तोरिया एवं सरसों की खेती कैसे करें? | sarso ki kheti kaise kare?

सरसों का वानस्पतिक नाम (Botanical Name) - बेसिका स्पीशीज़ (Brassica Spp.)


सरसों का कुल (Family) - क्रुसीफेरी


भारतवर्ष में मूंगफली के बाद तेल प्राप्ति हेतु तोरिया एवं सरसों की खेती (sarso ki kheti) का दूसरा स्थान माना जाता है ।


रबी के मौसम में उगाई जाने वाली तिलहनी फसलों में तोरिया एवं सरसों का प्रथम स्थान है ।


सरसों वर्ग की इन फसलों के बीजों में 35 से 45% तक तेल की मात्रा पाई जाती है ।


तोरिया एवं सरसों का क्या महत्व है?


तोरिया एवं सरसों का मनुष्य विभिन्न प्रकार से उपयोग करते है जो निम्न प्रकार है -


  • तोरिया एवं सरसों की हरी पत्तियों का उपयोग मनुष्य साग बनाने के लिये करता है ।
  • सरसों के पौधों की हरी पत्तियाँ पशुओं को हरे चारे के रूप में बरसीम व भूसे के साथ मिलाकर खिलाई जाती है ।
  • सब्जी बनाने तथा अचार बनाने में सरसों के तेल का प्रयोग भारतवर्ष की एक सांस्कृतिक परम्परा है ।
  • सरसों के तेल का प्रयोग विभिन्न प्रकार के वनस्पति तेल व साबुन बनाने में किया जाता है ।
  • कृषक तोरिया एवं सरसों को मुख्य फसलों के चारों ओर उगाते हैं जिससे मुख्य फसल की सुरक्षा होती है ।
  • तोरिया की फसल अल्पावधि में उगने वाली होने के कारण बहुफसली कार्यक्रमों के अनुकूल है ।


सरसों की खली का उपयोग


सरसों के बीजों से तेल निकालने के पश्चात् शेष बचा पदार्थ खली कहलाता है । 

इसमें 5% नाइट्रोजन, 2% फास्फोरस व 1% पोटाश पाया जाता है ।


सरसों की खली का उपयोग - पशुओं के लिये उत्तम आहार के रूप में तथा फसलोत्पादन हेतु कार्बनिक खाद के रूप में किया जाता है ।


तोरिया एवं सरसों का उत्पत्ति स्थान एवं इतिहास


सम्पूर्ण विश्व में तोरिया एवं सरसों की खेती (sarso ki kheti) प्राचीनकाल से किये जाने के प्रमाण मिलते हैं ।

इसी के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि सरसों वर्ग के पौधे प्राचीनकाल से ही तिलहनी फसलों के रूप में अपना महत्व रखते हैं ।


इनके उत्पत्ति स्थल के बारे में इतिहासकारों का कोई एक निश्चित मत नहीं है ।

सरसों वर्ग की इन फसलों की विभिन्न जातियों के उत्पत्ति स्थल के बारे में वैज्ञानिकों के भिन्न - भिन्न मत हैं ।


तोरिया का उत्पत्ति स्थल अफगानिस्तान एवं उसके आस - पास का क्षेत्र माना गया है ।


पीली सरसों का उत्पत्ति स्थल उत्तरी भारत एवं भूरी - काली सरसों का मूल स्थान अफगानिस्तान व भारतीय उपमहाद्वीप माना गया है ।

यहीं से इनका प्रचार एवं प्रसार विश्व के अनेक देशों को हुआ है ।


तोरिया एवं सरसों का भौगोलिक वितरण


विश्व के तोरिया एवं सरसों उत्पादक प्रमुख देशों में भारत, चीन, पाकिस्तान, कनाडा व फ्रांस आदि हैं ।

अधिक जनसंख्या घनत्व वाले देशों जैसे भारत, चीन, व पाकिस्तान आदि देशों में माँग अधिक होने के कारण सम्पूर्ण उत्पादन की खपत यही पर हो जाती है, जबकि अन्य देश जैसे कनाडा एवं फ्रांस आदि इसका निर्यात करते हैं ।


जापान, इटली व जर्मनी जैसे विकसित देशों द्वारा इनका आयात प्रतिवर्ष किया जाता है ।

विश्व में कुल लगभग 24 मिलियन हैक्टेयर क्षेत्रफल पर इनकी खेती की जाती है तथा इनका कुल उत्पादन लगभग 38 मिलियन टन है ।

वर्तमान समय में इनकी औसत उत्पादकता लगभग 15 क्विटल/हैक्टेयर है ।


भारत में सरसों का उत्पादन


विश्व में भारत सरसों की खेती (sarso ki kheti) सर्वाधिक क्षेत्रफल पर करने वाला देश है और उत्पादन की दृष्टि से सम्पूर्ण विश्व में चीन के बाद भारत का दूसरा स्थान है ।

यहाँ लगभग 7 मिलियन हैक्टेयर पर सरसों की खेती (sarso ki kheti) की जाती है और इनका उत्पादन लगभग 8 मिलियन टन है ।


भारत में इनके प्रमुख उत्पादक राज्य - राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब व गुजरात आदि है ।

भारत में इनकी औसत उत्पादकता लगभग 10 क्विटल / हैक्टेयर है ।


राजस्थान इनके क्षेत्रफल एवं उत्पादन की दृष्टि से भारत में प्रथम राज्य है ।

इसका सम्पूर्ण भारत में क्षेत्रफल एवं उत्पादन लगभग एक तिहाई है ।


तोरिया एवं सरसों का वानस्पतिक विवरण


सरसों वर्ग के सभी पौधे 'Cruciferae' परिवार के अन्तर्गत आते हैं ।

इन सभी फसलों के पौधों का वंश 'बेसीका' (Brassica) है तथा इनमें जातियाँ compestris तथा juncea प्रमुख हैं ।

इनके पौधे एकवर्षीय होते है, ये पौधे सीधे बढ़ने वाले होते हैं । 


तोरिया (rapeseed) के पौधे कम शाखायुक्त होते हैं । पत्तियाँ सीधे तने पर लगी होती हैं । इनकी ऊँचाई 50-120 सेमी तक होती है ।


इस वर्ग में काली एवं पीली सरसों की खेती भी सम्मिलित है । 

इनके बीज मोटे, चिकने और पीले या भूरे रंग के होते हैं । इनकी जड़ें भूमि में ऊपरी सतह पर फैली रहती हैं ।


राई (ndian mustard) के पौधे अधिक शाखायुक्त व झाड़ीनुमा होते हैं । इनकी ऊँचाई 50-200 सेमी. तक होती है ।

इनमें पत्तियाँ शाखाओं पर लगी होती हैं । इनके बीज खुरदुरे व गहरे भूरे रंग के होते हैं तथा इन पौधों में मूसला जड़ पाई जाती है ।


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तोरिया एवं सरसों की खेती के लिए उचित जलवायु एवं भूमि


तोरिया एवं सरसों मूल रूप से शीतोष्ण एवं उष्ण कटिबन्धीय (Tropical and temperate) क्षेत्रों की फसल है ।

भारत में ये फसलें रबी के मौसम में उगाई जाती हैं । 


इनकी वृद्धि एवं बढ़वार के लिये ठण्डा मौसम तथा 20-24°C तापमान उपयुक्त रहता है ।

ये फसलें 5°C से कम तथा 36°C से अधिक तापमान सहन नहीं करती और वातावरण की प्रतिकूल परिस्थितियों जैसे - पाला, कुहरा, वर्षा आदि के प्रति संवेदनशील है ।

बादलों वाला मौसम सरसों वर्ग (mustard group) के पौधों के लिये हानिकारक रहता है ।


ऐसे में विभिन्न रोगों एवं कीटों के प्रकोप की सम्भावना अधिक रहती है और उत्पादन घट जाता है ।

बादलरहित सामान्य एवं साफ मौसम तथा चमकीली धूप वाले दिन (bright sunny days), अनुकूल नमी एवं तापक्रम से इनके बीजों में तेल की प्रतिशत मात्रा बढ़ जाती है ।

300-400 मिमी. वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र इनकी खेती के अनुकूल माने जाते हैं । तोरिया एवं सरसों की फसलें विभिन्न प्रकार की भूमियों में उगाई जा सकती हैं ।


इन फसलों की अधिक उपज प्राप्त करने के लिये अच्छे जल निकास की सुविधाओं वाली दोमट व हल्की दोमट मृदायें सबसे अधिक अनुकूल रहती हैं ।

भूमि का pH मान सामान्य अर्थात् 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिये । अधिक अम्लीय व लवणीय भूमि सरसों की खेती (sarso ki kheti) के अनुकूल नहीं है ।


तोरिया एवं (पीली व काली) सरसों की उन्नत खेती कैसे करें?


तोरिया एवं सरसों भारत में उगाई जाने वाली तिलहन वर्ग की प्रमुख फसलें हैं ।

यहाँ पर सरसों की खेती (sarso ki kheti) रबी के मौसम में की जाती है । 


इन अधिक उपज प्राप्त करने के लिये उपयुक्त बीज का चुनाव एवं उन्नत सस्य - क्रियाओं को अपनाना आवश्यक है ।


तोरिया एवं सरसों की खेती के लिए भूमि का चुनाव कैसे करें?


तोरिया एवं सरसों की खेती (sarso ki kheti) के लिये दोमट व हल्की दोमट (sandy and light sandy) मृदायें सबसे अधिक अनुकूल मानी जाती है । 


भूमि में जल निकास की उत्तम व्यवस्था होनी आवश्यक हैं । भूमि का pH मान सामान्य व मृदा उदासीन होनी चाहिये ।


सरसों की खेती के लिए भूमि की तैयारी


खरीफ की फसलों जैसे - मक्का, ज्वार, बाजरा, धान या कपास आदि की कटाई के पश्चात् एक गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से व 2-3 जुताइयाँ देशी हल से या 2-3 बार हैरो चलाकर खेत बुवाई के लिये तैयार किया जाता है ।

ऐसा करने से खेत की मिट्टी भुरभुरी हो जाती है । 


बुवाई के समय भूमि में पर्याप्त नमी होना आवश्यक है । यदि नमी कम हो तो बुवाई से पूर्व पलेवा कर लेना चाहिये ।


तोरिया एवं सरसों की खेती के लिए उचित जाति का चुनाव


तोरिया व सरसों की खेती (sarso ki kheti) के लिये क्षेत्र की जलवायु एवं भूमि सम्बन्धी आवश्यकताओं, बीज उपलब्धता व बुवाई का समय ध्यान में रखते हुये निम्न में से एक उपयुक्त जाति का चुनाव किया जा सकता है -


( a ) तोरिया की उन्नत किस्में -


( i ) काली तोरिया - Type - 9, भवानी, PT - 30 व PT - 303 आदि ।

( ii ) पीली तोरिया - Type - 36, Type - 151 व YSK - 1 आदि ।

( iii ) भूरी तोरिया- VSH - 1, व पूसा कल्याणी आदि ।


( b ) सरसों की उन्नत किस्में/सरसों की हाइब्रिड किस्म -


( i ) भूरी सरसों - BSH - 1, पूसा कल्याणी, KOS - 1 व BS - 70 आदि ।

( ii ) पीली सरसों - VS - 2, Type - 42, K - 88 व पूसा गोल्ड आदि ।


( c ) राई सरसों की उन्नत किस्में -


वरूणा (Type - 59), वरदान, वैभव, क्रान्ति, शेखर सौरभ, पूसा बोल्ड, प्रकाश, बसन्ती व कृष्णा आदि ।


तोरिया एवं सरसों की बुवाई का सही समय क्या है?


तोरिया की बुवाई समय मिलते ही 1 से 15 सितम्बर के बीच कर लेनी चाहिये ।

तोरिया की बुवाई में देरी होने पर कम तापक्रम हो जाता है जिससे माहू रोग फसल में होने की सम्भावना बढ़ जाती है ।


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सरसों के लिये से 10 अक्टूबर तक का समय बुवाई के लिये उपयुक्त रहता है ।


इसके अतिरिक्त काली सरसों की बुवाई का समय (टाइम) अक्टूबर माह ही होता है ।


तोरिया एवं सरसों की बीज दर क्या होती है?


तोरिया की फसल के लिये एक हैक्टेयर खेत में लगभग 4 किग्रा० बीज की मात्रा पर्याप्त रहती है तथा सरसों के लिये कुछ अधिक मात्रा में बीज का प्रयोग करना पड़ता है ।

इसके लिये 5 किग्रा०/ हैक्टेयर की दर से बीज प्रयोग करना चाहिये ।


तोरिया एवं सरसों में बीजोपचार


तोरिया व सरसों के बीजों को बीजजनित रोगों से बचाने के लिये 2.5 ग्राम थायराम प्रति किग्रा. बीज की दर से उपचारित करना चाहिये ।


तोरिया एवं सरसों को बोने की विधि


तोरिया एवं सरसों की बुवाई हल के पीछे कूण्डों में पंक्तियों में करनी चाहिये । 

इनकी बुवाई छिटकवाँ विधि से भी की जा सकती है ।


तोरिया एवं सरसों में अन्तरण एवं गहराई


तोरिया की फसल की बुवाई में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 सेमी. व पौधे से पौधे की दूरी 15 सेमी ० रखी जाती है । 

सरसों की फसल के लिये पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45 सेमी तथा पौधे से पौधे की दूरी 15 सेमी ० रखी जाती । 


इन फसलों की बुवाई की गहराई 3-4 सेमी ० रखनी चाहिये । बुवाई के समय खेत में पर्याप्त नमी का होना आवश्यक है ।

बुवाई के बाद बीज को ढकने के लिये हल्का पाटा खेत में प्रयोग करना चाहिये ।


विरलीकरण ( Thinning )


तोरिया एवं सरसों की फसल में बुवाई के लगभग 20 दिन पश्चात् उगे हुये घने पौधों के निकालकर उनकी आपस की दूरी लगभग 15 सेमी. कर देनी चाहिये ।


सरसों की फसल में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45 सेमी तथा पौधे से पौधे की दूरी 15 सेमी० रखने पर एक हैक्टेयर खेत में पौधों की कुल संख्या एक लाख साठ हजार होती है ।


तोरिया एवं सरसों में अपनाए जाने वाले फसल चक्र


तोरिया एवं सरसों को भिन्न - भिन्न फसल चक्रों में जलवायु, भूमि, सिंचाई की सुविधाओं और कृषकों की व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुसार उगाया जाता है ।


सरसों एवं तोरिया के कुछ प्रमुख फसल चक्र निम्न प्रकार है -


( i ) मक्का - तोरिया - गेहूँ - मूंग ( एकवर्षीय )

( ii ) धान - सरसों - मूंग ( एकवर्षीय )

(iii ) ज्वार - तोरिया - गेहूँ - मूंग ( एकवर्षीय )

( iv ) बाजरा - तोरिया - गेहूँ मूंग ( एकवर्षीय )

( v ) मक्का - सरसों - गन्ना - पेडी ( तीनवर्षीय )

( vi ) मक्का - सरसों - उड़द ( एकवर्षीय )


मिलवाँ खेती ( Mixed Cropping )


गेहूँ, जौ, गन्ना व आलू आदि फसलों के साथ इनकी मिलवाँ खेती की जा सकती है ।


उदाहरण - सरसों + गेहूँ, सरसों + जौं, सरसों + गन्ना, सरसों + चना, सरसों + मसूर तथा सरसों + आलू आदि ।


अन्तर्ववर्ती खेती ( Inter Cropping )


गेहूँ, चना, आलू, गन्ना व सूरजमुखी आदि फसलों के साथ सरसों की फसल को अन्तर्ववर्ती फसल (Inter crop) के रूप में उगाया जाता है ।


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तोरिया एवं सरसों में खाद एवं उर्वरक की मात्रा


तोरिया एवं सरसों की फसल उगाने के लिये बुवाई के लगभग 30 दिन पूर्व 100 क्विटल सड़ी हुई गोबर की खाद एक हैक्टेयर खेत में मिला देते हैं ।

उर्वरकों की मात्रा का निर्धारण करने के लिये मृदा परीक्षण कराना सर्वोत्तम रहता है ।


यदि परीक्षण सुविधा उपलब्ध न तो सिंचित क्षेत्रों में तोरिया के लिये 100 कि. नाइट्रोजन, 50 कि. फास्फोरस व 50 किग्रा. पोटाश की आवश्यकता प्रति हैक्टेयर होती है ।

सरसों के लिये 50 किग्रा. नाइट्रोजन, 75 किग्रा. फास्फोरस व 75 किया. पोटाश की आवश्यकता प्रति हैक्टेयर होती है ।

नाइट्रोजन की आधी एवं फास्फोरस एवं पोटाश की पूर्ण मात्रा अन्तिम बुवाई के समय भूमि में मिला देनी चाहिये ।


नाइट्रोजन की शेष आधी मात्रा बुवाई के 30 दिन बाद खड़ी फसल में टाप ड्रेसिंग (Top - dressing) के रूप में प्रयोग करनी चाहिये ।

असिंचित क्षेत्रों में तोरिया के लिये 50 किग्रा. नाइट्रोजन, 30 किग्रा. फास्फोरस व 30 किग्रा. पोटाश की आवश्यकता प्रति हैक्टेयर होती है ।


सरसों के लिये 80 किग्रा. नाइट्रोजन, 40 किग्रा. फास्फोरस व 40 किग्र पोटाश एक हैक्टेयर खेत के लिये पर्याप्त रहता है ।

नाइट्रोजन की पूर्ति के लिये यूरिया व फास्फोरस के लिये सुपर फास्फेट तथा पोटाश के लिये म्यूरेट ऑफ पोटाश का प्रयोग करना चाहिये ।


गन्धक की कमी वाले खेतों में 100 किग्रा. जिप्सम प्रति हैक्टेयर की दर से बुवाई के 20 दिन पूर्व खेत में मिला देना चाहिये ।

यदि खेत में जिंक की कमी का अनुभव हो तो 20 किग्रा० रैलीजिंक प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिये ।


तोरिया एवं सरसों में पानी कब लगाना चाहिए?


तोरिया व सरसों के लिये दो सिंचाइयों की आवश्यकता है ।

प्रथम सिंचाई फूल आने से पूर्व व द्वितीय दाना बनने की अवस्था पर की जानी चाहिये ।

खेत में जलभराव की स्थिति फसल के लिये हानिकारक है ।


तोरिया एवं सरसों में लगने वाले खरपतवार एवं उनका नियन्त्रण कैसे करें?


तोरिया एवं सरसों में खरपतवार होने पर उपज लगभग 25% तक घट सकती है ।

तोरिया में बुवाई के 20 दिन बाद खरपतवार नियन्त्रण हेतु एक निराई खुरपी सहायता से करनी चाहिये । सरसों में दो निराइयों की आवश्यकता होती है ।


प्रथम निराई पहली सिंचाई करने पूर्व करनी चाहिये तथा द्वितीय निराई दूसरी सिंचाई के बाद करनी चाहिये ।

इन फसलों में रसायनिक विधि से खरपतवारों को नियन्त्रित करने के लिये पैण्डीमैथालिन 30 EC की 3.3 लीटर मात्रा 1000 लीटर पानी में घोलकर बुवाई के तुरन्त बाद खेत में छिड़काव करना चाहिये ।


तोरिया एवं सरसों में लगने वाले कीट एवं रोगों की रोकथाम


पौधों का स्वास्थ्य अच्छा होने पर इसकी कीटों एवं रोगों से संघर्ष करने की क्षमता बढ़ जाती है ।

तोरिया एवं सरसों की फसल को बहुत से रोग व कीट हानि पहुँचाते रहते हैं ।


इनका संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है -


( a ) रोग एवं उनका नियन्त्रण के उपाय -


तोरिया एवं सरसों की फसल को हानि पहुँचाने वाले प्रमुख रोगों में सफेद गेरूई रोग, झुलसा रोग व तुलासिता रोग आदि है ।


( i ) सफेद गेरूई रोग ( White rust disease ) -

इस रोग में पौधों के तने व पत्तियों पर सफेद फफोले पड़ जाते हैं । पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं और पुष्प - विन्यास अनियमित हो ।


इसके नियन्त्रण के लिये - कैप्टॉफ 50 W की 3 ग्राम मात्रा प्रति लीटर जल की दर से मिलाकर घोल का छिड़काव करना चाहिये ।


( ii ) झुलसा रोग ( Blight disease ) -

इस रोग में पौधों की पत्तियों एवं फलियों पर गहरे भूरे - काले रंग के धब्बे बन जाते हैं । इसके धब्बे पत्तियों पर सरलता से दिखाई दे जाते हैं और इससे फलियाँ व दाने आकार में छोटे रह जाते हैं ।


इसके नियन्त्रण के लिये - कान्टॉफ 5E की 1-2 मिली. मात्रा प्रति लीटर जल की दर से घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिये ।


( ii ) तुलासिता रोग ( Downey mildew disease ) -

इस रोग में पत्तियाँ ऊपर से पीली पड़ जाती हैं और इनमें नीचे की ओर फफूंदी लग जाती है ।


इसके नियन्त्रण के लिये - कान्टॉफ 5E की 1-2 मिली. मात्रा प्रति लीटर जल की दर से घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिये ।


( b ) कीट एवं उनका नियन्त्रण के उपाय -


तोरिया एवं सरसों की फसल को हानि पहुँचाने वाले कीटों में आरा मक्खी, माहू कीट, बालदार सूण्डी व चितकबरा कीट आदि प्रमुख है ।


( i ) आरा मक्खी -

काले रंग की ये गिंडारें पत्तियों में छेद करके उन्हें पूर्ण रूप से खा जाती है और फसल को नष्ट कर देती हैं ।


इनके नियन्त्रण के लिये - आसाटॉफ 1.5 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर 7-10 दिन के अन्तराल पर तीन बार छिडकाव करना चाहिये ।


( ii ) माहू कीट -

तोरिया एवं सरसों की फसल में मैले भूरे रंग के ये कीट पौधों के तनों, पत्तियों, डण्ठलों, फूलों एवं फलियों आदि पर चिपके रहते हैं और उनका रस चूसते रहते है जिससे सम्पूर्ण फसल नष्ट हो जाती है । बादलों वाले मौसम में इनका प्रकोप अधिक होता है ।


इनके नियन्त्रण के लिये - मैलाथियान 50 EC की 1.5 लीटर मात्रा को 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिये ।


( iii ) चितकबरा कीट -

नारंगी रंग का धब्बेदार कीट होता है । यह पौधों के प्रत्येक भाग से माहू की तरह ही रस चूसता है ।


इन पर नियन्त्रण के लिये - उपाय माहू के समान ही है ।


( iv ) बालदार सूंडी -

ये सूंडियाँ पौधों की पत्तियों की निचली सतह में पाई जाती हैं । ये फलियों व दानों को खाकर फसल को हानि पहुँचाती हैं ।


इन पर नियन्त्रण के लिये - टाटाफेन 20E की 1 मिली. मात्रा प्रति लीटर जल की दर से घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करना चाहिये ।


तोरिया एवं सरसों की कटाई एवं गड़ाई


पौधों की पत्तियाँ व फलियाँ पीली पड़ जाने पर फसल की कटाई शीघ्रतापूर्वक फलियाँ झड़ने से पूर्व कर लेनी चाहिये ।

इस फसल को 5-6 दिन तक सुखाकर डण्डों से पीटकर दानों को अलग कर लिया जाता है ।


तोरिया एवं सरसों से प्राप्त उपज


तोरिया एवं सरसों की उन्नत सस्य - वैज्ञानिक विधि से खेती करने पर तोरिया की उपज 10 से 15 क्विटल/हैक्टेयर तथा सरसों की उपज 20 से 30 क्विटल/हैक्टेयर तक प्राप्त होती है ।


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