संचार के लिये निराई - गुड़ाई भी करनी चाहिये ।

खरपतवारों पर नियन्त्रण के लिये - पैण्डीमैथालीन 30 EC की 3.3 लीटर मात्रा को 8000 लीटर पानी में घोल बनाकर बुवाई के तुरन्त बाद फसल जमने से पूर्व छिड़काव करना चाहिये ।


मटर की फसल सुरक्षा


पौधे का स्वास्थ्य अच्छा होने पर इसकी कीटों व रोगों से संघर्ष करने की क्षमता बढ़ जाती है ।

मटर की फसल को बहुत से रोग एवं कीट हानि पहुँचाते रहते हैं ।


( a ) मटर की फसल के रोग एवं उनका नियन्त्रण -

मटर की फसल में लगने वाले रोगों में चूर्णी रोग, तुलसिता रोग, झुलसा रोग, तना विगलन, मूल विगलन, म्लानि रोग, मोजेक व गेरूई रोग आदि प्रमुख है ।


( i ) चूर्णी रोग ( Powdery Mildew ) -

इस रोग में पत्तियों, फलियों व तने पर सफेद चूर्ण फैल जाता है और पत्तियाँ काली पड़ जाती हैं तथा पौधा सूख जाता है ।

इसकी रोकथाम के लिये - 2 ग्राम सल्फेक्स / लीटर जल में घोल बनाकर आवश्यकतानुसार फसल पर छिड़काव करना चाहिये ।


( ii ) तुलासिता रोग ( Downey Mildew ) -

इस रोग में पत्तियों पर पीले रंग के धब्बे पड़ जाते हैं तथा इनमें फफूंद लग जाती है और ये सूखकर गिर जाती है ।

इसके नियन्त्रण के लिये - डाइथेन M - 45 की 2 किग्रा. मात्रा को 1000 लीटर जल में घोलकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिये ।


( iii ) झुलसा रोग ( Blight disease ) -

इस रोग के प्रभाव से नीचे की पत्तियों पर भूरे रंग के धब्बे दिखाई पड़ने लगते हैं ।

इसकी रोकथाम के लिये - संस्तुति तुलासिता रोग पर नियन्त्रण के समान है ।


( b ) मटर की फसल के कीट एवं उनका नियन्त्रण -

मटर की फसल को हानि पहुँचाने वाले कीटों में तना छेदक, फली छेदक, मक्खी, सूण्डी व लीफ माइनर आदि प्रमुख है ।


( i ) तना छेदक ( Stem borer ) -

इसकी गिंडारें पौधों के तनों को प्रारम्भिक अवस्था में ही छेद करके रख जाती हैं जिससे पौधा सूखकर मर जाता है ।

इस पर नियन्त्रण के लिये - थायमेथोएट 30 EC की एक लीटर मात्रा को 700 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिये ।


( ii ) फली छेदक ( Pod borer ) -

इस कीट की सूंडियाँ पौधों में फलियाँ आ जाने पर उनके अन्दर घुसकर फलियों को खाती रहती है ।

इन पर नियन्त्रण के लिये - इण्डोसल्फान 2 मिली. / लीटर जल में घोल बनाकर छिडकाव करना चाहिये ।


( iii ) लीफ माइनर ( Leaf minor ) –

ये कीड़े पौधों की पत्तियों को खाकर उन्हें नष्ट कर देते हैं ।

इन पर नियन्त्रण के लिये - डायमिथोएट 30 EC की 1 लीटर मात्रा को 1000 लीटर जल में घोल बनाकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिये ।


मटर की फसल की कटाई एवं मड़ाई


मटर की फसल 65-80 दिनों में फलियाँ तोड़ने के योग्य हो जाती है, जबकि दाने की फसल के लिये इस फसल को पकने में 130-140 दिन का सम् लगता है ।

पूर्ण पकी हुई फलियाँ 8-10 दिन के अन्तराल पर 4-5 बार तोड़ी जा सकती हैं ।

फसल के पौधों को खेत में धूप में सुखाने के पश्चात् इनकी गहाई कर ली जाती है ।


मटर की फसल से प्राप्त उपज


मटर की उन्नतिशील खेती करने पर 120-140 क्विटल / हैक्टेयर तक फलियाँ प्राप्त हो जाती हैं ।

दाने के लिये उगाई गई फसल की उपज 25-30 क्विटल / हैक्टेयर प्राप्त हो जाती है और इससे इतना ही भूसा भी प्राप्त होता है ।


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