संकर/हाईब्रिड धान की खेती कैसे करें | hybrid dhan ki kheti kaise kare

सर्वप्रथम चीन में संकर धान की जातियों का विकास हुआ था वर्तमान समय में चीन के लगभग 60% क्षेत्रफल पर संकर/हाईब्रिड धान की खेती (hybrid dhaan ki kheti) की जाती है ।

चीन के प्रसिद्ध वैज्ञानिक युवान लांग पिंग संकर धान क्रान्ति के जनक माने जाते है, इन्हें संकर धान के पिता भी कहां जाता है ।

इन्होंने सन 1976 से संकर/हाईब्रिड धान की किस्मों पर कार्य प्रारम्भ किया था ।


संकर/हाईब्रिड धान की किस्मों का विकास

संकर धान तकनीक को अपनाने से चीन में धान के उत्पादन में उत्साहजनक वृद्धि हुई ।

चीन में हुई इस प्रगति को देखकर अन्य एशियाई देशों में भी संकर धान (hybrid dhaan) पर कार्य प्रारम्भ हुआ ।

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर IRAI फिलीपीन्स द्वारा सन् 1980 में इस पर कार्य प्रारम्भ किया गया ।

भारत में संकर/हाईब्रिड धान की तकनीक पर 1989 पर कार्य प्रारम्भ हुआ व सन् 1994 में 4 संकर धान की जातियों का विकास हुआ ।


भारतीय संकर/हाईब्रिड धान की किस्में -

  • APRH - 1
  • APRH - 2
  • MCR - 1
  • KRH - 1

हमारे देश में सन् 2003 तक 19 संकर/हाईब्रिड धान की जातियों का विकास हुआ ।

इन जातियों की उपज अन्य अधिक उपज देने वाली जातियों की तुलना में 10-15 कुन्तल/हैक्टेयर अधिक पाई गई ।

इन संकर जातियों की गुणवत्ता भी अधिक थी ।

तत्पश्चात् कुछ ऐसी संकर/हाईब्रिड जातियाँ विकसित हुई जिनमें से 25 से 30 प्रतिशत अधिक उपज देने की क्षमता है ।

संकर/हाईब्रिड धान की जातियों का एक गुण यह है, कि ये जातियाँ प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उगने की क्षमता रखती है ।


भारत में संकर धान की उन्नत खेती | hybrid dhaan ki kheti kaise kare

संकर/हाईब्रिड धान की खेती (hybrid dhaan ki kheti) के लिये खेत स्तर पर आर्थिक दृष्टि से आकर्षक भिन्नता (heterosis), रोपाई हेतु अधिक सिंचित क्षेत्रफल, अधिकतम श्रम व भूमि अनुपात, बीज उत्पादन कार्य में जुटी संस्थायें व सम्पूर्ण रूप से स्थापित वितरण एवं विपणन प्रणाली आवश्यक हैं ।

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संकर/हाईब्रिड धान (hybrid dhaan) की किस्मों की खेती एवं उनकी विशेषताएं


भारत में बोई जाने वाली संकर/हाईब्रिड धान की किस्में


हाइब्रिड धान की निम्न किस्में है -

  • APRH - 1
  • APRH - 2
  • MGR - 1
  • KRH - 1
  • PUSARH - 10
  • KRH - 2
  • Sahyadri
  • NDRH - 2
  • PSD - 1
  • CORH - 1
  • DARH - 11


संकर/हाईब्रिड धान की किस्मों के प्रमुख गुण

ऐसा अनुमान है कि इस समय भारत में संकर धान की खेती लगभग 60,000 हैक्टेयर में की जाती है ।

हमारे देश में संकर धान की खेती (हाईब्रिड धान की खेती) प्रारम्भ करने वाले राज्य आन्ध्रप्रदेश, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल व कर्नाटक है ।

इनके अतिरिक्त पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में संकर धान को उगाने की प्रचुर सम्भावनायें है ।


संकर/हाईब्रिड धान की किस्मों के प्रमुख गुण निम्न है -

  • अधिक उपज देने वाली जातियों की तुलना में 10-15 क्विटल/है अर्थात् अधिक उपज प्राप्त होती है ।
  • ये जातियाँ अधिक उत्पादक होती है व इनमें अधिक कल्ले निकलते हैं ।
  • पौधे की प्रत्येक बाल में अधिक दाने लगते हैं ।
  • थोड़े से अधिक प्रयास से ही हाईब्रिड धान की खेती सम्भव है ।

धान की सुगन्धित प्रजातियों के नाम

चावल की कुछ जातियों में पकाये जाने पर एक विशेष सुगन्ध पैदा हो जाती है ।

बासमती चावल के नाम से प्रसिद्ध इन जातियों का चावल उत्तम गुणवत्ता और अनोखी सुगन्ध के कारण प्रसिद्ध है ।

पकाने पर इनके दाने पतले, लम्बे, एकसमान तथा खाने में स्वादिष्ट होते है ।


धान की प्रमुख सुगन्धित प्रजातियों के नाम -

  • देहरादूनी बासमती
  • पाकिस्तानी बासमती
  • बासमती -370 आदि है ।

अन्य जातियों की तुलना में सुगन्धित बासमती चावल की उपज कम होती है और इसका बाजार मूल्य अधिक होता है ।

जहाँ अन्य जातियों की उपज क्षमता लगभग 30-40 कुन्तल प्रति हैक्टेयर होती है इसका उत्पादन केवल 15-20 कुन्तल प्रति हैक्टेयर होता है ।


भारत में चावल की प्रजातियां -

उत्तर पश्चिमी भाग में देहरादून, करनाल, सहारनपुर, अम्बाला तथा पंजाब, उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड के बहुत से क्षेत्रों में उगायी जाता है ।

यद्यपि हमारे देश में सुगन्धित और असुगन्धित दोनों प्रकार का चावल उगाथा जाता है लेकिन उपभोग, महत्व तथा मूल्य के आधार पर सुगन्धित बासमती सर्वोत्तम है ।

न केवल भारतीय अपितु विदेशी लोग भी इसे पसन्द करते हैं ।

इराक, ईरान, कुवैत, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका तथा विश्व के अन्य देशों को सुगन्धित चावल का निर्यात यहाँ से किया जाता है ।


ऐसे करें संकर धान की खेती उन्नत खेती | hybrid dhaan ki kheti

संकर/हाईब्रिड धान की सफल खेती के लिये की जाने वाली सस्य क्रियाओं का संक्षिप्त वर्णन निम्न प्रकार है -


संकर/हाईब्रिड धान की नर्सरी तैयार करना

  • संकर धान का बीज महँगा होता है और प्रत्येक वर्ष नया प्रमाणित बीज खरीदकर प्रयोग करना पड़ता है ।
  • नर्सरी के उचित प्रबन्धन के लिये खेत को 1 से 1- मी० चौड़ी क्यारियों में आवश्यकता के अनुसार विभाजित कर लिया जाता है ।
  • प्रत्येक क्यारी में नर्सरी में बीज की बुवाई से पूर्व 5 किग्रा० यूरिया, 10 कि० सिंगल सुपर फास्फेट, 5 से 10 गुना सड़ी हुई गोबर की खाद व 5 किग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश का प्रयोग करना चाहिये ।
  • नर्सरी में बीज की बुवाई खरीफ की फसल के लिये जून के महीने में व रबी की फसल के लिये दिसम्बर के महीने में की जाती है ।
  • एक हैक्टेयर खेत की रोपाई के लिये 600 वर्ग मी. क्षेत्रफल पर्याप्त होता है ।
  • पौधे की खेत में रोपाई के लिये 10 दिन पूर्व 5 किग्रा० यूरिया का प्रयोग करना चाहिये ।
  • क्यारियों से पौध उखाड़ने से पूर्व हल्की सिंचाई कर देनी चाहिये ।


संकर/हाईब्रिड धान की खेती के लिए भूमि की तैयारी

धान की संकर जातियों को उगाने के लिये रोपाई के एक सप्ताह पूर्व एक लेहयुक्त जुताई ( Pudding ) करते है ।

इसी प्रकार रोपण से पहले दिन एक लेहयुक्त जुताई ओर करते है ।


संकर/हाईब्रिड धान की रोपाई

धान की संकर जातियों की रोपाई खरीफ ऋतु में जुलाई के दूसरे सप्ताह में की जाती है जबकि रबी की फसल की रोपाई जनवरी माह में की जाती है ।


संकर/हाईब्रिड धान की खेती में अन्तरण

पंक्ति से पंक्ति की दूरी 20 सेमी० ।
पौधे से पौधे की दूरी 10 सेमी० ।


पौधों की संख्या ( Plant population ) - 

33,000 पौधे/है० ।


संकर/हाईब्रिड धान की खेती में उर्वरकों का उपयोग

खरीफ के मौसम में रोपाई के समय 50 किग्रा. नाइट्रोजन, 40 किग्रा. फास्फोरस व 50 किलो  पोटाश है पर्याप्त होता है ।

रोपाई के 3 सप्ताह पश्चात् 25 किलो नाइट्रोजन/है० एवं रोपाई के 6 सप्ताह बाद फिर से 25 किलो नाइट्रोजन/है० प्रयोग करनी चाहिये ।

रबी की फसल के लिये रोपाई के समय 60 किग्रा. नाइट्रोजन, 50 किग्रा. फास्फोरस व 60 किग्रा. पोटाश की आवश्यकता होती है ।

रोपाई के 3 सप्ताह पश्चात् व 6 सप्ताह पश्चात् 25-25 किलो नाइट्रोजन प्रति प्रयोग करना आवश्यक है ।

नाइट्रोजन व पोटाश खरीफ की रबी की फसलों में संकर जातियों में कुछ देरी से व फूलों के समय प्रयोग करें ।

ऐसा करने से संकर धान की फसल (hybrid dhaan ki fasal) से भरपूर उपज प्राप्त होती है ।


संकर/हाईब्रिड धान की खेती में लगने वाले खरपतवार एवं उनका नियन्त्रण

संकर धान में खरपतवारों पर नियन्त्रण करने के लिये ब्यूटाक्लोर एक किग्रा० सक्रिय तत्व/है की दर से रोपाई के 7 दिन पश्चात् 400-500 ली. पानी में मिलाकर प्रयोग करना चाहिये ।


संकर/हाईब्रिड धान की कटाई कब करनी चाहिए?

संकर/हाईब्रिड धान की जातियों की कटाई रोपाई के लगभग 35 दिन बाद या लगभग जब पौधों में 50% फूल निकल चुके हों की जानी चाहिये ।

उपरोक्त कृषि क्रियाओं को अपनाकर भारत में संकर/हाईब्रिड धान (hybrid dhaan) का उत्पादन भरपूर मात्रा में बढ़ाया जा सकता है । 


भारत में संकर/हाईब्रिड धान की खेती की समस्यायें

भारत में पिछले एक दशक से बहुत - सी संकर जातियों का विकास हो चुका है, परन्तु अभी तक संकर धान लोकप्रिय न होने के निम्न कारण है -

  • संकर/हाईब्रिड धान की जातियों में विभिन्नता का स्तर लगभग 20% है । इसको ओर बढ़ाने की आवश्यकता है ।
  • संकर/हाईब्रिड धान के दाने की गुणवत्ता अन्य अधिक उपज देने वाली जातियों की तुलना में कम है ।
  • बहुत - सी संकर/हाईब्रिड धान की जातियों में बीमारियाँ लगने की सम्भावना रहती है ।
  • संकर/हाईब्रिड धान की जातियों का बीज अन्य जातियों की तुलना में महँगा होता है ।
  • इन जातियों के उगाने से किसान को अपेक्षाकृत कम लाभ मिल पाता है । कमजोर विपणन व्यवस्था के चलते व्यापारी लोग किसान को कम मूल्य देने के लिये मजबूर करते हैं ।
  • कुछ संकर धान की जातियों की उपज लाभ की दृष्टि से मध्यम ही होती है ।
  • संकर/हाईब्रिड धान को उगाने की नई विकसित कृषि क्रियाओं का किसानों के खेतों तक न पहुँचना भी एक समस्या है ।
  • किसानों के खेतों तक नई तकनीक को पहुँचाने के लिये किये गये प्रयास अपर्याप्त होते हैं ।
  • हमारे देश में सरकारी व निजी क्षेत्रों में आपसी तालमेल का अभाव रहता है ।

भारत में संकर/हाईब्रिड धान की खेती का समाधान व भविष्य

भारत में संकर धान (hybrid dhaan) की जातियों को उगाने के लिये आने वाली समस्याओं से निपटने के लिये निम्न कार्य योजना पर ध्यान केन्द्रित करना होगा ।

  • हाइब्रिड धान की अधिक भिन्नता वाली जातियों का विकास होना चाहिये ।
  • इन जातियों के दाने की गुणवत्ता बढ़ाने पर कार्य किया जाना चाहिये ।
  • इन जातियों का बीज सस्ता होना चाहिये ।
  • सरकार की ओर से नई उत्पादन तकनीकों को किसानों के खेतों तक पहुँचाने के लिये पर्याप्त व गम्भीर प्रयास करने चाहिये ।
  • कीटों व रोगरोधी किस्मों को विकसित किया जाना चाहिये ।
  • बीज उत्पादन संस्थाओं का सहयोग लिया जाना चाहिये ।
  • बीज वितरण एवं विपणन प्रणाली प्रभावकारी व सक्षम होनी चाहिये ।
  • नई विकसित कृषि क्रियाओं का प्रचार व प्रसार पर्याप्त मात्रा में होना चाहिये ।

उपरोक्त कार्य योजना के अनुसार संकर धान (hybrid dhaan) का क्षेत्रफल भारत में धीरे - धीरे बढ़ेगा जिससे कृषि उत्पादन एक स्थायी स्थिति में पहुँच सकेगा । 


संकर/हाईब्रिड धान की अधिक पैदावार के उपाय

धान की फसल (dhaan ki fasal) की पैदावार उसमें की गई कृषि क्रियाएं एवं धान की किस्मों पर निर्भर करती है । 

धान की अधिक पैदावार प्राप्त करने के उपाय निम्नलिखित है -

धान की फसल (dhaan ki fasal) की पैदावार उसकी जातियों के चुनाव, भूमि, बुवाई का समय, बुवाई की विधि, खरपतवार नियंत्रण एवं फसल का स्वास्थ्य आदि पर निर्भर करती है ।


धान की अधिक पैदावार के लिए प्रमुख उपाय -

  • धान की फसल में पोषक प्रबंधन
  • धान की फसल में जल प्रबंधन
  • धान की उन्नत प्रजातियां
  • धान की फसल में खरपतवार प्रबंधन
  • धान की फसल स्वास्थ्य प्रबंधन


धान में समन्वित पोषक प्रबन्धन

धान की फसल (dhaan ki fasal) के लिये खाद एवं उर्वरकों की मात्रा मृदा परीक्षण के पश्चात् ही निर्धारित करनी चाहिये ।

सामान्यतः बुवाई के 50 दिन पूर्व खेत में सड़ी गोबर को खाद की 20-25 कुन्तल मात्रा एक हैक्टेयर खेत में प्रयोग करनी चाहिये ।

धान के एक हैक्टेयर खेत के लिये 100-120 किग्रा. नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है ।

नाइट्रोजन की इस मात्रा की पूर्ति हेतु अमोनियम सल्फेट, अमोनियम क्लोराइड व यूरिया का प्रयोग समान रूप से लाभप्रद रहता है ।

इस नाइट्रोजन का आधा भाग रोपाई के समय, एक चौथाई भाग कल्ले फूटते समय (Tillering stage) तथा शेष एक चौथाई भाग बाली बनने से पूर्व दिया जाना चाहिये ।

रोपाई के समय नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों को खेत में बिखेरकर अच्छी प्रकार मिला देना चाहिये ।

इस समय जल निकास का उत्तम प्रबन्ध होना आवश्यक है ।

एक हैक्टेयर धान की फसल के लिये 50-60 किग्रा. फास्फोरस पर्याप्त होता है ।

फास्फोरस की इस मात्रा की पूर्ति हेतु सिंगल सुपर फास्फेट का प्रयोग उत्तम रहता है ।

धान की सघन खेती हेतु 50-60 किग्रा. पोटाश एक हैक्टेयर खेत में प्रयोग करना चाहिये ।

धान की फसल (dhaan ki fasal) में कभी - कभी खैरा रोग के लक्षण दिखाई पड़ने लगते हैं ।

ऐसा जिंक पोषक तत्व की कमी के कारण होता है ।

इस रोग पर नियन्त्रण हेतु - 40-50 किग्रा० जिंक सल्फेट एक हैक्टेयर खेत में प्रयोग करने की संस्तुति की जाती है ।

धान की फसल (dhaan ki fasal) में उर्वरकों का प्रयोग, फसल की जाति, भूमि की किस्म, बीजांकुर की आयु, जल एवं खरपतवार प्रबन्ध आदि कारकों पर निर्भर करता है ।


धान में समन्वित जल प्रबन्धन

खरीफ मौसम की अन्य फसलों की तुलना में धान की जलमाँग अधिक है नीची भूमियों में धान की खेती करने के लिये 1000-1200 मिमी. जल की आवश्यकता होती है ।

भूमि की तैयारी के समय जल की आवश्यकता भूमि की किस्म के ऊपर निर्भर करती है ।

यह मात्रा 200-300 मिमी. तक हो सकती है ।

धान की नर्सरी तैयार करने के लिये लगभग 50 मिमी व फसल के सम्पूर्ण वृद्धिकाल में लगभग 1000 मिमी. जल की आवश्यकता होती है ।

धान के पौधे के जीवनकाल में जल की अधिक आवश्यकता की क्रान्तिक अवस्थायें होती है ।


धान उगाने के लिये जल प्रबन्धन किस प्रकार करना चाहिये -

( a ) रोपाई से पूर्व ( Before transplanting ) -

धान की पौध की रोपाई से 15 दिन पूर्व खेत को पानी से भर देना चाहिये ।

इस समय खेत की लम्बाई में व आर - पार खेत की जुताई की जाये ।

इसके एक सप्ताह बाद दूसरी बार जुताई करें ।

यदि हरी खाद का प्रयोग किया गया है तो हरी खाद की फसल के पौधों को सड़ने गलने के लिये खेत से 5 दिन के लिये पानी को निकाल देना चाहिये ।

तत्पश्चात् हैरो चलाकर खेत की तैयारी कीजिये ।

खेत में उर्वरकों का प्रयोग (Basal dose) कर लें और खेत में 2-3 सेमी० पानी लगाये ।

पौध की रोपाई के समय खेत में 2-3 सेमी० पानी अवश्य ही खड़ा रहना चाहिये ।


( b ) रोपाई के बाद ( After transplanting ) –

फसल की रोपाई के बाद 2-3 दिन तक खेत में 4-5 सेमी. पानी बनाये रखना चाहिये जिससे पौध को स्थिर होने में सहायता मिलती है ।

पौधों में फूल आने की अवस्था तक 5 सेमी. पानी खेत में बनाये रखना चाहिये ।

अधिकतम कल्ले फूटते समय (Maximum tillering stage) व रोपाई के 40 दिन बाद खेत से 3-4 दिन के लिए अधिकतम कल्ले फूटते समय (Maximum tillering stage) पानी को निकाल देना चाहिये ।

ऐसा करने से पौधों की वृद्धि तेजी से होती है ।

धान की खड़ी फसल में उर्वरकों का प्रयोग (top dressing) करने से पूर्व भी पानी खेत से निकाल देना चाहिये और एक दिन पश्चात् फिर पानी भर देना चाहिये ।

खरपतवारनाशी व कीटनाशी का प्रयोग भी खेत में हल्के पानी की अवस्था में ही करना चाहिये और एक सप्ताह तक यही स्थिति बनाये रखना आवश्यक है ।

पौधों पर फूल आने के 3 सप्ताह पश्चात् खेत से पानी निकाल देना चाहिये ।

धान की फसल (dhaan ki fasal) की दी गई उपरोक्त जलमाँग की पूर्ति सिंचाई के स्रोत से करनी चाहिये तथा वर्षा जल इससे अतिरिक्त होता है ।

अधिक वर्षा की स्थिति में या अनावृष्टि के समय इस जलमाँग को घटाया - बढ़ाया जा है ।


धान की फसल में खरपतवार प्रबन्धन

धान की फसल (dhaan ki fasal) में उगने वाले प्रमुख खरपतवार जगली धान, सावां, मकड़ा, सकता, कोदों, वानरा, दूबघास, सफेद मुर्ग, भंगड़ा, कनकवा, जंगली जूट, मौथा व दुध्दी आदि है ।

इन खरपतवारों पर नियन्त्रण हेतु एक या दो निराई खुरपी की सहायता से की जाती है ।

इसी के साथ - साथ 2, 4 - D व MCPA रसायनों का प्रयोग धान की फसल में खरपतवारों को नष्ट करने के लिये प्रभावकारी रहता है ।

इन रसायनों के प्रयोग की दर व समय विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार अलग - अलग है व विभिन्न खरपतवारों के लिये भी रसायनों की मात्रा भिन्न - भिन्न होती है इस फसल में 2, 4 - D, MCPA तथा 2,4,5T आदि रसायनों का रोपाई (transplanting) के 30 दिन पश्चात् 1 से लेकर 1.5 किग्रा. प्रति हैक्टेयर की मात्रा 500 लीटर जल में घोल बनाकर प्रयोग करना चाहिये ।

उपरोक्त रसायनों के अतिरिक्त चुका है ।

TOKE - 25, बेसालीन, stam F - 34 आदि का प्रयोग भी प्रभावशाली सिद्ध हो ।

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