लोबिया की खेती कैसे करें | lobiya ki kheti kaise kare | Farming Study

भारत में लोबिया की खेती (lobiya ki kheti) चारे या दाने के उद्देश्य से मुख्यतः खरीफ के मौसम में की जाती है ।

उत्तरी भारत में लोबिया की फसल ग्रीष्म व वर्षा ऋतुओं में उगाई जाती है जबकि दक्षिणी भारत में लोबिया की खेती (lobiya ki kheti) रबी के मौसम में की जाती है ।

  • लोबिया का वनस्पतिक नाम (Botanical name) - विगना साइनेंसिस (Vigna sinensis L.)
  • कुल (Family) - लेग्यूमिनेसी (Leguminoceae)
  • गुणसूत्र संख्या (Chromosose) - 


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लोबिया की खेती का उत्पत्ति स्थान एवं इतिहास -

लोबिया के उत्पत्ति स्थान के बारे में इतिहासकारों के विभिन्न मत प्रचलित हैं, परन्तु लोबिया के पौधे की विभिन्न जंगली किस्में अफ्रीका महाद्वीप में सर्वप्रथम देखने को मिली ।

ऐसा प्रतीत होता है कि अफ्रीका ही लोबिया की फसल का जन्म स्थान रहा है और यहीं से इस फसल का प्रचार एवं प्रसार विश्व के अन्य देशों को हुआ है ।


लोबिया की खेती का भौगोलिक वितरण -

लोबिया की खेती (lobiya ki kheti) अफ्रीका, अमेरिका, यूरोप, आस्ट्रेलिया व भारतीय उपमहाद्वीप में की जाती है । इस फसल के अन्तर्गत विश्व के कुल क्षेत्र एवं उत्पादन का लगभग 85% अकेले अफ्रीका महाद्वीप में स्थित है । यहाँ पर लोबिया की खेती (lobiya ki kheti) प्राचीनकाल से ही होती चली आ रही है ।

भारत में लोबिया की खेती (lobiya ki kheti) लगभग सभी राज्यों में की जाती है । उत्तरी भारत में लोबिया खरीफ मौसम में व दक्षिणी भारत में रबी के मौसम में उगाया जाता है । भारत में लोबिया की खेती करने वाले राज्यों में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हिमाचल प्रदेश व हरियाणा आदि हैं ।


लोबिया का वानस्पतिक विवरण -

लोबिया एक दहलन वर्ग (pulse group) की फसल है । इसका पौधा एकवर्षीय जीवन चक्र वाला शाकीय होता है । इसके पौधे की यह एक प्रमुख विशेषता है कि यह भूमि की सतह पर फैलकर चलता है जिससे यह भूमि सतह के लिए एक आवरण का कार्य करती है । इससे भूमि जल अथवा वायु क्षरण से सुरक्षित होती है । इसी कारण से इसे एक 'आवरण फसल' (cover crop) फसल' (cover crop) भी कहा जाता है ।

इसके पौधे का जड़तन्त्र मूसला जड़ोंयुक्त (tap root system) होता है । जड़ों में प्रन्थियाँ पाई जाती हैं जिनमें वायुमण्डल की नाइट्रोजन को स्थिर करने वाले जीवाणु पाये जाते हैं । इसकी पत्तियाँ गहरे हरे रंग की होती हैं । फूल सफेद, पीले अथवा बैंगनी रंग के होते हैं । पौधों पर लगने वाली फलियाँ गुच्छों में पाई जाती हैं । इन फलियों में दाने पाये जाते हैं जो पकने पर दाल के रूप में उपयोग में आते हैं ।


लोबिया की खेती का आर्थिक महत्व एवं उपयोग -

लोबिया खरीफ के मौसम में उगाई जाने वाली एक दलहनी फसल है । यद्यपि यह मुख्य रूप से चारे के लिए उगाई जाती है अन्य अनेक रूपों में इसका उपयोग किया जाता है ।

लोबिया की फसल का उपयोग -

इसके दानों प्रोटीन की मात्रा अन्य दालों की तुलना में (सोयाबीन को छोड़कर) अधिक होती है तथा इसमें अन्य अनेक पोषक तत्व जैसे आयरन व कैल्शियम भी बहुत मात्रा में पाये जाते हैं । इसी कारण इसे सब्जी माँस (vegetable meat) कहा जाता है ।

लोबिया एक बहुपयोगी फसल है इसके विभिन्न उपयोग निम्नलिखित हैं —

  • भोजन में इसका दाल के रूप में प्रयोग किया जाता है । इसके दानों में प्रोटीन 25%, कार्बोहाइड्रेट 4%, वसा 2%, रेशा 3% व जल लगभग 10% तक पाया जाता है ।
  • लोबिया की फलियाँ हरी सब्जी के रूप में भी प्रयोग की जाती हैं ।
  • लोबिया की फसल मुख्यतः हरे चारे के लिए उगाई जाती है । इसके चारे से पशुओं के लिए हे व साइलेज (hay & silage) भी तैयार किया जाता है ।
  • हरी खाद के रूप में प्रयोग करने के लिए भी लोबिया की खेती की जाती है । इसके प्रयोग से मृदा के भौतिक गुणों में सुधार होता है ।
  • यह एक दलहनी फसल होने के कारण भूमि में नाइट्रोजन संचित करने का कार्य करती है । लोबिया की फसल एक हैक्टेयर खेत में 100 किमा० तक नाइट्रोजन स्थिर कर सकती है ।
  • लोबिया का पौधा भूमि की सतह को ढकने का कार्य करता है जिससे समस्या ग्रस्त क्षेत्रों में भूमि को इसकी फसल जल व वायु क्षरण से बचाती है ।
  • लोबिया का पौधा सूखे के प्रति सहनशील होता है और इसकी जलमाँग कम होती है ।
  • लोबिया की फसल अल्प अवधि की फसल (short duration crop) है । यह तेजी से वृद्धि करती है और केवल दो माह में कटाई के लिए पककर तैयार हो जाती है ।


लोबिया की खेती के लिए उपर्युक्त जलवायु -

लोबिया गर्म व नम मौसम में उगने वाली खरीफ ऋतु की एक दलहनी फसल है । लोबिया की खेती (lobiya ki kheti) प्रीष्म व वर्षा ऋतु दोनों में की जाती है । यह शुष्क व अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में सरतला से उगने वाली फसल है । मक्का की तुलना में यह सूखा सहन करने की अधिक क्षमता रखती है । इसके बीज के अंकुरण के लिए 18-20°C तापमान अनुकूल होता है जबकि पौधे की वानस्पतिक वृद्धि (vegetative growth) के लिए 30-35°C ताप को भी सहन कर लेती है । लोबिया के पौधों के लिए पाला हानिकारक होता है ।


लोबिया की खेती के लिए उपर्युक्त भूमि –

लोबिया की खेती सभी प्रकार की मृदाओं में की जा सकती है इसकी अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए दोमट मिट्टी सबसे अच्छी रहती है । मटियार दोमट भूमि में भी लोबिया की खेती (lobiya ki kheti) की जा सकती है ।

खेत में लवणीयता अथवा क्षारीयता का प्रभाव होने पर पौधों की वृद्धि कम होती है और उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है । खेत में उचित जल निकास आवश्यक है ।


लोबिया की खेती के लिए उपयुक्त जाति का चुनाव -

लोबिया की चारे, सब्जी व दाने के लिए विभिन्न किस्में उगाने के लिए उपलब्ध हैं । अपनी आवश्यकता के अनुसार कृपक इनमें से किसी भी जाति का चुनाव कर सकता है ।

लोबिया की प्रमुख किस्में निम्नलिखित है -

  • चारे वाली जातियाँ ( Varieties for fodder ) - Type-2, पूसा ऋतुराज व पूसा बरसाती, K-397, K-585, सिरसा-10, EC-4216, UPC 5286, UPC-287, S-450, S-457 व PS-145 आदि ।
  • सब्जी वाली जातियाँ ( Varieties for vegetable ) - पूसा फाल्गुनी, पूसा दो फसली पूसा बरसाती, FS-68, गोमती आदि ।
  • दाने वाली जातियाँ ( Varieties for grain ) -
  • C-152, FS-68, Cow-pea-74, CO-3 व गोमती आदि ।


लोबिया की खेती के लिए उपर्युक्त भूमि -

लोबिया की खेती (lobiya ki kheti) विभिन्न प्रकार की भूमियों में की जा सकती है । सफल खेती के लिए दोमट भूमि सबसे उपयुक्त है । मटियार दोमट भूमि में भी इसकी खेती की जा सकती है । लवणीय व क्षारीय भूमियाँ इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं होती हैं । भूमि का pH मान उदासीन (neutral) होना चाहिये । खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था होनी आवश्यक है ।


लोबिया की खेती के भूमि की तैयारी -

लोबिया की खेती के लिए पूर्व फसल की कटाई के पश्चात् मिट्टी पलटने वाले हल से एक गहरी जुताई व इसके पश्चातु दो बार हैरो चलाकर खेत की मिट्टी भुरभुरी व बारीक हो जाती है । बुवाई के समय खेत में पर्याप्त नमी का होना आवश्यक है ।


लोबिया की खेती में फसल चक्र -

लोबियां एक दलहनी फसल है । अतः फसल चक्रों में प्रमुख धान्य फसलों के साथ इसको सम्मिलित किया जा सकता है । ऐसा करने से धान्य फसलों की पैदावार में वृद्धि होती है । इस फसल के ग्रीष्म, वर्षा व रबी के मौसमों में उगाने के कारण विभिन्न फसलों के पश्चात् लोबिया की खेती (lobiya ki kheti) की जा सकती है ।

लोबिया की फसल के साथ अपनाये जाने वाले प्रमुख फराल चक्र निम्न प्रकार हैं -

  • लोबिया - गेहूँ (एकवर्षीय)
  • लोबिया - जई (एकवर्षीय)
  • मक्का - आलू - लोबिया (एकवर्षीय)
  • मक्का - गेहूँ - लोबिया  (एकवर्षीय)
  • लोबिया - गन्ना (एकवर्षीय)
  • धान - गेहूँ - लोबिया (एकवर्षीय)
  • मक्का - तोरिया - गेहूँ - लोबिया (एकवर्षीय)
  • मक्का - आलू - गेहूँ - लोबिया (एकवर्षीय)


लोबिया की खेती में मिलवाँ खेती -

लोबिया एक दहनी फसल होने के कारण यह अन्य धान्य फसलों के कारण मिश्रित फसल के रूप में भी उपराई जा सकती है इसको धान्य फसलों के साथ उगाने से उनकी उपज में भी वृद्धि होती है ।

लोबिया में मिलवाँ खेती के कुछ उदाहरण निम्न प्रकार हैं -

  • लोबिया + ज्वार - गेहूँ (एकवर्षीय)
  • लोबिया + बाजरा - गेहूँ (एकवर्षीय)
  • लोबिया + मक्का - आलू (एकवर्षीय)
  • लोबिया + मक्का - गन्ना (एकवर्षीय)
  • मक्का + लोबिया - आलू - गेहूं  (एकवर्षीय)


लोबिया की बुवाई -

लोबिया की फसल चारे अथवा दाने के उद्देश्य से उगाने के लिए बुवाई सम्बन्धी विभिन्न बिन्दुओं जैसे बुवाई का समय, बीज दर, अन्तरण बीजोपचार एवं बुवाई की विधि आदि पर ध्यान देना आवश्यक है ।


लोबिया की बुवाई का समय -

लोबिया की बुवाई बसन्त, ग्रीष्म व वर्षा ऋतुओं में की जाती है ।

इसकी बुवाई का समय निम्न प्रकार है -

  • बसन्तकालीन फसल — इसकी बुवाई लगभग 15 फरवरी तक कर देनी चाहिये ।
  • ग्रीष्मकालीन फसल — इसकी बुवाई अप्रैल के प्रथम सप्ताह में की जाती है ।
  • वर्षाकालीन फसल — इस मौसम में लोबिया की बुवाई जौलाई के प्रथम सप्ताह में की जाती है ।


लोबिया की खेती के लिए बीज दर -

लोबिया के चारे की फसल के लिए 40-50 कि० बीज प्रति हैक्टेयर पर्याप्त होता है । चारे वाली फसल को ही हरी खाद के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है । इसकी दाने और सब्जी की फसल उगाने के लिए लगभग 24 किमा बीजप्रति हेक्टेयर को आवश्यकता होती है ।


लोबिया की खेती अन्तरण -

लोबिया की बसन्तकालीन व ग्रीष्मकालीन फसलों के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 25 से 30 सेमी० रखनी चाहिये । वर्षा ऋतु की फसल के पौधों की वानस्पतिक वृद्धि अधिक होती है अतः उसका अन्तरण 30 से 45 सेमी० तक रखा है । जाता एक पौधे से दूसरे पौधे की दूरी 10 से 15 सेमी ० उचित रहती है ।


लोबिया में बीजोपचार -

लोबिया के बीज की बुवाई से पूर्व इसका उपचार करना अत्यन्त आवश्यक है । बीज का उपचार के लिए थायराम की 3 ग्राम मात्रा एक किमा ० बीज के लिए पर्याप्त होती है ।


लोबिया की बुवाई की विधि -

लोबिया का चारे व हरी खाद के लिए उगाये जाने वाली फसल की बुवाई सामान्यतः छिटकवाँ विधि से की जाती है । दाने की फसल के लिए देशी हल के पीछे बुवाई की जाती है या इस कार्य हेतु सीडड्रिल (seed-drill) का प्रयोग भी किया जा सकता है ।


लोबिया की खेती में आवश्यक खाद एवं उर्वरक -

लोबिया एक दलहनी फसल होने के कारण अन्य फसलों की भाँति ही इसे कम मात्रा में नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है । पौधे की प्रारम्भिक वृद्धि के लिए फिर भी कुछ मात्रा में नाइट्रोजन की आवश्यकता पड़ती है । ऐसा करने से पौधे की जड़ों में पाये जाने वाली गाँठों में रहने वाले जीवाणु पौधे की प्रारम्भिक वृद्धि से ही सक्रिय हो जाते हैं । एक हैक्टेयर लोबिया की फसल के लिए लगभग 20 किमा० नाइट्रोजन पर्याप्त रहती है । इसको बुवाई के समय ही प्रयोग कर देना चाहिये । इस फसल के लिए लगभग 50 किमा० फास्फोरस की प्रति हैक्टेयर आवश्यकता होती है । पोटाश तत्व की पूर्ति पौधा मृदा से ही कर लेता है अतः अलग से देने की आवश्यकता नहीं होती है ।


लोबिया की फसल में जल प्रबन्ध -

लोबिया की खेती (lobiya ki kheti) खरीफ के मौसम में उगाने पर जल के लिए पूर्णतया वर्षा पर निर्भर करती है । यदि वर्षा न हो तो खेत की एक या दो सिंचाइयाँ की जा सकती हैं । इसकी जलमाँग लगभग 350 मिमी० होती है । इसका पौधा मूसला जड़ वाला होने के कारण भूमि से नीचे तक की नमी को ग्रहण करने की क्षमता रखता है । अतः ग्रीष्मकालीन मौसम में कम पानी उपलब्ध होने पर भी या सूखे की स्थिति में भी आसानी से उग जाता है । ग्रीष्मकालीन फसल के लिए 5-6 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है ।


लोबिया की फसल में लगने वाले खरपतवार एवं नियन्त्रण -

लोबिया की फसल की बुवाई से लगभग 30 दिन पश्चात् तक खरपतवारों पर नियन्त्रण आवश्यक है । फसल की प्रारम्भिक वृद्धि के समय खरपतवार फसल के पौधों को दबा लेते हैं । अतः हो (hoe) की सहायता से दो बार खरपतवारों को उखाड़ देना चाहिये । इसके पश्चात् खरपतवारनाशी का प्रयोग करना चाहिये । बुवाई के 30 दिन पश्चात् बेसालीन 1 किग्रा० मात्रा को एक हजार लीटर जल में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिये ।


लोबिया की खेती में लगने वाले कीट एवं रोग -

लोबिया की फसल से चारे व दाने की उपज अधिक प्राप्त करने के लिए फसल का स्वास्थ्य उत्तम रहना आवश्यक है । ऐसा करने के लिए फसल पर लगने वाली बीमारियों एवं कीटों पर नियन्त्रण करना अनिवार्य है । 


लोबिया में लगने वाले रोग एवं उनका नियत्रण -

इस फसल पर लगने वाली बीमारियों में लोबिया मोजेक (lobia-mosaic), रस्ट (rust) व जीवाणुज अंगमारी (bacterial blight) हैं ।


1. लोबिया मोजेक ( Lobia mosaic ) – यह एक रोग विषाणुजनित रोग हैं जो मक्खियों (aphids) के द्वारा फैलता है । इस रोग के प्रकोप के कारण पौधे की पत्तियों कमजोर व पीले रंग की हो जाती हैं । पत्तियों का आकार छोटा रह जाता है । फलियाँ कम व छोटी बनती हैं ।

इस बीमारी पर रोकथाम के लिए - मेटासिस्टॉक्स (metasystox) 0-1% का प्रयोग करना चाहिये ।

2. रस्ट ( Rust ) - इस बीमारी के प्रकोप से पौधे की पत्तियाँ, फलियाँ व नई शाखायें प्रभावित होती हैं । पौधों की निचली पत्तियों की नीचे की सतहों पर सफेद चूर्ण जैसे धब्बे दिखाई पड़ते हैं जो रोग की अधिकता के कारण पत्तियों पर बहुतायत में देखे जा सकते हैं ।

इस रोग पर नियन्त्रण के लिए - डाइथेन M - 45 की 2 किग्रा० मात्रा को 1000 लीटर पानी में घोलकर एक हैक्टेयर खेत में प्रयोग करना चाहिये ।

3. जीवाणुज अंगमारी ( Bacterial blight ) - लोबिया में लगने वाली इस बीमारी को कैंकर भी कहते हैं । इस बीमारी के प्रभाव से बीजपत्र लाल रंग के हो जाते हैं और सिकुड़ने लगते हैं । यह बीमारी बीज द्वारा फैलती है ।

इस पर नियन्त्रण के लिए - उचित फसल चक्र का चुनाव करना चाहिये, स्वस्थ बीज की बुवाई करनी चाहिये व रोगरोधी फसलों की जातियों को बुवाई के लिए चुनना चाहिये ।


लोबिया की खेती में लगने वाले कीट एवं नियन्त्रण -

लोबिया की फसल को बहुत से कीट हानि करते रहते हैं । इसमें रोमिल इल्ली (hairy-caterpillar), बीटल (beetle) व मक्खियाँ (aphid) आदि हैं ।


1. रोमिल इल्ली ( Hairy - caterpillar ) - यह लोबिया की फसल को सबसे अधिक हानि पहुँचाने वाला कीट है । यह कीट पौधे के समस्त हरे भाग को खा जाता है । इसके अलावा यह बीजांकुर को भी खा जाता है ।

इस पर नियन्त्रण के लिए - 1 लीटर इण्डोसल्फान (endosulphan) को 800-1000 लीटर जल में घोल बनाकर 1 हैक्टेयर खेत में स्प्रे करना चाहिये ।

2. बीटल ( Beetle ) - ग्रीष्मकालीन फसल में बीटल का प्रकोप बहुत अधिक होता है । पत्तियों में छोटे - छोटे छेद होकर पौधा सूख जाता है ।

इस पर नियन्त्रण के लिए - एक किग्रा० थायमेट (Thimet) का प्रयोग बुवाई से पूर्व करना चाहिये ।

3. मक्खियाँ ( Aphids ) - ये मक्खियाँ पौधों का रस चूस जाती हैं । पौधों की पत्तियाँ भूरे रंग की पड़ जाती है व पौधा बीमार होकर मर जाता है ।

इसके नियन्त्रण के लिए - 0.1% मेटासिस्टॉक्स (metasystox) का प्रयोग लाभकारी रहता है ।


लोबिया की फसल की कटाई -

लोबिया की चारे वाली फसल की बुवाई के 40-45 दिन पश्चात् कटाई की जाती है । चारे की इस फसल को हरी खाद के रूप में भी इसी अवस्था में प्रयोग में लाया जा सकता है । सब्जी के लिए उगाई गई फसल से फलियों की तुड़ाई बुवाई के दो से तीन माह के बीच कर लेनी चाहिये । दाने की फसल के लिए फसल की कटाई बुवाई के 90-120 दिनों के पश्चात् की जाती है ।


लोबिया की खेती से प्राप्त उपज -

लोबिया के एक हैक्टेयर खेत से 12-15 क्विंटल दाना प्राप्त होता है व इसी के साथ 50 क्विटल तक कंड़वी भी मिल जाती है । चारे की फसल से 300 क्विटल चारे की प्रति हैक्टेयर तक उपज होती है ।

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