तिल की खेती (til ki kheti) कैसे की जाती है पूरी जानकारी | Farming Study

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अन्य तिलहनी फसलों की तरह ही तिल की खेती (til ki kheti) का भी एक महत्वपूर्ण स्थान है ।

वैसे तो, तिल की खेती (til ki kheti) विश्व के लगभग सभी देशों में की जाती है परंतु तिल उत्पादन में भारत का प्रथम स्थान है ।

  • तिल का वनस्पतिक नाम (Botanical name) - सिसेमम इण्डिकम (Sesamum Indicum L.)
  • कुल (Family) -  पैडालिएसी (Pedaliaceae)
  • गुणसूत्र संख्या (Chromosose) -


तिल की खेती कैसे करें | til ki kheti kaise kare

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तिल की खेती (til ki kheti) कैसे की जाती है पूरी जानकारी | Farming Study 


तिल का उत्पत्ति स्थान व इतिहास -

तिल का पौधा अफ्रीका में जंगली रुप मे पाये जाने के कारण अधिकांश वैज्ञानिकों का मत हैं कि इसका जन्म स्थान अफ्रीका हैं ।

बैवीलोव 1926 तथां डी० कण्डोल 1886 के अनुसार भी तिल की उत्पत्ति मूल रूप से अफ्रीका में और स्वतन्त्र रुप से भारत व दक्षिणी पश्चिमी एशिया में हुई ।

भारत में प्राचीनकाल से ही धार्मिक कार्यों, पूजा, हवन, दान देनी वाली सामग्री आदि में इसका प्रयोग होता आ रहा हैं ।


तिल की खेती का वितरण व क्षेत्रफल -

चीन, रुस, अफ्रीका, मैक्सिकों, अर्जेण्टीना, मध्य यूरोप, भारत, जापान, बर्मा, तुर्की, थाइलैण्ड आदि देशों में तिल की खेती (til ki kheti) की जाती हैं । क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का प्रथम स्थान है तथा दूसरा स्थान चीन का है । विश्व में 25 % तिल भारत में पैदा होता हैं ।

भारत में तिल की खेती (til ki kheti) उत्तरप्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश व गुजरात राज्यों में सर्वाधिक की जाती हैं । उ०प्र० में 85-86 में कुल क्षेत्रफल 14.90 लाख हैक्टर तथा उत्पादन 7.31 हजार टन था । उत्तर प्रदेश में तिल की खेती हमीरपुर, मिर्जापुर, कानपुर, बहराइच, आगरा व मथुरा में की जाती हैं ।


तिल की खेती का महत्व एवं उपयोग -

अन्य तिलहनों की तरह तिल का महत्वपूर्ण स्थान हैं । तिल से मिठाईयां तैयार की जाती हैं । तिल के बीज का उपयोग तेल तैयार करने के लिए किया जाता हैं ।

तिल का प्रमुख उपयोग निम्नलिखित है -

  • तिलों तेल का प्रयोग खाना बनाने में भी उपयोग किया जाता है ।
  • तिलों को गुड़ या चीनी मिलाकर भी खाया जाता है ।
  • तिल का तेल शरीर में लगाने वाले व्यापारिक सुगन्धित तेल तैयार करने, साबुन बनाने , बादाम के तेल में मिश्रण करके प्रयोग करने आदि कार्यों मे किया जाता हैं ।
  • तिल के बीजों में 50% तेल तथा 18.20% प्रोटीन होती हैं ।
  • तिलों की खली को मनुष्य तथा पशुओं के खाने के लिए प्रयोग किया जाता हैं ।


तिल की खेती के लिए उपर्युक्त जलवायु -

भारत में तिल समुद्र तल से लेकर 1200 मी० की ऊँचाई तक उगाया जाता हैं । तिल की फसल के लिए नम व गर्म जलवायु की आवश्यकता होती हैं । उत्तरी भारत में इसकी फसल मुख्य रुप से खरीफ की फसल के रुप में उगाई जाती हैं भारत में 50 सेमी० से अधिक वार्षिक वर्षा वाले स्थानों पर तिल की खेती (til ki kheti) सफलतापूर्वक की जाती हैं ।

सिंचाई के साधन उपलब्ध होने पर कम वर्षा वाले स्थानों पर भी तिल की खेती (til ki kheti) की जा सकती हैं । तिल की फसल की अच्छी वृद्धि के लिये 70-85°F ताप सबसे अच्छा होता हैं ।


तिल की खेती के लिए उपर्युक्त भूमि -

अधिक पैदावार लेने के लिये उचित जल निकास वाली भूमि की आवश्यकता होती हैं । तिल की खेती (til ki kheti) कपास की काली मिट्टी, भारी से लेकर बलुआर दोमट व हल्की दोमट में भी की जाती हैं ।

भारी भूमियों की अपेक्षा हल्की भूमियाँ तिल के विकास व वृद्धि के लिए अधिक उपयुक्त होती हैं ।


तिल की उन्नत किस्में -

विभिन्न क्षेत्रों के लिए उन्नतिशील जातियाँ व उनके गुण के इस प्रकार है -

  • उत्तरप्रदेश के लिए - टा०-4, टा०-13, टा०-10, टा०-22 इत्यादि । इत्यादि ।
  • बिहार के लिए - एम०3-2, एम०3-3 इत्यादि ।
  • पंजाब व हरियाणा के लिए - टा०-5, टा०-22, पंजाब तिल-1, टा०-12, टा०-24 इत्यादि ।
  • मध्यप्रदेश के लिए - न०-128, न०-141, एन०-32, जी०-5, जे० आई०-7, जी०-35 इत्यादि ।
  • राजस्थान के लिए - प्रताप, T.13, T.C.25 इत्यादि ।


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तिल की खेती के लिए खेत की तैयारी -

हल्की भूमियों में अधिक तैयारी की आवश्यकता नहीं होती एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करके 2-3 जुताई देसी हल से कर देनी पर्याप्त रहती है ।


तिल की खेती के लिए बीज एवं मात्रा -

बीज सदैव प्रमणित तथा कवकनशी रसायन से उपचारित करके ही बोना चाहिये । शुद्ध फसल मे बीज दर 5-8 किग्रा०/हैक्टर तथा मिश्रित फसल 2-5 किग्रा०/हैक्टर रखते हैं ।


खेती की खेती के लिए बीज बोने का समय एवं बुवाई की विधि -

उत्तरी भारत में बुवाई वर्षा शुरु होने पर ही करना शुरु करते हैं विभिन्न क्षेत्रों में बुवाई जून - जुलाई में की जाती हैं । बोने की विधि 15 तिल को छिटकवाँ तथा पत्तियों दोनो ही तरह से बोते हैं । बीज आकार में छोटा होने के कारण छिटकवाँ विधि ही प्रयोग करते हैं ।


तिल की खेती में अन्तरण -

जे० एन० कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर में किये अनुसंधान के आधार पर पौधों का अन्तरण 30x15 सेमी० रखना अधिक उपयुक्त हैं । बीज की बुवाई 2-3 सेमी० की गहराई पर करते हैं ।


तिल की खेती में आवश्यक खाद/उर्वरक का प्रयोग -

शुद्ध फसल में मृदा परीक्षण के आधार पर की खाद देनी चाहिये । यदि मृदा परीक्षण आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं तो 30 किग्रा० नत्रजन 60 किग्रा० फास्फोरस तथा 30 किग्रा० पोटाश प्रति हैक्टर की दर से देते हैं । ये सभी उर्वरक बीज की बुवाई के समय ही देने चाहिए ।


तिल की खेती में आवश्यक सिंचाई व जल निकास -

वर्षा ऋतु की फसल में सिचाई की आवश्यकता नही पड़ती हैं । सूखा पड़ने पर एक - दो सिंचाई कर देनी चाहिए । वर्षा के बाद की फसलों मे 3-4 सिंचाई करनी चाहिए । जल निकास सदैव उचित होना चाहिए ।


तिल की खेती की निराई-गुड़ाई -

फसल बोने के 25-30 दिन बाद निराई करके खरपतवार नियन्त्रण करते हैं । वैसालिन 1 किग्रा० सक्रिय तत्व को 800 ली० पानी में घोलकर बुवाई से पूर्व प्रति हैक्टर की दर से छिड़ककर अच्छी तरह मिला दें ।


तिल की खेती को कटाई व मड़ाई -

तिल 85-120 दिन मे पककर तैयार हो जाता हैं । कटाई बुवाई के समय के ऊपर निर्भर करती हैं । फसल के पकने पर पौधे पीले पड़ जाते हैं तथा सूखने लगते हैं इसी समय कटाई कर लेनी चाहिए । काटने के बाद वण्डलों को खलिहानों में सुखाते हैं । अच्छी तरह सूखने पर फलियाँ चटख जाती हैं । तथा बीज बहार निकल आते हैं । बाकी बीजों को डण्डों की सहायता से अलग कर लेते हैं ।


तिल की खेती से प्राप्त उपज -

शुद्ध फसल से 5-8 कु०/हैक्टर तक उपज प्राप्त हो जाती हैं ।


तिल की खेती में लगने वाले हानिकारक कीट व उनकी रोकथाम

1. तिल लीफरोकर - पतंगा लाल - भूरे रंग का तथा सूँडी हो रंग की होती हैं । इसकी सूँड़ी सितम्बर से नवम्बर तक पत्तियों तथा फलियों को खाती हैं ।

इसकी रोकथाम के लिए - डाइमक्रोन 300 मिली० को 900 ली० पानी में घोलकर प्रति हैक्टर की दर से या 0.4% पैराथियान का छिड़काव करना चाहिये ।

2. सैसेमम गाल फ्लाई - यह बिहार और महाराष्ट्र में पाया जाता है । इसके मैगर फूल को खाते हैं ।

इसके नियन्त्रण के लिये - प्रभावित पौधों को उखाड़कर फेंक देना चाहिये । कुछ परजीवी जो इसके लारवा को खा जाते हैं को भी फसल पर छोड़ा जा सकता हैं जैसे - Mermis sp तथा Apamtiles sp आदि ।

3. जैसिड - ये पत्तियों का रस चूसते हैं तथा रोजैट रोग फैलाते हैं । अधिक प्रकोप की दशा में पत्तियाँ सूख कर गिर जाती हैं ।

इसके नियन्त्रण के लिए - 0.05% इण्डोसल्फान के घोल का छिड़काव करना चाहिए ।

4. बिहार की रोंयेदार सूँडी - सूखी पत्तियों को खाती हैं ।

इसके नियन्त्रण के लिए - 0.15% इण्डोसल्फान 35 ई० सी० प्रति हैक्टंर छिड़कनी चाहिए ।


तिल की खेती में लगने वाले रोग व उनकी रोकथाम -

1. रोजैटा - यह विषाणु द्वारा फैलता हैं, पौधा झाड़ी नुमा हो जाता हैं, पत्तियाँ रिबन के आकार की हो जाती हैं । यह रोग फुदकों द्वारा फैलाया जाता हैं ।

इसके नियन्त्रण के लिए - 0.1% मैटा सिस्टॉक्स के 800 ली० का प्रति हैक्टर छिड़काव करें ।

2. लीफस्पोट - यह रोग सभी तिल उत्पादक क्षेत्रों में पाया जाता हैं । पत्तियों के दोनो सतहों पर भूरे धब्बे पड़ जाते हैं । यह बीज जनित बीमारी हैं ।

इसके नियन्त्रण के लिए - गर्म जल उपचार (52°तापक्रम पर एक घण्टे बीज को उपचारित करना) दिया जाता हैं । डाइथेन Z - 78 के 0.2 घोल का छिड़काव करना चाहिए ।

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