भारत की प्रमुख तिलहनी फसलें और उनका महत्व व उत्पादन

Farming Study
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भारत में तिलहनी वर्ग की फसलों में मुख्य रूप से मूंगफली, सरसों, सोयाबीन, सूरजमुखी, कुसुम, तिल, अरण्डी तथा अलसी आदि की खेती की जाती है ।

इनमें मूंगफली तथा सरसों की खेती सर्वाधिक होती है । इन दोनों फसलों का उत्पादन देश में तिलहनी फसलों के कुल उत्पादन का लगभग तीन-चौथाई भाग है । 

तिलहनी फसलें किसे कहते है? tilhani fasale kise kehte hain

"ऐसी फसलें जिनके उत्पादन के रूप में मुख्य रूप से तेल प्राप्त होता है उन्हें तिलहनी फसलें (tilhani fasale) कहते हैं ।"
उदाहरण - तोरिया, सरसों, सूरजमुखी व कुसुम आदि ।

भारत में उगाई जाने वाली प्रमुख तिलहनी फसलें -

सम्पूर्ण विश्व में उगाई जाने वाली तिलहनी फसलों में सोयाबीन, सरसों, मूंगफली तथा सूरजमुखी प्रमुख हैं ।

रबी के मौसम की मुख्य तिलहनी फसलें -

  • तोरिया
  • राई
  • सरसों
  • कुसुम
  • अलसी एवं सूरजमुखी आदि ।

भारत में मूँगफली व सरसों । इनसे देश के कुल उत्पादने के लगभग 70% तेल की प्राप्ति होती है

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भारत की प्रमुख तिलहनी फसलें और उनका महत्व व उत्पादन

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भारत में तिलहनी फसलों का क्या महत्व है? | tilhani fasalo ka mahatv

सम्पूर्ण विश्व में तिलहनी फसलों का महत्व (tilhani fasalo ka mahatv) मानव जीवन में आपार है ।

इनसे खाने योग्य वनस्पति तेल के निर्माण के अतिरिक्त दैनिक जीवन में उपयोग में जाने वाली अन्य बहुत-सी सामग्री तैयार की जाती हैं जिनमें सौन्दर्य प्रसाधन का सामान, कागज, चमड़ा उद्योग का सामान आदि प्रमुख है ।

तिलहनी फसलों का महत्व -

  • वनस्पति तेलों के निर्माण में
  • सौन्दर्य प्रसाधन के सामान निर्माण में
  • चमड़ा उद्योग में
  • पशुओं की चारे की पूर्ति में
  • मृदा और उर्वरकता में
  • मिश्रित खेती में
  • भूमि संरक्षण का कार्य में
  • ईंधन व अन्य उपयोग में


भारत में तिलहनी फसलों का उत्पादन कम क्यों है?

वर्तमान समय में हमारे देश में तिलहनों की खेती लगभग 28 मिलियन हैक्टेयर पर होती है और इनका उत्पादन लगभग 25 मिलियन टन वार्षिक है ।

इन तिलहनी फसलों की उत्पादकता लगभग 10 क्विटल/हैक्टेयर और विश्व की औसत उत्पादकता लगभग 15 क्विटल/हैक्टेयर है । अतः इस समय भारत की प्रति हैक्टेयर उत्पादकता विश्व की औसत उत्पादकता की तुलना में बहुत कम ।

तिलहनी फसलों का उत्पादन कम होने के प्रमुख कारण -

  • आर्थिक कारण ( Economic Reasons )
  • प्रबन्धकीय कारण ( Management Factors )
  • वातावरणीय कारण ( Environment reasons )
  • तकनीकी कारण ( Technical reasons )


आर्थिक कारण ( Economic Reasons ) -

हमारे देश के अधिकतर किसान छोटे व मध्यम जोत वाले हैं । इसीलिये इनकी विभिन्न मदों पर खर्च करने की क्षमता बहुत कम होती है । हमारे देश में अधिकतर तिलहनी फसलें वर्षाआश्रित क्षेत्रों में उगाई जाती है । इसीलिये इन फसलों का उत्पादन कम जोखिम भरा होता है । इसी कारण से तिलहन वर्ग की फसलों से उत्पादन कम होता है । कृषकों की दरिद्रता, अज्ञानता, अशिक्षित होना आदि अनेक ऐसे कारक हैं जिनके कारण किसान उन्नत कृषि तकनीकों का सम्पूर्ण लाभ उठाने असमर्थ रहता है । इसके अतिरिक्त सिंचाई की सुविधाओं का अधिक खर्चीला होने से उनकी समय पर उपलब्धता नहीं होती है और संसाधनों के प्रत्यक्ष रूप में उपस्थित होते हुये भी कमी बनी रहती है और उत्पादन कम होता है ।


प्रबन्धकीय कारण ( Management Factors ) -

तिलहनी फसलों के उत्पादन हेतु उत्तम फसल प्रबन्धन का प्राय: अभाव रहता है । गुणवत्तायुक्त बीज के उपलब्ध न होने से तथा फसलों के उगाने के लिये धन का अभाव, फसल के लिये ऋण की सुविधा का अभाव, सिंचाई व अन्य कार्यों के लिये धन की कमी बनी रहती हैं । इनके अतिरिक्त तिलहनी - फसलों के उत्पाद के भण्डारण की व्यवस्था व विपणन की व्यवस्था का अभाव तथा संगठनात्मक कार्यों का समय पर न हो पाना भी कम उपज तथा उपज की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं ।


तकनीकी कारण ( Technical reasons ) –

तिलहनी फसलों की उपज में कमी लाने वाले तकनीकी कारण भी अति महत्वपूर्ण हैं । हमारे देश में इन कारणों में अधिक उपज देने वाली जातियों (HVYs) का अभाव, जलरोधी जातियों (water resistant varieties) की कमी, कीटरोधी जातियों (pest resistant varieties) की कमी मुख्य हैं । इसके कारण किसानों को उनकी स्थिति के अनुसार, उपयुक्त बीज की आपूर्ति नहीं हो पाती है जिससे उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है । उपरोक्त कारणों के अतिरिक्त उन्नत कृषि यन्त्रों के अभाव के कारण खेत की तैयारी उचित प्रकार से नहीं हो पाती है । सस्ती उन्नत कृषि - क्रियाओं के अभाव से फसल उत्पादन पर खर्च अधिक बना रहता है । तिलहनी फसलों के रख - रखाव हेतु भण्डारण की उचित व्यवस्था न होने के कारण कटाई के पश्चात् फसल उत्पाद की गुणवत्ता में ह्रास प्रायः होता रहता है । इन सभी कारणों से उपज घट जाती है ।


वातावरणीय कारण ( Environment reasons ) -

हमारे देश में तिलहनी फसलों को प्रायः समस्याग्रस्त व कम उर्वर मृदाओं में उगाया जाता है । ऐसा बहुतायत से देखा गया है कि इन फसलों की खेती के लिये कम महत्व की भूमियों का चुनाव किया जाता है । इन फसलों की कीट व रोगयुक्त जातियों को उगाने से फसल की गुणवत्ता एवं उपज घट जाती है , जबकि धन अभाव के कारण कृषक प्रायः इन्हीं का चुनाव कर पाते हैं । वातावरण सम्बन्धी कारकों में वर्षा की अधिक मात्रा, वायुमण्डल की अधिक आर्द्रता, अधिक तापमान तथा भूमि में अधिक नमी का होना आदि कारण फसल की उपज को कम करते हैं ।


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तिलहनी फसलों का उत्पादन बढ़ाने के क्या क्या उपाय करने चाहिए?

हमारे देश में तिलहनों का कुल उत्पादन लगभग 25 मिलियन टन प्रतिवर्ष है और यहाँ की जनसंख्या लगभग 110 कर हैं । यहाँ वनस्पति तेल के उपयोग का राष्ट्रीय औसत 8 किग्रा०/वर्ष है, जबकि विश्व का उपभोग औसत लगभग 25 किग्रा०/वर्ष है ।

अतः हमारे देश में इनका उत्पादन व उपभोग विश्व स्तरीय औसत की तुलना में बहुत कम में है विशला जनसंख्या की मानकों के अनुरूप वनस्पति तेल तथा अन्य सम्बन्धित उत्पादों की आपूर्ति हेतु निश्चित रूप से तिलहनों का उत्पादन एवं उपज को बढ़ाना होगा ।

सस्य - वैज्ञानिक निरन्तर इस कार्य में जुटे हैं तथा समय - समय पर इसके लिये कार्य प्रदर्शनों (work demonstrations) का आयोजन भी किया जाता है ।

तिलहनी फसलों का उत्पादन बढ़ाने के प्रमुख उपाय -

  • तिलहनी फसलों का क्षेत्रफल बढ़ाकर ( By increasing the oilseed crops area )
  • संकर जातियों का चुनाव ( Selection of hybrid Varietics )
  • उत्तम बीज का प्रवन्ध ( Arrangement of Quality Seed )
  • उर्वरकों का उचित प्रयोग ( Proper application of Fertilizers )
  • उचित समय पर सिंचाई ( Irrigation at proper timings )
  • पादप सुरक्षा उपाय ( Plant protection measures )
  • उन्नत कृषि तकनीकों का प्रयोग ( Application of improved agro-techniques )
  • उन्नत कृषि यन्त्रों का प्रयोग ( Application of improved agricultural implements )
  • प्रचार व प्रसार कार्यक्रमों से शिक्षा ( Education with publicity and extention programs )
  • उचित विपणन प्रबन्ध ( Proper Market Management )


तिलहनी फसलों का क्षेत्रफल बढ़ाकर ( By increasing the oilseed crops area ) -

तिलहनी फसलों की खेती के अन्तर्गत क्षेत्रफल को बढ़ाकर इनका कुल उत्पादन बढ़ाया जा सकता है । बेकार पड़ी भूमियों को तिलहनी फसलों की खेती के अन्तर्गत मिलाकर अथवा अन्य फसलों के लिये अनुपयुक्त भूमियों में तिलहनी फसल उगाने से तिलहनों का क्षेत्रफल व उत्पादन दोनों बढ़ाये जा सकते हैं ।


संकर जातियों का चुनाव ( Selection of hybrid Varietics ) -

तिलहनी फसलों की संकर जातियों (hybrids), कम समय में पकने वाली जातियाँ (short duration varieties), कीटरोधी जातियों (pest resistant varieties) तथा अधिक उपज देने वाली जातियों (HYVs) का चुनाव करना चाहिये ।


उत्तम बीज का प्रवन्ध ( Arrangement of Quality Seed ) -

तिलहनी फसलों से अधिक पैदावार लेने के लिये उत्तम गुणवत्तायुक्त बीज का प्रबन्ध सर्वदा एक प्राथमिक सावधानी है ।


उर्वरकों का उचित प्रयोग ( Proper application of Fertilizers ) -

तिलहनी फसलों में रसायनिक व जैविक उर्वरकों का उचित प्रयोग अच्छे फसल पोषण के लिये आवश्यक होता है । ऐसा करने से निश्चित रूप से फसल की उपज में वृद्धि होती है ।


उचित समय पर सिंचाई ( Irrigation at proper timings ) -

तिलहनी फसलों में फूल आने से पूर्व की अवस्था (pre-flowering stage) व फलियाँ बनने की अवस्था (pod formation stage) सिंचाई की क्रान्तिक अवस्थायें मानी जाती हैं । अतः पौधों की वृद्धि को ध्यान में रखते हुये सही समय पर सिंचाई करनी चाहिये ।


पादप सुरक्षा उपाय ( Plant protection measures ) -

हमारे देश में तिलहनी फसलों को बहुत से कीट हानि पहुँचाते हैं । इन पर समय रहते नियन्त्रण कर फसल को बचाया जा सकता है । 


उन्नत कृषि तकनीकों का प्रयोग ( Application of improved agro-techniques ) –

तिलहनी फसलों को उगाने के लिये उन्नत कृषि तकनीकों के प्रयोग से कृषकों को हमेशा लाभ रहता है जैसे - फसलों की बुवाई से पूर्व बीज का राइजोबियम कल्चर से उपचार, मूंगफली में फलियाँ बनते समय जिप्सम का प्रयोग व बुवाई की उन्नत विधियों का प्रयोग आदि ।


उन्नत कृषि यन्त्रों का प्रयोग ( Application of improved agricultural implements ) –

तिलहनी फसलों को उगाने के लिये उन्नत कृषि यन्त्रों का प्रयोग करना चाहिये । इन यन्त्रों के प्रयोग से समय व धन दोनों की बचत होती है ।


प्रचार व प्रसार कार्यक्रमों से शिक्षा ( Education with publicity and extention programs ) -

तिलहनी फसलों की अधिक पैदावार के लिये नई कृषि तकनीकों, उन्नत जातियों व कार्य प्रदर्शनों आदि के प्रति किसानों को जागरूक रहना चाहिये । जिससे समय रहते उन्नत कृषि - क्रियाओं की उचित जानकारी एवं प्रशिक्षण प्राप्त किया जा सके ।


उचित विपणन प्रबन्ध ( Proper Market Management ) –

कृषकों के तिलहनी फसलों के उत्पादन के समुचित विपणन एवं विक्री का समुचित प्रबन्ध और उचित समर्थन मूल्य की घोषणा सरकार द्वारा प्रतिवर्ष किसानों को प्रोत्साहित करने के लिये समय पर करनी चाहिये ।

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