सोयाबीन की खेती कैसे होती है | soyabean ki kheti kaise hoti hai | Farming Study

Farming Study
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भारत में सोयाबीन की खेती (soyabean ki kheti) सर्वप्रथम सन् 1875 में की गई । यह प्रोटीन का प्रमुख स्रोत होने के कारण अन्य परंपरागत दलहनी फसलों की तुलना में अत्याधिक लोकप्रिय होती चली गई ।

वर्तमान समय में सोयाबीन की खेती (soyabean ki kheti) दलहन वर्ग की सबसे महत्वपूर्ण खेती में से एक है ।

विश्व के विभिन्न देशों में विभिन्न खाद्य पदार्थों एवं उद्योगों मैं बहुतायत उपयोगी होने के कारण सोयाबीन को आश्चर्यजनक फसल (wonderful crop) भी कहा जाता है ।

  • सोयाबीन का वनस्पतिक नाम (Botanical name) - ग्लाइसिन मैक्सा (Glycine max L.)
  • कुल (Family) - लेग्यूमिनेसी (Leguminoceae)
  • गुणसूत्र संख्या (Chromosose) -


सोयाबीन की खेती कैसे होती है | soyabean ki kheti kaise hoti hai

सोयाबीन की खेती (soyabean ki kheti) विश्व की सबसे प्रमुख एवं सर्वाधिक उत्पादन देने वाली लगभग (150 मिलियन टन) तिलहनी फसल है ।

भारत में सोयाबीन उत्पादन लगभग 6 मिलियन टन प्रतिवर्ष है । भारत का विश्व में इसके उत्पादन में अमेरिका, ब्राजील, चीन व अर्जेण्टाइना के बाद पाँचवा स्थान है । सोयाबीन के दानों में 40-44 प्रोटीन, 20% वसा, 17% कार्बोहाइड्रेट, रेशा 4%, खनिज लवण 5% तथा शेष जल पाया जाता है । इसमें पर्याप्त मात्रा में फास्फोरस, आयरन तथा विटामिन्स पाये जाते हैं । इसके अतिरिक्त इसमें 20-22% तक तेल भी पाया जाता है ।

सोयाबीन में पाये जाने वाला प्रोटीन शाकाहारी मनुष्यों के लिये सबसे सस्ता व उत्तम प्रोटीन है । इसकी प्रोटीन खाद्यान्न फसलों की तुलना में अधिक सन्तुलित व सुपाच्य होती है । इसमें आवश्यक अमीनों अम्ल भी पाये जाते हैं ।

भारतीय लोगों के प्रायः शाकाहारी होने के कारण अधिकतर उनके भोजन में प्रोटीन की कमी पाई जाती है । प्रोटीन पोषण की इस कमी की सोयाबीन लेने से पूर्ति की जा सकती है । प्रतिदिन 50 ग्राम तक सोयाबीन का भोजन में प्रयोग करने से एक मनुष्य स्वस्थ एव चुस्त रहता है ।

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यूरोपीय देशों में लोग जहाँ प्रोटीन की पूर्ति के लिये माँस एवं डबलरोटी (meat and bread) को पसन्द करते हैं, वहीं एशियाई लोग प्रोटीन पूर्ति के लिये खाद्यान्न फसलों तथा सोयाबीन पर निर्भर करते हैं ।

चीन के लोग इसे पवित्र अनाजों की श्रेणी में रखते हैं और इसकी पूजा भी करते हैं । सोयाबीन को भोजन में प्रयोग करने के लिये भारत के बाजार में इसके विभिन्न उत्पाद जैसे सोया दूध, सोया दही, सोया पनीर, सोया आटा, सोया नमकीन, सोया बिस्किट, सोया दाल, सोया बर्फी, सोया खीर, सोया लड्डू, आदि बनाकर बेचे जाते हैं और ये सभी उत्पाद जनता में बहुतायत से प्रचलित है ।


सोयाबीन का उत्पत्ति स्थान एवं इतिहास -

सोयाबीन की उत्पत्ति स्थल के बारे में इतिहासकारों के भिन्न - भिन्न मत हैं । पौराणिक ग्रन्थों के अध्ययन से पता चलता है कि सोयाबीन चीन तथा सुदूर पूर्वीय देशों के निवासियों के भोजन का एक मुख्य अंग रहा है ।

चीन में प्राचीनकाल से ही सोयाबीन की खेती (soyabean ki kheti) की जाती है तथा इसके महत्व को समझते हुये यहाँ के लोग इसको पूजनीय मानते हैं । प्राकृतिक रूप से आज भी चीन में इसके पौधे उगे हुये पाये जाते हैं ।

अतः ऐसा प्रतीत होता है कि चीन ही इस आश्चर्यजनक फसल का उत्पत्ति स्थान रहा है । चीन से ही इसका प्रचार एवं प्रसार विश्व के अन्य देशों तथा भारत में हुआ । भारत में सोयाबीन की खेती (soyabean ki kheti) के इतिहास के बारे में कोई निश्चित प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं ।


सोयाबीन का भौगोलिक वितरण -

सोयाबीन विश्व की सबसे प्रमुख तथा अधिक उगाई जाने वाली तिलहनी फसल है । यह विश्व में लगभग 68 मिलियन हैक्टेयर पर उगाई जाती है और इसका कुल उत्पादन लगभग 150 मिलियन टन है । सोयाबीन का उत्पादन करने वाले देशों में अमेरिका, ब्राजील, चीन, अर्जेण्टाइना और भारत है । यहीं पर विश्व की लगभग सम्पूर्ण सोयाबीन का उत्पादन होता है ।

भारत का विश्व में सोयाबीन उत्पादन में पाँचवा स्थान है । यहाँ लगभग 6 मिलियन हैक्टेयर क्षेत्रफल पर सोयाबीन की खेती (soyabean ki kheti) की जाती है और इसका वार्षिक उत्पादन 6 मिलियन टन है ।

भारत में सोयाबीन की खेती करने वाले प्रमुख राज्यों में मध्यप्रदेश का प्रथम स्थान है । इस राज्य में अधिक क्षेत्रफल होने का कारण यहाँ पर सरकार द्वारा स्थापित सोयाबीन आधारित विभिन्न औद्योगिक इकाइयाँ हैं । इसके अतिरिक्त अन्य राज्यों में महाराष्ट्र , राजस्थान , उत्तरांचल , हिमाचल प्रदेश व उत्तर प्रदेश आदि हैं ।


सोयाबीन का वानस्पतिक विवरण -

सोयाबीन का वनस्पतिक नाम ग्लाइसिन मैक्सा (Glycine max L.) है और यह लेग्यूमिनेसी (Leguminoceae) कुल से संबंधित है ।

सोयाबीन का पौधा एकवर्षीय झाड़ीदार पौधा है । खरीफ एवं बसन्त दोनों मौसमों में इसकी खेती की जाती है । इसके पौधे की ऊँचाई एक फीट से अधिक होती है । पौधों की जड़ें 3-4 फीट गहराई तक भूमि में चली जाती है । इसकी जड़ों में दलहनी फसल होने के कारण गाँठें (nodules) पाई जाती हैं । इन गाँठों में 'राइजोबियम जैपोनिकम' जीवाणु वायुमण्डल की नाइट्रोजन को संचित करने का कार्य करते हैं । इसके पौधे में तना, पत्तियाँ, फलियाँ व फलियों पर रोयें और बीज पाये जाते हैं ।


सोयाबीन की खेती का आर्थिक महत्व -


सोयाबीन का आर्थिक महत्व एवं उपयोग निम्नलिखित हैं -

  • सोयाबीन के दानों का दाल के रूप में भोजन में प्रयोग किया जाता है ।
  • इसके हरे पौधे का उपयोग चारे के रूप में तथा सुखाकर हे व साइलेज (hay & silage) के रूप में किया जाता है ।
  • इसकी खली पशुओं को राशन के रूप में खिलाई जाती है । खली का प्रयोग फसलों की उपज बढ़ाने के लिये खाद के रूप में भी किया जाता है ।
  • सोयाबीन से उत्तम, सस्ता व सुपाच्य एवं गुणवत्तायुक्त प्रोटीन प्राप्त होता है ।
  • इसके आटे से चपाती, दूध, मिठाइयाँ बिस्किट व नमकीन आदि बनाये जाते हैं ।
  • सोयाबीन में 20-22% तक तेल पाया जाता है । इससे वनस्पति तेल भी बनाया जाता है ।
  • सोयाबीन से बच्चों के लिये उच्च गुणवत्तायुक्त प्रोटीन वाले आहार तैयार किये जाते हैं ।
  • एन्टीबायोटिक (antibiotic) दवाइयाँ बनाने में प्रयोग होता है ।
  • इसके पौधे की जड़ों में पाये जाने वाली गाँठों में जीवाणु सक्रिय रहते हैं जो वायुमण्डल की नाइट्रोजन को जड़ों में स्थिर करने का कार्य करते हैं । इसके अतिरिक्त पौधों की पत्तियाँ सूखकर गिरने के पश्चात् भूमि की उर्वरता में वृद्धि करती है ।
  • धान्य फसलों के विकल्प के रूप में यह फसल लाभकारी है
  • वनस्पति घी बनाने का यह एक प्रमुख स्रोत है ।


सोयाबीन की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु एवं भूमि –

सोयाबीन के पौधे के लिये गर्म व नम जलवायु की आवश्यकता होती है इसीलिये इसे वर्षा ऋतु में उगाया जाता है । इस फसल को उगाने का समय जून से अक्टूबर तक होता है । इसके बीज के अंकुरण के लिये से 15-18°C तापमान उपयुक्त रहता है । वृद्धि के लिये 30-35°C तक का तापमान उपयुक्त होता है । 40°C से अधिक तापमान होने पर फसल की वृद्धि रूकने लगती है । सोयाबीन ऊँचाई के पौधे के फूलने, फलने तथा उपज पर सूर्य की धूप का भी महत्वपूर्ण प्रभाव रहता है । दिन बड़े होने पर पौधे की और पौधे की जड़ों में पाये जाने वाली गाँठों की संख्या बढ़ जाती है । इसके पौधे के लिये 600-700 मिमी० वर्षा उपयुक्त रहती है । कम वर्षा वाले स्थानों पर सिंचाई की अच्छी व्यवस्था होनी आवश्यक है । फलियों के पकने के समय वर्षा का होना हानिकारक रहता है । समुद्रतल से 1200-2000 मीटर की ऊँचाई तक सोयाबीन की खेती (soyabean ki kheti) की जा सकती है ।

सोयाबीन की खेती के लिये बुलई दोमट भूमि सबसे उपयुक्त रहती है । भूमि का pH मान 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिये । भूमि में जल निकास की उचित व्यवस्था का होना आवयक है क्योंकि सोयाबीन का पौधा कुछ सीमा तक सूखे का सहन कर लेता है लेकिन भूमि में अधिक जल इसके लिये हानिकारक है ।


उत्तरी भारत में सोयाबीन की वैज्ञानिक खेती के लिये अपनाई जाने वाली सस्य तकनीकों

उत्तरी भारत की वर्षा ऋतु की गर्म एवं नम जलवायु में उगाये जाने वाली सोयाबीन की आश्चर्यजनक फसल के लिये बलुई दोमट मिट्टी सबसे अधिक उपयुक्त होती है । सोयाबीन की खेती (soyabean ki kheti) के लिये निम्न सस्य तकनीकें अपनानी चाहियें -


सोयाबीन की खेती के लिए भूमि का चुनाव -

सोयाबीन की फसल के लिये बलुई दोमट मिट्टी अच्छी मानी जाती है । भूमि का pH का मान 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिये व भूमि में जल निकास की व्यवस्था अच्छी होनी चाहिये ।


सोयाबीन की खेती के लिए भूमि की तैयारी -

रबी की फसल की कटाई के पश्चात् खेत की एक गहरी जुताई करनी चाहिये । इसके पश्चात् 2-3 जुताइयाँ या हैरो चलाकर खेत की मिट्टी को भुरभुरी एवं बारीक कर लेना चाहिये ।


सोयाबीन की खेती के लिए भूमि का समतल करना -

सोयाबीन की खेती (soyabean ki kheti) के लिये खेत का समतल होना बहुत ही आवश्यक है । खेत समतल न होने पर वर्षा का पानी खेत में रूकने लगता है जो पौधों के लिये हानिकारक रहता है ।


सोयाबीन की खेती में फसल चक्र -

सोयाबीन की फसल उगाने के लिये विभिन्न फसलों के साथ इसको फसल चक्रों में सम्मिलित किया जाता है ।

सोयाबीन में प्रमुख फसल चक्र निम्न प्रकार हैं -

  • सोयाबीन - गेहूँ
  • सोयाबीन जौं
  • सोयाबीन - चना
  • सोयाबीन - आलू - मक्का आदि ।


सोयाबीन में मिलवाँ खेती -

खेतों में खरपतवारों की बाहुलता होने पर उसमें सोयाबीन की मिलवा खेती करनी चाहिये ।

मिलवाँ खेती के कुछ प्रमुख उदाहरण इस प्रकार हैं -

  • मक्का + सोयाबीन
  • ज्वार + सोयाबीन
  • बाजरा + सोयाबीन
  • कपास + सोयाबीन आदि ।


सोयाबीन की खेती के लिए उपयुक्त जाति का चुनाव -


सोयाबीन की विभिन्न क्षेत्रों के लिये संस्तुत की गई प्रमुख जातियाँ निम्न प्रकार हैं -

अंकुर, गौरव, शिवालिक, Hardy, Bragg, lee, दुर्गा, मोनेटा, पूसा-16, पूसा - 20, पूसा-24, पूसा-27, पूसा-40, बीरसा, ADT-1, JS-2, MACS-13, VL soy तथा जवाहर आदि ।


सोयाबीन की बुवाई –

सोयाबीन की बुवाई खरीफ व बसन्त ऋतुओं में की जाती है ।


सोयाबीन की बुवाई का समय -

बसन्त ऋतु की फसल की बुवाई 15 फरवरी से 15 मार्च तथा खरीफ ऋतु की बुवाई 15 जून से 15 जौलाई तक करनी चाहिये ।


सोयाबीन की बुवाई की विधियाँ -

दाने के लिये बोई गई फसल की बुवाई पंक्तियों में की जाती है । इसके लिये हल के पीछे पंक्तियों में बुवाई की जा सकती है । चारे की फसल के लिये बुवाई की छिटकवाँ विधि अपनाई जाती है ।


सोयाबीन में बीजोपचार -

सोयाबीन एक दलहनी फसल है । इसके पौधों की जड़ों में गाँठें बनती हैं । इन गाँठो में जीवाणु सक्रिय रहते हैं जो वायुमण्डल की नाइट्रोजन को पौधे की जड़ों में संचित करते हैं । इससे भूमि की उर्वरा शक्ति में वृद्धि होती है । इन जीवाणुओं की सक्रियता एव संख्या को बढ़ाने के लिये बीज की बुवाई के समय ही बीज को कल्चर (culture) से उपचारित करके बोना चाहिये । कल्चर का एक पैकिट 250 ग्राम फसल के 10 किग्रा० बीज को उपचारित करने के लिये पर्याप्त रहता है ।


सोयाबीन में अन्तरण -

खरीफ ऋतु की फसल के लिये पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45-60 सेमी० तक रखनी चाहिये व पौधे से पौधे की दूरी 5 सेमी ० तक रखनी चाहिये । बसन्त ऋतु की फसल में अन्तरण कम रखा जाता है और यह 30-45 सेमी ० पंक्ति से पंक्ति के बीच रखा जाता है ।


सोयाबीन की बुवाई की गहराई -

सोयाबीन की बीज की बुवाई 2-4 सेमी० गहराई पर की जाती है । इससे अधिक गहराई पर बुवाई करने से बीज के अंकुरण पर प्रत्यक्ष रूप से प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ।


सोयाबीन की बीज दर -

दाने की फसल के लिये 20-30 किग्रा०/हैक्टेयर बीज की मात्रा पर्याप्त होती है । बसन्त व ग्रीष्मकालीन चारे की फसल के लिये 100 किग्रा/हैक्टेयर की दर से बुवाई करनी चाहिये । खरीफ ऋतु में चारे की फसल के लिये 70 किग्रा/हैक्टेयर बीज पर्याप्त रहता है ।


सोयाबीन की खेती में पौधों की संख्या -

एक हैक्टेयर खेत में 5 लाख पौधों के लगभग संख्या होती है ।


सोयाबीन की खेती में उर्वरकों का प्रयोग -

यह एक दलहनी फसल होने के कारण इसका पौधा अपनी पोषक तत्वों सम्बन्धी मात्रा को भूमि, उर्वरक व वायुमण्डल ग्रहण करता है एक हैक्टेयर खेत में 60-80 किग्रा० नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है । त्रारम्भिक अवस्था में ही पौधों की नाइट्रोजन की माँग बढ़ने लगती है । फास्फोरस की मात्रा भी 60-80 किग्रा/हैक्टेयर प्रयोग की जा सकती है । इसके प्रयोग से पौधों की जड़ों का अधिक फैलाव होता है व जड़ों में गाँठें भी अधिक बनती हैं । गाँठें अधिक बनने पर वायुमण्डल की नाइट्रोजन भी पौधों की जड़ों में अधिक मात्रा में संचित होती हैं । पोटाश का प्रयोग भूमि परीक्षण के पश्चात् ही करना चाहिये । यदि भूमि परीक्षण की सुविधा उपलब्ध नहीं है 40-60 किमा० पोटाश प्रति हैक्टेयर की दर से बुवाई के समय ही फास्फोरस के साथ प्रयोग करनी चाहिये । नाइट्रोजन की आधी मात्रा बुवाई के समय व आधी बुवाई के 30 दिन बाद प्रयोग करनी चाहिये । इस फसल की अच्छी पैदावार लेने के लिये भूमि में कैल्शियम व सल्फर का प्रयोग भी आवश्यक है ।


सोयाबीन की खेती में सिंचाई –

सोयाबीन की फसल खरीफ ऋतु में उगाई जाती है । अत: फसल के लिये वर्षा जल से ही पूर्ति हो जाती है परन्तु वर्षा न होने पर इस फसल को 5-6 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है । असिंचित क्षेत्रों में भी फसल को यही जलमाँग होती है । उस फसल में सिंचाई जल की क्रान्तिक अवस्थायें बीजांकुरण (sprouting) अवस्था, फूल आने की अवस्था (lowering stage), फलियाँ बनने की अवस्था (pod formation stage) व दाना बनने की अवस्था (grain formation stage) होती हैं । इन अवस्थाओं में भूमि में नमी का बनाये रखना अति आवश्यक है ।


सोयाबीन की खेती निराई-गुड़ाई -

फसल की बुवाई से ही खरपतवार खेत में पनपने लगते हैं । अतः बुवाई के 20-25 दिन बाद पहली निराई करनी चाहिये । दूसरी निराई बुवाई के 40-45 दिनों पश्चात् करने से खरपतवारों पर नियन्त्रण पाया जाता है ।


सोयाबीन की खेती रासायनिक खरपतवार नियन्त्रण -

खुरपी की सहायता से दो निराइयाँ करने के पश्चात् खरपतवारनाशियों का प्रयोग भी लाभकारी रहता है । Vernolate खरपतवारनाशी की 2 किग्रा० मात्रा प्रति हैक्टेयर बुवाई से पूर्व (preplanting) प्रयोग करने से खरपतवारों को नष्ट किया जा सकता है । इसके अतिरिक्त Chloroxron रसायन की 1 किग्रा ० मात्रा 1 हैक्टेयर खेत में प्रयोग करने से खरपतवारों को समाप्त किया जा सकता है ।


सोयाबीन की खेती में पादप सुरक्षा -

पौधे का स्वास्थ्य अच्छा होने पर इसकी कीटों व रोगों से संघर्ष करने की क्षमता बढ़ जाती है । सोयाबीन की फसल को बहुत से कीट व बीमारियाँ हानि पहुँचाते रहते हैं ।


इनका संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है -

( A ) कीट एवं उनका नियन्त्रण -

सोयाबीन की फसल को हानि पहुँचाने वाले कीटों में बिहार रोमिल सूण्डी (bihar hairy caterpillar), सफेद मक्खी (white fly) व एफ्रिड (aphid) प्रमुख है -

  • बिहार रोमिल सूण्डी - यह सूण्डी रोयें वाली होती है और पौधे की पत्तियाँ खाती रहती है । इसके नियन्त्रण के लिये 10% BHC का प्रयोग करना चाहिये ।
  • सफेद मक्खी — यह मक्खी पौधों का रस चूसती रहती है । इस मक्खी से पौधों में वायरल रोग फैल जाता है । इसके नियन्त्रण के लिये मेटासिस्टॉक्स 25 EC का प्रयोग करना चाहिये ।
  • एफ़िड - यह पौधों की पत्तियों का रस चूसने वाले कीड़े होते हैं । इनको रोकने के लिये मैलाथियान 50 EC का प्रयोग लाभकारी रहता है ।


( B ) बीमारियाँ एवं उनका नियन्त्रण -

सोयाबीन की फसल में लगने वाली बीमारियों में पीला मोजेक व सोयाबीन मोजेक प्रमुख हैं -

  • पीला मोजेक - इस रोग के प्रभाव में पौधों की पत्तियों के किनारे पीले पड़ जाते हैं । इस रोग की वाहक सफेद मक्खी होती है । नियन्त्रण के लिये 0.1% थायराम का प्रयोग उचित है ।
  • सोयाबीन मोजेक - इस रोग के प्रकोप से पौधे की पत्तियाँ पतली होकर टेढ़ी - मेढ़ी हो जाती हैं और मुड़ने लगती हैं । इस अवस्था में पौधों की वृद्धि रूक जाती है । इसकी रोकथाम के लिये रोगरोधी जातियों को उगाना चाहिये व रोगग्रस्त पौधे उखाड़कर जला देना चाहिये ।


सोयाबीन की खेती की कटाई -

सोयाबीन की जल्दी पकने वाली जातियाँ बुवाई के 90-120 दिन पश्चात् कटाई के लिये पककर तैयार हो जाती है । देरी से पकने वाली जातियाँ कटाई के लिये 140-150 दिन में तैयार होती है ।

कटाई में विलम्ब करने से फलियाँ फटने लगती है और दाने बिखरने लगते हैं जिससे उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ।


सोयाबीन की उपज -

सोयाबीन की एक हैक्टेयर फसल से अधिकतम 25-30 क्विटल तक उपज प्राप्त हो जाती है ।


सोयाबीन का उत्पादन बढ़ाने के उपाय -

सोयाबीन का खाद्य, पोषण एवं औद्योगिक महत्व को दृष्टिगत रखते हुये इसका उत्पादन बढ़ाया जा सकता है ।


सोयाबीन का उत्पादन बढ़ाने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाये जा सकते हैं —

  • अधिक उपज देने वाली जातियों (HYV) को उगाना ।
  • उचित सस्य उपाय अपनाकर, जैसे — बुवाई की विधि एवं अन्तरण आदि ।
  • उचित जल प्रबन्धन द्वारा खेत में उपयुक्त नमी बनाये रखकर ।
  • बीजोपचार के लिये कल्चर का प्रयोग आवश्यक है ।
  • ऊर्वरकों की उपयुक्त मात्रा का प्रयोग करना चाहिये ।
  • रसायनों द्वारा पौधों की सुरक्षा कीटों व बीमारियों से करनी चाहिये ।
  • फलियों के फटने से पूर्व फसल की कटाई कर लेनी चाहिये ।


क्या सोयाबीन परम्परागत दलहनी फसलों का विकल्प है?

यह अन्य परम्परागत दलहनी फसलों जैसे उर्द, मूँग, अरहर आदि का एक अच्छा विकल्प है जो निम्नलिखित बिन्दुओं से स्पष्ट है -

  • अन्य दलहनी फसलों की तुलना में सोयाबीन की उपज अधिक होती है । दलहनी फसलों की उपज 10-15 क्विटल/हैक्टेयर तक होती है जबकि सोयाबीन की उपज 25-30 हैक्टेयर तक हो जाती है
  • सोयाबीन में 40-44% प्रोटीन, 20-22% तेल व 20% वसा होती है । अतः सोयाबीन का पोषण मूल्य (nutrition value) अन्य दलहनी फसलों की तुलना में कहीं अधिक है ।
  • अन्य दालों की तुलना में सोयाबीन का प्रयोग अनेक प्रकार से किया जा सकता है । इसके विभिन्न उत्पादों की श्रेणी में सोया दूध, सोया आटा, सोयाखली, सोया टोफू, सोया बिस्किट, सोया नमकीन, सोया दही, सोया पनीर, सोया बर्फी, सोया खीर, सोया हलवा, सोया गुलाब जामुन, सोया शिशु आहार, सोया इडली तथा सोया ढोकला आदि सम्मिलित हैं ।
  • सोयाबीन की खेती मिश्रित फसल के रूप में सफलतापूर्वक की जा सकती है उदाहरण — मक्का + सोयाबीन ।
  • सोयाबीन की फसल कुछ मात्रा तक सूखे व नमी को सहन कर लेती है । इसी कारण से अनियमित वर्षा होने पर भी फसल की सफलतापूर्वक खेती की जा सकती है जबकि अन्य दलहनी फसलों में ऐसा सम्भव नहीं है ।
  • सोयाबीन अन्य दलहनी फसलों की तुलना में एक अच्छी हरी खाद के रूप में प्रयोग की जा सकती है ।

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