गन्ने की खेती कैसे करें? | ganne ki kheti kaise kare? | Farming Study

गन्ने का वानस्पतिक नाम (Botanical Name) - सेकरम ऑफीसेनेरम (Saccharum officinarum)

गन्ने का कुल (Family) - ग्रेमिनी (Gramineae)

गन्ने में गुणसूत्र संख्या - 2n = 80


शर्करा वाली फसलों में गन्ने की खेती (ganne ki kheti) सबसे महत्वपूर्ण फसल होती है ।

सम्पूर्ण विश्व में गन्ने के पौधों का रस निकालकर उसका उपयोग प्रमुख रूप से शर्करा के निर्माण में किया जाता है और इससे बनी शर्करा का लोग दैनिक जीवन में उपभोग करते है ।

गन्ना की खेती (ganne ki kheti) शर्करायुक्त एवं नगदी फसलों की खेती के अंतर्गत आती है ।

मुक्त व्यापार सन्धि (free trade treaty) के उपरान्त गन्ने की चीनी एवं अन्य उत्पादों की विश्व स्तर पर माँग बढ़ी है ।

अतः गन्ने निर्यात कर विदेशी मुद्रा अर्जित करने की प्रचुर सम्भावनायें है ।


गन्ने का आर्थिक महत्व


गन्ना एक शर्करायुक्त नकदी फसल (cash crop) है ।

गन्ने के रस में सुक्रोज (sucrose) 10 से 20% तथा जल लगभग 85% तक पाया जाता है ।


गन्ने के पौधों के विभिन्न भागों का उपयोग निम्न प्रकार किया जाता है -

  • गन्ने के पौधों से लगभग 60 से 70% तक रस की प्राप्ति होती है जिसमें लगभग 10% तक शर्करा पाई जाती है । इसका उपयोग विभिन्न चीनी मिलों में सफेद चीनी (white sugar) बनाने में किया जाता है ।
  • चीनी मिलों में गन्ने के पौधों से रस निकालने के पश्चात् शेष बचे हुये भाग खोई (Bagass) का प्रयोग विद्युत उत्पादन के लिये किया जाता है ।
  • चीनी मिलों में गन्ने के रस से चीनी बनाने के पश्चात् बचे अपशिष्ट पदार्थ शीरा (molasses) का उपयोग शराब बनाने में किया जाता है ।
  • चीनी मिलों में गन्ने के पौधों से निकली हुई मैली (pressmud) का उपयोग कार्बनिक खाद के निर्माण में किया जाता है जो लवणीय मृदाओं के सुधार में प्रयोग में लाई जाती है ।
  • खोई (Bagass) का उपयोग गत्ता एवं कागज उद्योग में भी किया जाता है ।
  • गन्ने के रस का उपयोग ग्रामीण स्तर पर लोगों द्वारा नाना प्रकार के स्थानीय उत्पाद - गुड़, शक्कर, खाण्ड व शीरा आदि बनाने में किया जाता ।
  • ग्रामीण स्तर पर गुड़, शर्करा एवं खाण्डसारी उद्योगों से ग्रामीण लोगों को पर्याप्त मात्रा में रोजगार की प्राप्ति होती है ।
  • गन्ने के पौधे का हरा भाग पशुओं के लिये एक स्वादिष्ट चारा होता है । 


गन्ने का उत्पत्ति स्थान एवं इतिहास


भारत में गन्ने की खेती (ganne ki kheti) प्राचीनकाल से ही की जा रही है ।

वैदिक साहित्य में गन्ने की खेती का वर्णन मिलता है ।

अतः भारत को ही गन्ने का उत्पत्ति स्थान माना जाता है ।

यहीं से इसका प्रचार एवं प्रसार विश्व के अन्य देशों जैसे - म्यांमार, श्रीलंका, मिस्र, चीन, मारीशस, फिलीपीन्स, थाइलैण्ड व अन्य अफ्रीका देशों को हुआ ।


गन्ने की फसल के लिए उपयुक्त भोगोलिक दशाएं लिखिए?


गन्ना विश्व के अनेक देशों की शर्करा उद्योग में प्रयोग की जाने वाली एक महत्वपूर्ण व्यापारिक फसल है ।

विश्व में लगभग 20 मिलियन हैक्टेयर क्षेत्रफल पर गन्ने की खेती (ganne ki kheti) की जाती है तथा इसका कुल उत्पादन लगभग 1200 मिलियन टन है ।

विश्व के गन्ना उत्पादक प्रमुख देशों में भारत, बाजील , चीन, क्यूबा व थाइलैण्ड आदि है ।

वर्तमान समय में विश्व में गन्ने की औसत उत्पादकता लगभग 700 क्विटल/हैक्टेयर है ।

भारत में गन्ने की खेती का क्षेत्रफल विश्व के कुल गन्ने के क्षेत्रफल का लगभग 24% है ।

यहाँ लगभग 5 मिलियन हैक्टेयर क्षेत्रफल पर गन्ने की खेती (ganne ki kheti) की जाती है ओर इसका उत्पादन लगभग 300 मिलियन टन है ।


गन्ने की खेती कहां होती है?


गन्ने की खेती भारत के लगभग सभी राज्यों में की जाती है ।

यहाँ का गन्ना उत्पादक प्रमुख राज्यों में उत्तर - प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदरेश, पंजाब , हरियाणा, व बिहार आदि है ।


गन्ने की खेती सबसे ज्यादा कहां होती है?


सम्पूर्ण भारत में गन्ने की औसत उत्पादकता लगभग 720 क्विटल/हैक्टेयर है ।

भारत के कुल गन्ने के क्षेत्रफल का तीन - चौथाई भाग उत्तरी भारत में है तथा यहाँ कुल उत्पादन का दो तिहाई गन्ना प्राप्त होता है ।

भारत के सम्पूर्ण 50% गन्ने का उत्पादन केवल उत्तर - प्रदेश राज्य में होता है ।

अत: भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में गन्ने की सबसे ज्यादा खेती की जाती है ।


गन्ने का वानस्पतिक विवरण


गन्ने का वानस्पतिक नाम Saccharum officinarum है । यह 'ग्रेमिनी' (Gramineae) कुल से सम्बन्धित है ।

इसका पौधा बहुवर्षीय (perennial) होता है ।

इसके पौधे की ऊँचाई लगभग 3 से 6 मीटर तक होती है । इसके पौधे में जड़े, तना, पत्तियाँ व पुष्पक्रम पाया जाता है ।

गन्ने का बोये जाने वाला भाग उसका बीज नहीं होता है । यह गन्ने के पौधे के तने का एक भाग होता है ।

इसके तने को काटकर कई भाग बनाये जाते है, इनमें से प्रत्येक पर 2-3 आँखें (eyes) पाई जाती है ।

इस भाग को भूमि में बोने पर इसमें से प्राथमिक जड़ें निकलने लगती हैं और बाद में इनसे द्वितीयक जड़ें विकसित होती हैं ।

गन्ने का तना पौधे का मुख्य भाग होता है ।

यह लम्बा, बेलनाकार, ठोस एवं सीधा बढ़ने वाला होता है ।

इसके रस में सुक्रोज पाई जाती है जो शर्करा के निर्माण में प्रयोग की जाती है ।

तने का ऊपरी भाग बुवाई के लिये सर्वोत्तम भारत होता है, क्योंकि इसमें अधिक आँखें पाई जाती हैं तथा इसमें अधिक अंकुरित होने की क्षमता होती है ।

तने पर लगने वाली पत्तियाँ हरी एवं एकान्तर क्रम में जुड़ी रहती है । इनकी संख्या 8 से 10 तक होती है ।


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गन्ने की खेती के लिए उचित
जलवायु


गन्ने की खेती (ganne ki kheti) शुष्क एवं शीतोष्ण जलवायु के क्षेत्रों में की जाती है ।

यह मूल रूप से एक शुष्क (tropical) एवं तर (humid) जलवायु की फसल है ।

उत्तरी भारत में गन्ना शरद एवं बसन्त ऋतुओं में बहुतायत में पाया जाता है ।

इसके अंकुरण के लिये 30-35°C तापमान उपयुक्त रहता तथा पौधे की वृद्धि एवं विकास के लिये 25-35°C तापमान अनुकूल रहता है ।

पौधों की उचित वृद्धि के लिये धूप वाले दिन अच्छे रहते हैं तथा तापमान उ रहने पर पौधों में कल्ले फूटने की प्रक्रिया मन्द होती है ।

600 से 1000 मिमी० वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में गन्ने की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है ।


गन्ने की खेती के लिए उपयुक्त भूमि


गन्ने की खेती (ganne ki kheti) के लिये उचित जल निकास वाली दोमट मृदा सर्वोत्तम रहती है ।

भारी दोमट भूमियों में भी इसकी अच्छी पैदावार ली जा सकती है, परन्तु खेत में जलभराव की स्थिति नहीं होनी चाहिये ।

मृदा का pH मान 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिये ।

अम्लीय व क्षारीय भूमियाँ गन्ने की खेती के लिये उपयुक्त नहीं होती है ।


भारत में शरदकालीन, बसंतकालीन एवं बिनौर गन्ने की खेती कैसे की जाती है?


उत्तरी भारत में गन्ना शरद एवं बसन्त ऋतुओं में उगाया जाता है ।

भारत में शर्करा निर्माण में प्रयोग में लाई जाने वाली यह मुख्य फसल है ।

देश की आर्थिक व्यवस्था को करने में गन्ने की खेती (ganne ki kheti) का महत्वपूर्ण स्थान है ।


गन्ने की उन्नत खेती के लिए भूमि का चुनाव कैसे करें?


गन्ने की खेती के लिये अच्छे जल निकास वाली दोमट मृदा सर्वोत्तम रहती है ।

इसके अतिरिक्त भारी दोमट भूमि पर भी गन्ने की अच्छी पैदावार ली जा सकती है ।

अम्लीय व क्षारीय मृदाओं में इसकी उपज अच्छी नहीं होती है ।

मृदा का pH मान 6.5 और 7.5 के बीच होना चाहिये ।

गन्ने की खेती (ganne ki kheti) हेतु ऐसे खेत का चुनाव करना चाहिये जिसमें पिछले वर्ष गन्ने की रोगी फसल नहीं रही हो ।


गन्ने की खेती के लिए भूमि की तैयारी कैसे करें?


गन्ने की फसल की बुवाई हेतु भूमि तैयार करने के लिये एक गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिये ।

दो - तीन बार हैरो चलाकर खेत की मिट्टी को भुरभुरी एवं बारीक बना लिया जाता है ।

तत्पश्चात् खेत की 5-6 बार जुताई की जाती है ।

बुवाई के समय खेत में पर्याप्त नमी का होना आवश्यक है ।

भूमि में नमी बनाये रखने के लिये जुताई के पश्चात् पाटा लगाना आवश्यक है ।


गन्ने की उन्नतशील प्रजातियां


गन्ने की शीघ्र पकने वाली, मध्यम व देरी से पकने वाली एवं अन्य विभिन्न परिस्थितियों में उगाने के लिये चुनाव हेतु अनेक जातियाँ उपलब्ध हैं ।

इनमें से अपनी आवश्यकता एवं स्थिति के जाति का चुनाव कर बुवाई की जानी चाहिये ।


( i ) शीघ्र पकने वाली जातियाँ -

  • CoS - 64
  • CoS - 687
  • CoS - 8436
  • CoJ - 64
  • CoP - 8421
  • CoS - 87216
  • CoS - 88230
  • CoS - 92254
  • CoS - 95255
  • CoS - 96258
  • CoS - 96260 तथा CoS - 90265 आदि ।


( ii ) मध्यम एवं देर से पकने वाली जातियाँ -

  • CoS - 767
  • CoS - 802
  • CoS - 7918
  • CoS - 8315
  • CoS - 8439
  • Colk - 8001
  • Colk - 8102
  • CoS - 85223
  • CoS - 87220
  • CoS - 90269
  • CoS - 93278
  • CoS - 61216
  • CoS - 93269
  • CoS - 94257
  • CoS - 94270
  • CoS - 94237
  • CoS - 94423
  • CoP - 84212 ।


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गन्ने की खेती कब की जाती है?

भारत में गन्ने की बुवाई शरद एवं बसन्त ऋतुओं में की जाती है ।


गन्ने की बुवाई का उपयुक्त समय -


( i ) शरदकालीन गन्ने की बुवाई का समय -

शरदकालीन गन्ने की बुवाई 15 सितम्बर से 15 अक्टूबर तक की जाती है ।


( ii ) बसन्तकालीन गन्ने की बुवाई का समय -

बसन्तकालीन गन्ने की बुवाई 15 फरवरी से 15 मार्च तक की जाती है ।


गन्ने की खेती के लिए बीज का चुनाव कैसे करें?


गन्ने की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिये शुद्ध, रोग व कीटरहित तथा प्रचुर मात्रा में खाद व पानी प्राप्त खेत से बीज का चुनाव करना चाहिये ।

गन्ने के ऊपरी भाग एक तिहाई भाग का अंकुरण अपेक्षाकृत अधिक होता है ।

अतः ऊपरी भाग के गन्ने को बुवाई हेतु चुनना चाहिये ।


गन्ने की बीज दर कितनी होती है?


एक हैक्टेयर गन्ने के खेत की बुवाई हेतु 2-3 आँखों वाले गन्ने के लगभग 40,000 टुकड़ों (setts) की आवश्यकता पड़ती है ।

इनकी मोटाई के आधार पर लगभग 50-60 क्विटल/हैक्टेयर बीज की आवश्यकता होती है ।

देरी से बुवाई करने पर बीज की मात्रा बढ़ाकर डेढ़ गुनी कर देनी चाहिये ।


गन्ने में बीजोपचार


सर्वप्रथम गन्ने के बीज को 50°C तापमान पर गर्म जल में 2 घण्टे या उष्ण वायु यन्त्र द्वारा 50°C ताप पर 3 घण्टे तक उपचारित करना चाहिये ।

तत्पश्चात् गन्ने के बीज को बुवाई से पूर्व किसी पारायुक्त रसायन जैसे - एगलाल की 500 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी में घोलकर 10 मिनट तक बीज को इससे उपचारित करना चाहिये ।

इसका 100 लीटर घोल 30 क्विटल बीज को उपचारित करने के लिये पर्याप्त रहता है ।


गन्ने की खेती के लिए भूमि का उपचार


भूमि में बीज को दीमक से बचाने के लिये बुवाई करते समय नालियों में 1.3% लिण्डेन डस्ट का प्रयोग करना चाहिये या गामा BHC (50 % a.i.) की 1 किग्रा० मात्रा प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिये ।


गन्ने को बुवाई की विधियाँ


गन्ने की फसल की बुवाई निम्न प्रमुख विधियों द्वारा की जाती है -


( i ) समतल खेत (Flat field) में बुवाई -

इस विधि में समतल खेत में हल या ट्रैक्टर द्वारा 60 से 90 सेमी. की दूरी पर आवश्यकतानुसार कूण्ड बनाये जाते है और इन कूण्डों में उपचारित बीज की बुवाई कर दी जाती है ।


( ii ) नालियों (Trenches) में बुवाई -

इस विधि में खेत में 60 से 90 सेमी की दूरी पर लगभग 20 सेमी. गहरी व 30 सेमी. चौड़ी नालियाँ बना ली जाती हैं और इनमें उपचारित बीज की बुवाई कर दी जाती है । इन्हीं नालियों में बीज के साथ खाद का प्रयोग भी किया जाता है ।


( iii ) दोहरी पंक्तियों में बुवाई (Double row planting) -

इस विधि में 90-30-90 सेमी० की दूरी पर खेत में पंक्तियाँ बनाकर गन्ने की बुवाई की जाती है । इस विधि से बुवाई करने पर प्रति इकाई क्षेत्रफल में पौधों की संख्या बढ़ जाती है । अधिक उर्वर भूमियों में इस विधि को अपनाने से लाभ रहता है ।


बुवाई की उपरोक्त विधियों में गन्ने के टुकड़ों की आँख से आँख मिलाकर (eye to eye arrangement) या सिरे से सिरा मिलाकर (end to end arrangement) बुवाई की जा सकती है ।

गन्ने की बुवाई पूर्व से पश्चिम की ओर बनी पंक्तियों में करने पर बरसात में गन्ने के गिरने की सम्भावना कम रहती है ।


गन्ने की बुवाई की गहराई


गन्ने के बीज के टुकड़ों को सामान्यतः 8-10 सेमी० की गहराई पर बोना चाहिये । हल्की भूमियों में गन्ने की बुवाई 20 से 25 सेमी. गहरी नालियों में करने से गन्ने के गिरने की सम्भावना कम हो जाती है ।


गन्ने की खेती में अपनाए जाने वाले फसल चक्र


बसन्तकालीन गन्ने की फसल रबी के मौसम में उगाई जाने वाली फसलों जैसे - गेहूँ, आलू, चना, सरसों व मटर आदि के साथ फसल चक्र में सम्मिलित की जा सकती है ।


गन्ने की खेती में कुछ मुख्य फसल चक्र निम्न प्रकार है -

( i ) मक्का - आलू; गन्ना (दो वर्षीय)

( ii ) मक्का - आलू ; गन्ना; पेडी (तीन वर्षीय)

( ii ) कपास - मेथी; गन्ना; पेडी (तीन वर्षीय)

( iv ) ज्वार - आलू; गन्ना; पेडी - मूंग (तीन वर्षीय)


गन्ने की खेती के साथ अन्तः फसलें उगाना


गन्ने की दो पंक्तियों के मध्य एक कम अवधि में उगने वाली फसल को पंक्तियों में उगाना गन्ने की अन्तरसस्यन या अन्तः फसली खेती कहलाता है ।

शरदकालीन गन्ने की खेती के साथ गेहूँ, आलू, मटर, सरसों, बरसीम, मसूर, शलजम, मूली व लहसुन आदि फसलों को अन्तः फसल के रूप में उगाया जा सकता है ।

 बसन्तकालीन गन्ने की  खेती के साथ मूंग, उर्द, लोबिया, सनई व लैंचा आदि फसलें अन्तः फसल के रूप में उगाई जा सकती है ।


गन्ने की खेती के लिए आवश्यक खाद एवं उर्वरक की मात्रा


गन्ने की फसल भूमि से पोषक तत्वों का भारी मात्रा में अवशोषण करती है । 

मृदा में पोषक तत्वों की सही जानकारी के लिये मृदा परीक्षण करना आवश्यक होता है ।

गन्ने की अच्छी फसल (800 क्विटल / हैक्टेयर) लेने के लिये 150 किग्रा० नाइट्रोजन, 80 किग्रा० फास्फोरस व 60 किग्रा० पोटाश प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिये ।

बुवाई के समय नाइट्रोजन की आधी मात्रा व फास्फोरस तथा पोटाश की सम्पूर्ण मात्रा का प्रयोग उचित रहता है ।

शेष नाइट्रोजन गन्ना बोने के दो माह बाद खड़ी फसल में टापड्रेसिंग (topdressing) के रूप में प्रयोग करना चाहिये ।


गन्ने में कोन सी खाद डालें?


मृदा में गन्ने की फसल की बुवाई से एक माह पूर्व 20 टन सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हैक्टेयर की दर से मिला देनी चाहिये ।


गन्ने की खेती के लिए आवश्यक सिंचाई


गन्ने की फसल के लिये लगभग 2500 मिमी. जल की आवश्यकता होती है ।

गन्ने की फसल के लिये कुल 6-8 सिंचाइयाँ पर्याप्त होती हैं ।

शरदकालीन मौसम में लगभग 3 सप्ताह और ग्रीष्मकालीन मौसम में लगभग दो सप्ताह के अन्तराल पर खेत में पानी लगाना आवश्यक होता है ।


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गन्ने की क्रान्तिक अवस्थायें कोन कोन सी होती है?


गन्ने की फसल में सिंचाई की निम्न क्रान्तिक अवस्थायें होती है -

1. कल्ले निकलने की अवस्था (बुवाई के 80-100 दिन पश्चात्)

2. बढ़वार की अवस्था (बुवाई के 1200-140 दिन पश्चात्) होती है ।


इन अवस्थाओं में भूमि में नमी बनाये रखने से पौधों की वृद्धि एवं उपज पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है ।

मई - जून के महीनों में गन्ने में कल्ले फूटने एवं बढ़वार की अवस्था में सिंचाई अवश्य करनी चाहिये ।


गन्ने की फसल में निराई - गुड़ाई


गन्ने की फसल में बुवाई के एक माह बाद पहली निराई कस्सी द्वारा करनी चाहिये ।

तत्पश्चात् 20 दिन के अन्तर पर लगभग 3 निराइयाँ की जाती है ।

ऐसा करने से खेत में उगने वाले खरपतवारों पर नियन्त्रण होता है व मृदा में पर्याप्त वायु संचार होता है ।

इस अवस्था में गन्ने की फसल में अधिक कल्ले फूटते हैं और उनकी बढ़वार अच्छी होती है ।


गन्ने में लगने वाले खरपतवार एवं नियन्त्रण कैसे करें?


1. शरदकालीन गन्ने की फसल में बथुआ, मोथा, हिरनखुरी, दूबघास व सत्यानाशी आदि खरपतवार पाये जाते है ।

2. बसन्तकालीन गन्ने की फसल में दूबघास, मटरी, मोथा व जंगली गोभी आदि खरपतवार पाये जाते है ।


गन्ने की दवा -


इन खरपतवारों को नष्ट करने के लिये - गन्ना बोने के तुरन्त बाद 2.5 किग्रा० एट्राजीन 1000 लीटर पानी में घोलकर एक हैक्टेयर खेत में छिड़काव करना चाहिये ।

इसके बाद 2,4 - D (80% सोडियम लवण) की 1.5 किग्रा० मात्रा को 1000 लीटर पानी में घोलकर एक हैक्टेयर खेत में बुवाई के 2 माह बाद छिड़काव करना चाहिये ।

तीसरा छिड़काव 2 लीटर ग्रामोक्सीन 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर बुवाई के 3 माह बाद करना चाहिये ।


गन्ने की फसल में लगने वाले कीट एवं रोगों से बचाव के उपाय


गन्ने की फसल के पौधों की वृद्धि एवं विकास अधिक होने पर कीटों एवं रोगों से संघर्ष करने की क्षमता बढ़ जाती है ।

गन्ने की फसल को बहुत से कीट एवं बीमारियाँ हानि पहुँचाते रहते है ।


गन्ने में लगने वाले प्रमुख रोग एवं गन्ने की दवा -


( a ) गन्ने में लगने वाले रोग एवं उनका नियन्त्रण -

गन्ने की फसल को हानि पहुँचाने वाले रोगों में लाल सड़न रोग, कण्ड रोग, उकठा रोग व लालधारी रोग आदि प्रमुख है ।


( i ) गन्ने का लालसड़न रोग ( Red rot of sugarcane ) -

इस बीमारी से ग्रस्त पौधों की पत्तियों के बीच में छोटे - छोटे धब्बे बन जाते हैं और ये धब्बे सम्पूर्ण पत्ती पर फैल जाते है, पत्तियाँ सूख जाती हैं एवं गूदा लाल रंग का दिखाई देता है ।

इस पर नियन्त्रण के लिये - रोगरोधी जातियों को उगाना चाहिये । स्वस्थ बीज बुवाई के लिये प्रयोग करना चाहिये व रोगग्रस्त फसल की पेड़ी नहीं रखनी चाहिये ।


( ii ) उकठा रोग ( Wilt disease ) -

इस रोग से ग्रसित पौधे आकार में छोटे रह जाते हैं तथा इनकी पत्तियाँ सूख जाती हैं । इन पौधों का गन्ना पीला पड़ जाता है ।

इस रोग पर नियन्त्रण के लिये - रोग प्रभावित खेत से बीज का चुनाव नहीं करना चाहिये । बुवाई से पूर्व बीज को 50°C पर गर्म पानी में 2 घण्टे पर शोधित करना चाहिये ।

इसके अतिरिक्त कैप्टाफ 50 W की 5 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर गन्ने के टुकड़ों को शोधित कर बुवाई करनी चाहिये ।


( iii ) गन्ने का लालधारी रोग ( Red strips of sugarcane ) -

इस रोग से प्रभावित गन्ने में लाल धारियाँ पड़ जाती हैं और पौधों की पत्तियाँ भी लाल हो जाती हैं ।

इस पर नियन्त्रण के लिये - रोगी पौधों को उखाड़कर जला देना चाहिये ।


( b ) गन्ने में लगने वाले कीट एवं उनका नियन्त्रण -

गन्ने की फसल को हानि पहुँचाने वाले कीटों की संख्या अन्य फसलों की तुलना में बहुत अधिक होती है ।

इनमें दीमक, तनाबेधक, चोटीबेधक, अंकुरबेधक, पायरिला, सफेद मक्खी व जड़बेधक आदि प्रमुख है ।


( i ) दीमक ( Termites ) -

वह गन्ने की आँखों को खा जाती है और जड़ों को भी खा जाती है जिससे पौधा सूख जाता है ।

इस पर नियन्त्रण करने के लिये - टेफाबान 20E की 2 लीटर मात्रा 1 हैक्टेयर खेत में सिंचाई जल के साथ प्रयोग करनी चाहिये ।


( ii ) पायरिला ( Pyrilla ) -

हल्के भूरे रंग का यह कीट पौधों की पत्तियों से रस चूसता रहता है जिससे पत्तियाँ पीली पड़कर सूख जाती हैं और पौधा मर जाता है ।

इस पर नियन्त्रण के लिये - रोगोर 30E की 1 लीटर मात्रा 1000 लीटर जल में मिलाकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिये ।


( iii ) तना बेधक ( Stem borer ) -

यह सूण्डी मिट्टी के रंग की होती है । यह तने के अन्दर घुसकर उसे अन्दर से खा जाती है और तना टूट जाता है जिससे सम्पूर्ण पौधा नष्ट हो जाता है ।

इस पर नियन्त्रण के लिये - मार्शल 250 की 5 मिली. मात्रा 1000 लीटर जल में घोलकर प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिये ।


( iv ) शीर्षबेधक ( Top borer ) -

यह सूण्डी पौधे की पत्तियों से प्रवेश कर पौधे के शीर्ष तक पहुँचकर उसे खा जाती है जिससे पौधे की शीर्ष बढ़वार रूक जाती है तथा आँखों से पार्श्व बढ़वार प्रारम्भ हो जाती है ।

इस पर नियन्त्रण के लिये - ग्रीष्मकाल में प्रभावित कल्लों पर सूण्डी के अण्डों को नष्ट करना चाहिये तथा फ्यूराडान 36 का छिड़काव आवश्यकतानुसार करना चाहिये ।


गन्ने में मिट्टी कब चढ़ाई जाती है?


गन्ने के पौधों की ऊँचाई सामान्यतः 3 से 6 मीटर तक होती है ।

वर्षा ऋतु में तेज हवाओं के कारण गन्ने के ऊँचे पौधे गिरने का भय बना रहता है ।

गन्ना गिर जाने से उसकी जड़ों की हानि होती है ।

जड़ों द्वारा जल व पोषण तत्वों का अवशोषण अवरूध हो जाता है ।

गन्ने की वृद्धि रूक जाती है तथा गन्ने की उपज व गुणवत्ता भी घट जाती है ।

अत: गन्ने को सीधा खड़ा रखने के लिये प्रत्येक पंक्ति के दोनों ओर जौलाई माह में मिट्टी चढ़ाई जाती है ।


गन्ने की बधाई कब एवं कैसे की जाती है?


मिट्टी चढ़ाने के बाद भी कभी - कभी हवायें तेज होने पर गन्ना गिर जाता है ।

अत: मिट्टी चढ़ाने के साथ - साथ गन्ने के पौधों को एक दूसरे के साथ उसी की पत्तियों से बाँधने का कार्य भी किया जाता है ।

पहली बार जब गन्ना 4-5 फीट का हो जाये तो जौलाई माह में वर्षा से पूर्व पहली बँधाई की जाती है ।

जब पौधे 6-7 फीट लम्बे हो जाए तो इन्हें दोबारा पत्तियों से अगस्त माह में बाँधा जाता है ।

सितम्बर माह में गन्नों की लम्बाई और अधिक हो जाती है ।

इस समय एक पंक्ति का एक थान व दूसरी पंक्ति के दो थानों को एक साथ त्रिकोणात्मक रूप में बाँधने का कार्य किया जाता है ।


गन्ने में पुष्प - विन्यास किसे कहते है?


गन्ने में पुष्प - विन्यास (arrowing in sugarcane)  - लगभग 10-11 महीने के बाद गन्ने में उसके पौधों में पुष्प - विन्यास (inflorescence) निकलता है, यह तीर (arrow) के आकार का होता है, इसके निकलने की क्रिया को पुष्प - विन्यास या एरोविंग (arrowing) कहते है ।


गन्ने की फसल कितने दिन में तैयार हो जाती है?


गन्ने की फसल जब लगभग 10-11 माह की हो जाती है, तो इस समय तक गन्ने के पौधों के तने व पत्तियाँ प्रायः पूर्ण लम्बे व विकसित हो चुके होते हैं ।

गन्ने की फसल में पुष्प आने के लगभग 50 दिन के भीतर गन्ने के फसल की कटाई कर लेनी चाहिये ।

पुष्प - विन्यास या एरोविंग (arrowing) में बीज बन जाने के बाद गन्ने के रस में शर्करा प्रतिशत घटने लगता है ।

अतः गन्ने की फसल की समय से कटाई पर ध्यान देना आवश्यक होता है ।


गन्ने की फसल की कटाई कब की जाती है?


गन्ने की फसल की कटाई पौधों के आकार, उनके भार, उनकी आयु, परिपक्वता, शर्करा प्रतिशत, प्रजाति व बुवाई का समय ध्यान में रखकर की जाती है ।

गन्ने के रस की हैण्ड रिफ्रेक्टोमीटर की रीडिंग जब 18 पर पहुँच जाये तो गन्ना कटाई के योग्य हो जाता है ।

गन्ना काटकर उसके पौधों की सफाई कर उसके बण्डल बाँध लिये जाते है ।


गन्ने की फसल से कमाई एवं गन्ने की प्राप्त उपज


उत्तरी भारत में गन्ने की खेती (ganne ki kheti) करने से प्राप्त करने से प्राप्त उपज लगभग  400-500 क्विटल/
हैक्टेयर तक होती है ।

अनुकूल अवस्था एवं उन्नतिशील प्रजातियों एवं सस्य तकनीकों को अपनाने पर उपज 800 क्विटल/हैक्टेयर तक भी प्राप्त हो जाती ।


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गन्ने की नर्सरी कैसे बनाएं?


गन्ने की प्रजातियां
गन्ने की प्रजातियां
गन्ने में फुटाव की दवा
गन्ने की खेती से कमाई
गन्ने की दवा
गन्ने की खेती सबसे ज्यादा कहां होती है
शरदकालीन गन्ने की खेती
गन्ना भारत की कौन सी फसल है
गन्ने.की वैज्ञानिक खेती
बसंत कालीन गन्ने की खेती


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